झूठ बोले, कौवा काटे


‘झूठ बोले कौवा काटे’ प्यारी सी एक काल्पनिक कहावत है। मैंने तो कभी झूठ बोलने वाले आदमी को कौए के द्वारा काटे जाते हुए नहीं देखा। मैं खुद दिन मैं झूठ के पकौड़े का पच्चीसों प्लेट नाश्ता मार लेता हूं परन्तु कौवा तो कौवा, एक मक्खी भी मुझे नहीं काटती। यदि यह कहावत सच होती तो हिन्दुस्तान की एक अरब तक पहुंचती, लफ्फाजी का दिन-रात डिनर उड़ाने वाली आबादी के पीछे, दो-तीन के हिसाब से गिनती करें तो तीन अरब कौए तो पीछे पड़े ही रहते। आज की तारीख में इस देश के अंदर एक भी हरिश्चन्द्र नहीं बचा है। अगर कहीं होगा तो संरक्षित जानवर की श्रेणी में किसी अजायबघर की शोभा बढ़ा रहा होगा। यदि सर्वेक्षण किया जाये तो हर एक भारतीय दिन भर में सौ-पचास झूठ तो हंसते-हंसते बोल लेता होगा। नेता, व्यापारी, पुलिस या वकील हैं तो फिर कहने ही क्या। यह संख्या बढ़कर दो-चार सौ का आंकड़ा आसानी से पार कर सकती है।अपने यहां राजनीति, व्यापार, थाने और कचहरी झूठ के सबसे बड़े डिपार्टंमेंटल स्टोर्स हैं। कहें तो कोल्ड स्टोरेज हैं। राजनीतिज्ञ, व्यापारी, पुलिस और काले कपड़े वाले वकील, झूठ के होलसेल डीलर हैं। वादे और आश्वासन झूठ के ही शुगर कोटेड कैप्सूल हैं जिसे हमारे कर्णधार देश सेवा के नाम से घूम-घूमकर जनता को पिछले पचास सालों से बांट रहे हैं। इन कैप्सूलों को निगल-निगलकर बेचारी जनता का सदा हाजमा खराब रहता है।गरीबी हटाओ कहते हुए अपनी गरीबी हटा लेना, आराम हराम है का नारा देकर खुद संसद में खर्राटे मारकर, जय जवान जय किसान का मिसरा उछाल कर किसानों और मजदूरों पर लाठी चार्ज करवाना, उनके खेतों को ढोरों द्वारा चरवा देना इनकी झूठ-भक्ति के हसीन चेहरे हैं। पहले विरोधाभासी वक्तव्य देना और फिर अखबार में धीरे से खंडन करना कि मेरे कहने का मतलब वह नहीं था, यह था, यही हमारी झूठ-पूजा की टेक्नीकलर फिल्म है। सच के नाम से ही हमारी जीभ सुन्न पड़ जाती है। बड़े-बड़े डाक्टर कहते हैं कि इस एलर्जी की कोई दवा नहीं है। आज की तारीख में सच की बात करना इस देश में बेहूदगी है, बेईमानी है। अब तो मन में संदेह होने लगा है कि क्या हिंदुस्तान में सच जैसी कोई चिड़िया है भी नहीं? अपना बोला हुआ झूठ ही अब सच का भ्रम देने लगा है। हम आज झूठों के सबसे बड़े सौदागर हो चुके हैं।
हमारी जीभ के अग्रभाग झूठदेव पलथिया गए हैं। आप बातों का जरा बटन दबाइए, हम मुंह की मशीन से झूठों का माल अनवरत उगलना शरू कर देंगे। सच बोलना जान की जोखिम का काम है। परेशानियां विपत्ति और नाश इसकी सगी बहनें हैं। झूठ मनुष्य को शान्ति, प्रेम और सहजीविता की ओर ले चलता है। इसकी मां का नाम उन्नति और बाप का नाम प्रतिष्ठा है। सच सिर्फ किस्से-कहानियों और बेवकूफों की चीजें हैं। सच पढ़ाने वाले गुरूजन अच्छी भली बीवी को बीमार और मां को मरी बताकर एडवांस लेते हुए बेहद शोभा पाते हैं। जो झूठ पर आत्मा से आस्था रखते हैं, जो झूठ की चाकलेट फ्लेवर वाली चाय दिन भर घूम-घूमकर पचासों बार पीते रहते हैं अक्सर वे ही सौ फीसदी सफल व्यक्ति बनते हैं। एक सफल व्यक्ति की  झूठ ही सच्ची पहचान है। जिन्होंने जीवन में बड़ी ऊंचाइयों का स्पर्श किया है उन्होंने झूठ की मनोहर सीढ़ी पर चढ़कर ही सब कुछ पाया है। जिसने इस हिन्दुस्तान में जन्म लेकर झूठ नहीं बोला, वह भोंदू है। भले ही हम गरीबी रेखा से नीचे हैं, हमारा देश कंगलों का है, हम धनहीन हैं परन्तु झूठ के धन के मामले में हम सबको पछाड़ सकते हैं। कहिए कितना एक्सपोर्ट करें? सच कहें तो हम सब हिन्दुस्तानी आबाल-वृद्ध मर्द- औरतें झूठ के चलते-फिरते कारखाने हैं। सच्ची, झूठ मत समझिए। कहिए, कितना माल सप्लाई कर दें।

(अदिति)