नया साल और मित्र प्यारे 

मेरे घर पर साल 2026 की शुरुआत मित्रों की महफिल से हुई। 10 जनवरी को रघबीर सिंह सिरजना और उनकी जीवन संगिनी सुलेखा को आना था, लेकिन प्रिंसिपल सरवन सिंह बाज़ी मार गए, जिन्होंने अजकल देश की बजाय विदेश अपना लिया हैं। दोनों कनाडा में रहते हैं, सरवन सिंह टरांटो और रघबीर वैंकूवर। रघबीर की बेटी रचना तो वैंकूवर की शिक्षा मंत्री रह चुकी हैं। कोई भी आए जब मिलते हैं तो दुनिया भर के मित्र-प्यारों की बातें होती हैं। रघबीर के साथ साहित्यकारों की और सरवन के साथ पारिवारिक साझ और आम बातें।
सरवन सिंह 5 जनवरी को आए थे। उन्हें लाने वाला नवदीप गिल था, जो अढ़ाई दशक पहले पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला में मेरा विद्यार्थी था और अब पंजाब सरकार के जन सम्पर्क विभाग में डिप्टी डायरेक्टर है। उनके साथ प्रसिद्ध गीतकार शमशेर संधू भी था। इसके अलावा मिलने आने वालों में मुकंदपुर निवासी  गुरचरण सिंह शेरगिल और सरवन सिंह का बेटा जगविंदर सिंह भी, जो कॉलेज में सीनियर प्रोफेसर है। मुकंदपुर मेरे पैतृक गांव सोनी के इतना पास है कि मैं सरवन सिंह और शेरगिल परिवारों की मेहमान निवाज़ी का दो-तीन बार आनंद ले चुका हूं। जगविंदर सिंह की जीवन संगिनी परमजीत कौर वहां के सीनियर सैकेंडरी स्कूल की प्रिंसिपल हैं। शेरगिल दरिया-दिल योद्धा है। अपने बेटे अमरदीप के अचानक देहांत के बाद उन्होंने अपने इलाके में शिक्षा का मार्ग प्रशस्त करना अपना मुख्य उद्देश्य बना लिया है। मकंदपुर स्थित कॉलेज और स्कूल अमरदीप की याद को समर्पित हैं। 
सरवन सिंह से मुलाकात हो तो डॉ. एस.एस. जौहल की बात भी होती है, जो मुझसे साढ़े तीन साल बड़े हैं और पंजाब एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी में काम करते समय मेरे सहकर्मी थे। मुकंदपुर उनका ससुराल है। मैं उनसे दो वर्ष पहले मिला था। अब सरवन से पता चला कि उन्होंने भी छड़ी पकड़ ली है। 
मुकंदपुर के ज़िक्र ने मुझे अपनी जवानी के वे सफर भी याद करवा दिए, जब मैंने लुधियाना की समराला तहसील के अधीन आती खन्ना मंडी से रेलगाड़ी में सवार होकर फगवाड़ा जंक्शन से बंगा को जाने वाली गाड़ी पकड़नी होती थी। तब फगवाड़ा स्टेशन पर अखबार बेचने वाले के शब्द मुझे आज भी याद हैं, ‘अजीत, मिलाप, प्रताप, प्रभात अखबार ऐ।’
यह सबब की बात है कि  ‘अजीत’ के संस्थापक डॉ. साधु सिंह हमदर्द की 110वीं जन्मतिथि 1 जनवरी को थी। उस दिन अखबार में उनकी तस्वीर देखकर मुझे यह भी याद आ गया कि उनका जन्म बंगा से मेरे गांव सोनी जाने वाले रास्ते में पड़ते गांव मठवाली पद्दी का था। मेरी मां ने उस गांव में एक घर ढूंढ रखा था जहां से लस्सी लाकर अपने साथ लाए पराठे खाती थीं। वैसे उनके पास मायके से लाए गए पराठे इतने होते थे कि उस घर के बच्चे भी खाते थे। यह भी कि उस घर की महिला भी हमें लस्सी के साथ मक्खन देना नहीं भूलती थीं। अब मुझे वह घर भूल चुका है। 
स. हमदर्द जी की तस्वीर देखकर मुझे यह भी याद आ गया कि 11 फरवरी, 1966 को जालन्धर से जिन तीन शख्सियतों को मैंने अपनी बारात में शामिल करने के लिए अपनी कार में बैठाया था। उनमें साधु सिंह हमदर्द, ‘अकाली पत्रिका’ के शादी सिंह और प्रसिद्ध कवि प्रो. मोहन सिंह शामिल थे। मैं दूल्हा भी था और ड्राइवर भी। उस समय ऐसा ही होता था।
देश सेवक अखबार के तीस साल
‘अजीत’ की बात चली है तो देश सेवक का ज़िक्र करना भी बनता है। इसे जारी हुए तीस साल हो गए हैं। इसके संस्थापक हरकिशन सिंह सुरजीत ने मुझे इसका सम्पादकीय सौंपा था। ‘सिरजना’ के रघबीर सिंह ने मेरा नाम सुझाया था। मुझे इस बारे में पता नहीं था। उस दिन मैं जालन्धर में ‘अजीत’ के दफ्तर गया तो मुझे स. बरजिन्दर सिंह हमदर्द के पास बैठे दो ही मिनट हुए होंगे कि उन्हें सम्पादकीय स्टाफ से किसी का फोन आया। वह जानना चाहता था कि मैं सुरजीत की पत्रिका का सम्पादक बन रहा हूं या नहीं?
स. बरजिन्दर सिंह ने मुझे सवालिया नज़र से देखा। मुझे बिल्कुल पता नहीं था। ‘वे आपको लगाना चाहते हैं।  गुरबचन जगत ने मुझे बताया है।’ स. बरजिन्दर सिंह ने बात खत्म की। वह जानते थे कि मुझे गुरबचन जगत के साथी सुरजीत के साथ मेल-मिलाप की पूरी जानकारी है। जब मैंने स. बरजिन्दर सिंह से जाने की इजाज़त मांगी तो उन्होंने ताइद की कि मैं हां कर दूं। जब मैं उनके कमरे से बाहर निकलने लगा तो पीछे से एक बार और आवाज़ आई, ‘इन्कार मत करना।’ पांच-सात दिन तक हरकिशन सुरजीत और अन्य लोगों का आमंत्रण भी गया और मुझे नए अखबार का सम्पादकीय सौंप दिया गया, जिसे मैंने अपने तरीके से चलाया। 
दो महिलाओं का चले जाना
इन दिनों के दो समाचार और भी हैं जो मेरे लिए निजी हैं। मेरे सूबेदार ताया की बहू राजदीप कौर का निधन हो गया। वही थीं जिन्होंने मेरे पैतृक गांव की घूंघट ओढ़ कर तथा घाघरा पहन कर घर से बाहर जाने की राजपूतानी भावना को तोड़ा था। मुझे इसका यह लाभ हुआ कि मेरे विवाह के बाद मेरी पत्नी सुरजीत कौर को मैदान साफ मिल गया। मार्ग प्रशस्त करने वाली मेरी भाभी राजदीप थीं, जिन्होंने मेरी पत्नी तो क्या उनके बाद सिख घरों की बहू बनने वाली महिलाओं के लिए भी यह पाबंदी हटा दी थी।
दूसरी खबर जो मुझसे निजी रूप से जुड़ी है, वह है पंजाबी कावयित्री सुरजीत कौर बैंस का अचानक निधन हो जाना। कल तक उनके मोहाली वाले घर पर साहित्यकारों की महफिलें लगती थीं। उनके पहले काव्य संग्रह का नाम ‘इह रात जागदी है’ था और आखिरी ‘मैं नहीं जाना’ था जिसके विमोचन की तैयारियां हो चुकी थीं और समय-स्थान ढूंढना ही शेष था।
दोनों नब्बे वर्ष की होने वाली थीं, किसी को कोई दुख नहीं सहन करना पड़ा। मैं खुश हूं। 

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