बांग्लादेश में अल्प-संख्यकों की दुर्दशा

1947 में देश के विभाजन के समय पाकिस्तान दो भागों पश्चिमी पाकिस्तान और पूर्वी पाकिस्तान के रूप में अस्तित्व में आया था। इन दोनों भागों के बीच समुद्र द्वारा हज़ारों किलोमीटर की दूरी थी। पाकिस्तान चाहे धर्म के नाम पर अस्तित्व में आया था परन्तु इसका ढांचा हमेशा ही बेहद जटिलतापूर्ण बना रहा है, क्योंकि उस समय भारत में मुस्लिम जनसंख्या पाकिस्तान से कहीं अधिक थी। पाकिस्तान के इन दोनों भागों में भाषा, सभ्याचार और जीवन प्रक्रिया के पक्ष से इतना बड़ा अंतर था कि एक ही धर्म की मान्यताएं भी इन दोनों देशों के लोगों को जोड़ कर रखने में असमर्थ रही थीं। यही कारण था कि वर्ष 1971 में एक लम्बे संघर्ष के बाद पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश अस्तित्व में आ गया था। उस समय पश्चिमी पाकिस्तान की सेना द्वारा पूर्वी पाकिस्तान पर बेहद अत्याचार किए गए थे और उसकी सेना ने लाखों की संख्या में लोगों की हत्या की थी, परन्तु बांग्लादेश बनने के बाद भी यह देश लगातार गड़बड़ ग्रस्त रहा और अभी तक यह देश ़गरीबी और राजनीतिक जटिलाओं में फंसा दिखाई देता है। 
श़ेख मुजीब-उर-रहमान जिन्हें बंग बंधू भी कहा जाता है, का देश की आज़ादी हासिल करने में अहम योगदान था। उनको और उनके परिवार के बहुत-से सदस्यों को 15 अगस्त, 1975 में गोलियों से भून दिया गया था। उस समय बंग बंधू की दो बेटियां श़ेख हसीना और उनकी एक बहन ही जीवित बची थीं। श़ेख हसीना ने बाद में हिम्मत करते हुए पिता की राजनीतिक विरासत को सम्भाला था। फिर लम्बे संघर्ष के बाद पिता द्वारा बनाई पार्टी अवामी लीग को मिले भारी जन-समर्थन के बाद वह बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनी थीं। उससे पहले कई सैनिक जनरलों द्वारा किया गया कत्लेआम के बाद राजनीतिक मंच पर बांग्लादेश नैशनलिस्ट पार्टी नाम की एक अन्य पार्टी भी उभरी थी। देश की राजनीति में खालिदा ज़िया और श़ेख हसीना का राजनीतिक टकराव बना रहा था। ़खालिदा ज़िया की पार्टी जमात-ए-इस्लामी नामक पार्टी के सहयोग से सत्ता में बनी रही थी। इसलिए भारत के साथ उनके संबंध कभी भी अच्छे नहीं रहे थे, परन्तु श़ेख हसीना ने समय-समय पर प्रधानमंत्री बनने पर भारत के साथ संबंध अच्छे बनाने और सहयोग बढ़ाने का हमेशा यत्न किया। वह हमेशा ही बांग्लादेश की आज़ादी में भारत की ओर से दिए गए योगदान का सम्मान करती रही थीं, उन्हें यह एहसास था कि भारत की सहायता के बिना बांग्लादेश को आज़ादी नहीं मिल सकती थी। इसलिए उनके लम्बे शासन के समय में उन्हें धार्मिक कट्टरपंथियों द्वारा और अपनी विपक्षी पार्टियों द्वारा कठिन चुनौतियों मिलती रहीं। इसलिए उन्होंने अपने शासन को सख्ती से चलाने की नीति अपनाई जो अंत में उनके लिए नुक्सानदायक सौदा सिद्ध हुई।
आतंकवादियों और विरोधियों के साथ मिल कर पाकिस्तान और चीन द्वारा लम्बी अवधि तक बनाई गई साज़िशें सफल हुईं और श़ेख हसीना की निर्वाचित सरकार का 17 अगस्त, 2024 में तख्ता-पलट कर दिया गया। जिस कारण उन्हें अपना देश छोड़ कर भारत में शरण लेनी पड़ी थी। उसके बाद बांग्लादेश में अस्थायी रूप में नोबल पुरस्कार विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में सरकार बनाई गई। इस सरकार में मोहम्मद यूनुस को मुख्य सलाहकार का पद दिया गया था परन्तु यह सरकार प्रभावशाली ढंग से प्रशासन चलाने में असमर्थ रही और देश लगातार गड़बड़ग्रस्त ही दिखाई देता रहा। इसके बाद श़ेख हसीना के विरुद्ध आन्दोलन करने वाले छात्र नेता शऱीफ उस्मान हादी की विगत दिसम्बर में हत्या कर दी गई। इसके उपरांत एक बार फिर बांग्लादेश में उबाल आया और इसका शिकार वहां के अल्प-संख्यक बने। बांग्लादेश में इस समय हिन्दू अल्प-संख्यक समुदाय की जनसंख्या 7.94 प्रतिशत है, जबकि बौद्ध 0.60 प्रतिशत और ईसाइयों की संख्या 0.30 प्रतिशत है, परन्तु वहां पैदा हुई हिंसा का शिकार ज्यादातर हिन्दू समुदाय के लोग ही हो रहे हैं। विगत वर्ष एक दिसम्बर के बाद वहां 51 से अधिक साम्प्रदायिक हिंसक घटनाएं हुईं, जिनके कारण अब तक 10 हत्याएं, 10 डकैतियां और 23 मामले अल्प-संख्यक समुदाय के लोगों के घरों और व्यापारिक संस्थानों पर कब्ज़ों के अतिरिक्त मंदिरों को लूटने और तबाह करने के सामने आए हैं। इन ज्यादातर घटनाओं में दीपू चंद्रा दास जो मैमन सिंह इलाके का था, को पीट-पीट कर मारने के बाद उसके शव को वृक्ष से टांग कर जलाने का मामला भी शामिल था। 
भारत की ओर से लगातार इन घटनाओं संबंधी बांग्लादेश के समक्ष कड़ी आपत्ति भी प्रकट की जाती रही है। एक बार फिर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने चेतावनी दी है कि वहां की सरकार द्वारा अल्प-संख्यक समुदायों के विरुद्ध घटित हो रहीं इन हिंसक घटनाओं को सख्ती से रोका जाना चाहिए, परन्तु इसके बावजूद यूनुस की सरकार इस संबंध में प्रभावशाली कदम उठाने में असमर्थ रही है। इससे एक बार फिर दोनों देशों के बीच दूरी और कटुता बढ़नी शुरू हो गई है। दूसरी तरफ बांग्लादेश सरकार को पाकिस्तान और चीन पूरी शह दे रहे हैं। उनकी ओर से भारी संख्या में बांग्लादेश को तरह-तरह के हथियार भी दिए जा रहे हैं। यह स्थिति भारत और यहां के अल्प-संख्यकों के लिए बेहद चिन्तजनक है। इस मुद्दे को भारत की ओर से प्रभावशाली ढंग से अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर उभारना चाहिए, ताकि वहां अल्प-संख्यक समुदायों की सुरक्षा बनी रहे, नहीं तो आज जिस तरह अ़फगानिस्तान और पाकिस्तान में अल्प-संख्यक समुदाय गिनती  योग्य ही रह गए हैं, उस प्रकार की स्थिति बांग्लादेश में भी बनती दिखाई दे रही है, जो भारत के लिए एक और बड़ी चुनौती बन सकती है, जिससे भविष्य में निपट पाना देश के लिए बेहद मुश्किल होगा।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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