प्राकृतिक सम्पदा सम्पन्न छोटे देशों पर कब्ज़े का बढ़ता रुझान खतरनाक

बड़े देश अपने से छोटे लेकिन प्राकृतिक संपदा से युक्त देशों पर हमेशा से कब्ज़ा करते रहे हैं। 
सच का सामना : जहां एक ओर भारत किसी अन्य देश पर आर्थिक या सैन्य हमला कर उसे अपने आधीन करने का विरोधी रहा है, दूसरी ओर अपने देश के कई नागरिक नगरों, महानगरों, कस्बों और यहां तक कि देहाती क्षेत्रों में जब भी मौका मिले, उस ज़मीन पर कब्ज़ा कर लेने की सोच रखते हैं, विशेष रूप से जो उसकी नहीं, सरकारी है। यह परम्परा स्वतंत्र होने और इतने वर्ष बाद भी देश के सभी प्रदेशों में अतिक्रमण के नाम से जानी जाती है। हाल ही का उदाहरण है। दिल्ली के तुर्कमान गेट पर कब्ज़ाई सरकारी भूमि पर बनी इमारतों को हटाने के लिए कार्रवाई हुई तो स्थानीय लोगों ने अपने राजनीतिक आकाओं के उकसाने पर पत्थरबाज़ी कर न केवल बाधा डाली बल्कि बड़े-बड़े वकील सुप्रीम कोर्ट तक में इसके खिलाफ याचिका दायर करने की मंशा ज़ाहिर करने लगे। 
गौर करने की बात है कि यह अतिक्रमण एक दिन में नहीं हुआ। इन सब अवैध इमारतों को बनने में समय लगा होगा, क्योंकि यह सब बहुत सुनियोजित साठ-गांठ करके ही हुआ होगा। इसलिए पुलिस और प्रशासन इस दौरान आंख मूंद कर बैठे रहे। जब कुछ लोगों ने भरपूर धन दौलत या काली कमाई जमा कर ली और इन जगहों पर लोगों का चलना फिरना और रहना मुश्किल होने लगा तो तुरंत कार्रवाई कर बुलडोज़र चल गए। अब जो हंगामे के हालात बने वे एक बड़े पैमाने पर दंगे भड़कने की तैयारी में बदलने लगे। यही प्रक्रिया कमोबेश हर जगह दोहराई जाती है। उसके बाद लम्बी अदालती लड़ाई और जिसकी लाठी उसकी भैंस की तज़र् पर जो जितना कुछ हथियाने में कामयाब, वह उसका और उसके बाप-दादा की जिस पर कानूनी वसीयत भी बन जाती है। 
अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अतिक्रमण या विस्तारवाद की बात समझते हैं। बड़े देश जैसे कि अमरीका का वेनेजुएला पर कब्ज़ा। छोटे देश जो शक्तिशाली नहीं लेकिन उनकी प्राकृतिक संपदा—जैसे तेल और खनिज भंडार बड़े देशों का उन पर अधिकार करने का कारण बन जाते हैं, वे या तो स्वयं समर्पण कर देते हैं या फिर थोड़े बहुत विरोध के बाद बड़े देश का आधिपत्य स्वीकार कर लेते हैं। अन्य उदाहरणों में रूस का यूक्रेन को, चीन की ताइवान जैसे पड़ोसियों को हड़पने की कोशिश जो कभी शांतिदूत बन कर दो बिल्लियों की लड़ाई में बंदर की भूमिका निभाने की होती है या फिर सीधे हमला कर उसे हासिल कर लिया जाता है। इन बड़े देशों का एक ही लक्ष्य होता है कि छोटे देशों की आज़ादी, संसाधन और उनकी पहचान को मिटाकर अपना सांस्कृतिक और आर्थिक प्रभुत्व स्थापित करना। यह दशकों से लेकर सदियों तक चलता रहा है और यह सिलसिला थमने वाला नहीं क्योंकि लालच की कोई सीमा नहीं होती और महान बनने की लालसा कभी खत्म नहीं होती। 
भारत की पहचान : देश में आंतरिक तनाव, ग्रह युद्ध जैसे हालात और अव्यवस्था होते हुए भी भारत सरकार इन पर काबू पाने और इनके बेलगाम होने पर रोक लगाने में सफल रही है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत इन सभी बड़े और आर्थिक तथा सैन्य दृष्टि से संपन्न देशों के प्रति अनोखी उदारता दिखाता रहा है। अपनी जीती हुई ज़मीन लौटाने के लिए प्रसिद्ध है, बंजर कह कर हज़ारों किलोमीटर भूमि चीन को दे देता है, स्वतंत्र बांग्लादेश अपने सैनिकों का बलिदान देकर बनवा देता है। इसी तरह बहुत-से ऐसे उदाहरण हैं जिनमें भारत ने खोया तो बहुत, लेकिन पाया कुछ नहीं। यह एक तरह से इतिहास में कुछ लोगों का विश्व में महान कहलाने का प्रयास है, इसके अलावा कुछ नहीं।
ज़रा सोचिए, अपने देश के टुकड़े करने की सहमति और कश्मीर में उपद्रवियों के आगे समर्पण और देश की बर्बादी का ऐलान करने वालों को बचाने की मुहिम क्या दर्शाती है? देश में लाखों हेक्टेयर भूमि का अतिक्रमण होते देखना तो एक मामूली बात है। रेलवे और सार्वजनिक भूमि पर बड़ी संख्या में स्लम बस्तियों और झुग्गी-झोंपड़ियों का होना तथा उन्हें बनाए रखने में अपनी विजय समझना भारत में ही संभव है। सड़क और फुटपाथ पर कब्ज़ा कोई अनहोनी नहीं, वहां परिवार सहित बसना वोटर की पहचान बन जाए, यह हमारे यहां तारीफ की बात है। इन्हें हटाने के प्रयास गरीब को उजाड़ना है क्योंकि इसकी आड़ में प्रभावशाली लोगों के अवैध निर्माणों पर नज़र ही नहीं पड़ती। इसके बाद पुनर्वास और पुनर्स्थापन के नाम पर हज़ारों की संख्या में कॉलोनियां बन जाती है, जहां दिन में रात का अंधेरा और कीड़े-मकौड़े की तरह ज़िदगी पनपती रहती है। बुलडोज़र जस्टिस शब्द पर विवाद हो सकता है, लेकिन इसके बिना कोई अन्य विकल्प नहीं है जो इस समस्या का समाधान कर सके। 
विश्व में भारत की भूमिका : अनेक विपरीत परिस्थितियों के बावजूद, बहुत वर्षों बाद राजनीतिक स्थिरता के बल पर भारत जिस प्रकार आर्थिक संपन्नता, औद्योगिक विकास और टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के साथ सतत विकास की नीति पर पिछले एक दशक से चल रहा है, संभावना है कि जो देश हमारी सीमाओं से जुड़े हैं, उनमें चीन के अतिरिक्त सभी देश आने वाले दशक में भारत के साथ आते जाएंगे। राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर कठिनाई हो सकती है, लेकिन व्यावहारिक रूप से नेपाल, भूटान, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार तथा आस-पास के छोटे देश और यहां तक कि पाकिस्तान से लेकर अफगानिस्तान और ईरान तक भारत को केंद्रीय शक्ति के रूप में स्वीकार कर एक वैश्विक महासंघ बनने की भविष्यवाणी सत्य कर सकते हैं। इसका मतलब यह है कि क्योंकि सार्क की भूमिका लगभग समाप्त हो चुकी है, पाकिस्तान अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है, बांग्लादेश आंतरिक संघर्ष से जूझ रहा है तो ये देश भारत के साथ शत्रुता का भाव रखते हुए भी हमसे सहयोग करने के लिए विवश होंगे। 
इस संभावना का प्रबल कारण है। अमरीका का भारत और उसके जैसे देशों के प्रति विरोधी रूख अपनाना, उसकी बात न मानने पर प्रतिबंध और ऊंचा टैरिफ लगाना ताकि अर्थव्यवस्था चौपट हो जाए। रूस के साथ कूटनीतिक संबंधों और व्यापारिक हितों में टकराव पैदा हो जिसका लाभ अमरीका को मिल सके। चीन पर दबाव के बावजूद अमरीका की निराशा बढ़ रही है और वह कोई भी कदम उठा सकता है। इस स्थिति में एकमात्र विकल्प है कि भारत का नेतृत्व दक्षिण, पूर्वी और पश्चिमी एशिया के देश स्वीकार करें ताकि एक सामूहिक ताकत के रूप में सामने आकर सभी सनकी देशों की चुनौतियों का सामना किया जा सके। 

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