सकारात्मक है पंजाब सरकार का नशे के खिलाफ दूसरे चरण का अभियान

चले तो पांव के नीचे कुचल गई कोई शैअ,
नशे की झोंक में देखा नहीं कि दुनिया है।
शहाब जाफरी का यह शे’अर नशे के मारों की किस्मत का सही चित्रण करता है कि नशा करने वालों को पता ही नहीं लगता कि उन्होंने अपनी ही दुनिया पांवों के नीचे कुचल दी है। पंजाब में नशे के खिलाफ युद्ध लम्बे समय से जारी है और यह भी निश्चित बात है कि नशे पुलिस तथा राजनीतिज्ञों के संरक्षण या नशे के बड़े तस्करों से उनके गठजोड़ के बगैर नहीं बिक सकते। यह ठीक है कि राजनीतिक पार्टियां तथा सरकारें जो भी करती हैं, उनका सबसे पहला लक्ष्य राजनीतिक लाभ ही होता है, परन्तु फिर भी पंजाब सरकार द्वारा ‘युद्ध नशे विरुद्ध’ के दूसरे चरण में ‘पिंडां दे पहरेदार’ अभियान की शुरुआत एक अच्छी पहल कही जा सकती है। चाहे इसकी स्थिति एक ओर ‘देर आयद दुरुस्त आयद’ वाली है और दूसरी ओर यह 2027 के चुनावों में लाभ उठाने के लिए भी एक अच्छी रणनीति होगी, क्योंकि इस अभियान से जुड़ने वाले एक लाख 50 हज़ार वालंटियर की पंजाब के सभी लगभग 13000 गांवों में गठित की जाने वाली ‘गांव सुरक्षा कमेटियां’ जहां नशे के खिलाफ अभियान चलाएंगी, वहीं ये लोग स्वाभाविक रूप में सरकार के निकट जाएंगे और इसलिए वे आम आदमी पार्टी की शाखाओं में कार्यकर्ताओं की कमी को भी अप्रत्यक्ष रूप में पूरा करेंगे। वे पार्टी-ढांचे की कमी का विकल्प बन सकते हैं। इन कमेटियों में प्रति गांव 10 से 20 कार्यकर्ता होंगे। परोक्ष लक्ष्य चाहे कुछ भी हों, परन्तु नशे के खिलाफ चरण-2 के कार्यक्रम में घर-घर जाकर नशे के खिलाफ संदेश देना तथा नशा करने वालों की सूचियां बना कर उन्हें नशा छुड़ाओ केन्द्रों में भेजना तथा पुनर्वास केन्द्रों में 1500 के स्थान पर बढ़ाए गए 5000 बिस्तरों का प्रबंध करना वास्तव में ही एक प्रशंसनीय कदम है। 
नि:संदेह पंजाब सरकार का ‘युद्ध नशे विरुद्ध’ अभियान का पहला चरण पूरी तरह सफल नहीं कहा जा सकता, परन्तु फिर भी इस संबंध में दिए जा रहे आंकड़े प्रभावशाली हैं। चाहे विपक्ष इन आंकड़ों को रद्द करते हुए इस लड़ाई को कागज़ों पर लड़ी जा रही लड़ाई करार दे रहा है और धरातल पर इसका कोई फर्क नहीं मानता। परन्तु यह देखने वाली बात है कि वर्ष 2015 से 2024 तक एनडीपीएस कानून के तहत पंजाब में लगभग कुल 51000 मामले ही दर्ज हुए थे और 4600 किलो हैरोइन पकड़ी गई थी, परन्तु ‘युद्ध नशे विरुद्ध’ अभियान के दौरान मार्च, 2025 से दिसम्बर तक 9 माह में ही 30,144 मामले नशा एक्ट के तहत दर्ज हुए और 40,302 गिरफ्तारियां की गई हैं। इस दौरान 2021 किलो हैरोइन पकड़ी गई जो पूरे भारत में इस समय के दौरान पकड़ी गई हैरोइन का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा है। इस दौरान नशा बेचने वालों की 263 करोड़ की सम्पत्तियां भी ज़ब्त की गईं, चाहे यह आरोप लगता है कि नशे के बड़े मगरमच्छों को हाथ नहीं डाला गया। इस दौरान सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि पुलिस द्वारा नशा एक्ट में दर्ज किए गए लगभग 6000 मामलों में से अदालतों में 88 प्रतिशत मामलों में आरोपियों को सज़ा हुई है। हालांकि यह दावा भी किया जा रहा है कि अब तक 20 हज़ार नशेड़ियों को नशा छुड़ा दिया गया है, परन्तु वास्तव में कितने लोग नशा छोड़ कर नशे छुड़ाने वाली गोलियों का ही नशा करने लग पड़े हैं, इसकी कोई अध्ययन नहीं करवाया गया। नशा करने वालों के परिवारजनों के मन की हालत वसीम बरेलवी के इस शे’अर जैसे होती है : 
क्या दुख है समुंदर को बता भी नहीं सकता,
आंसू की तरह आंख तक आ भी नहीं सकता।
नशा छुड़ाओ केन्द्रों की लगातार जांच ज़रूरी
उपरोक्त दर्ज उपलब्धियों के बावजूद पंजाब में से नशा खत्म नहीं हुआ। आज भी नशे की अधिक मात्रा से मौतें होने के समाचार आते ही रहते हैं। वास्तव में नशा छुड़ाओ केन्द्रों पर सरकार का नियंत्रण विशेषकर निजी नशा छुड़ाओ केन्द्रों पर तो बिल्कुल ही दिखाई नहीं देता। ऐसी चर्चा आम सुनने को मिलती रहती है कि कई मंज़ूरशुदा नशा छुड़ाओ केन्द्रों से नशा छुड़वाने के लिए दी जाती गोलियां वास्तव में नशा पूर्ति का काम करती हैं। ये बेची जाती हैं, पंजाब के गांवों में खुम्भों की भांति गैर-मंज़ूरशुदा नशा छुड़ाओ केन्द्र भी खुले हुए हैं, जहां पैसे लेकर नशेड़ियों को बहुत बुरी हालत में बांध कर रखा जाता है और मारपीट भी की जाती है। आरोप तो अन्य भी कई तरह के लगते हैं। यह चर्चा भी आम सुनने को ंिमलती है कि मंज़ूरशुदा नशा छुड़ाओ केन्द्रों में मानसिक रोगों के डाक्टरों को उनके नाम लिखने के पैसे ही मिलते हैं। वे काम कही और ही करते हैं और इन केन्द्रों में कभी-कभी घंटा-आधा घंटा चक्कर लगाते हैं। पंजाब सरकार को चाहिए कि सभी मंज़ूरशुदा केन्द्रों में सभी आवश्यक शर्तें लागू करवाने के लिए कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित बनाई जाए और प्रत्येक सप्ताह आकस्मिक जांच ज़रूरी बनाई जाए था यह जांच कम से कम 3 या 4 विभाग बिना तालमेल के करें। एक ही अधिकारी के पास जांच का होना तो गठजोड़ बना देता है।
ज्ञानी हरप्रीत सिंह की पकड़ मज़बूत हुई
समझने ही नहीं देती सियासत हमको सच्चाई,
कभी चेहरा नहीं मिलता कभी दर्पण नहीं मिलता।
हालांकि अकाली दल पुनर-सुरजीत, जिसका नाम चुनाव आयोग के पास रजिस्टर्ड होने के बाद बदल जाने के आसार हैं, में धीरे-धीरे इसके अध्यक्ष ज्ञानी हरप्रीत सिंह की पकड़ मज़बूत हो गई है। इस अकाली दल में उनके बहुत-से विरोधी समझे जाते नेता धीरे-धीरे उनका नेतृत्व स्वीकार करते जा रहे हैं। इस पार्टी में उनके मुकाबले खड़ी की गई पंथक कौंसिल का मामला भी लटक गया प्रतीत होता है। कौंसिल की प्रमुख बीबी सतवंत कौर अभी भी शिरोमणि कमेटी में अपनी नौकरी कर रही हैं। पता चला है कि इस पार्टी की रजिस्ट्रेशन के बाद यह नया अकाली दल अपना सारा ज़ोर शिरोमणि कमेटी के जनरल हाऊस के लम्बे समय से लटक रहे चुनाव करवाने के लिए केन्द्र सरकार को मजबूर करने पर लगाएगा। इस उद्देश्य के लिए दिल्ली में मोर्चा लगाने की घोषणा भी की जा सकती है। चाहे ज्ञानी हरप्रीत सिंह इसकी पुष्टि नहीं करते, परन्तु उनका यह कहना साफ-साफ ऐसे किसी मोर्चे की ओर संकेत देता है। उनका कहना है कि हम ऐसे हालात बना देंगे कि शिरोमणि कमेटी पर काबिज़ पक्ष (अकाली दल बादल) भी शिरोमणि कमेटी के महाधिवेशन के चुनाव करवाने की मांग करने के लिए मजबूर हो जाएगा। 
उल्लेखनीय है कि पार्टी की एक बैठक में पार्टी के भीतरी विरोधियों से तंग आकर एक बार इस्तीफे की पेशकश करने के बाद ज्ञानी हरप्रीत सिंह तथा पार्टी के महासचिव गुरप्रताप सिंह वडाला विरोधियों को सहयोग के लिए मजबूर करने में सफल रहे हैं।
़खैर, इस समय तो प्रो. प्रेम सिंह चंदूमाजरा, बीबी जगीर कौर, सुरजीत सिंह रखड़ा, परमिन्दर सिंह ढींडसा, मनप्रीत सिंह इयाली, संता सिंह उमैदपुरी, इकबाल सिंह झूंदा तथा कई अन्यों ने ज्ञानी जी के साथ चलने का फैसला कर लिया प्रतीत होता है। इस मध्य हमारी जानकारी के अनुसार ‘अकाली दल वारिस पंजाब दे’ के प्रमुख भाई अमृतपाल सिंह के पिता बापू तरसेम सिंह जो इस समय पार्टी चला रहे हैं, द्वारा आगामी कुछ दिनों में ही ज्ञानी हरप्रीत सिंह के साथ मुलाकात किए जाने की उम्मीद है। उनकी ओर से मकर संक्रांति पर की जाने वाली कांफ्रैंस में ज्ञानी हरप्रीत सिंह की पार्टी का सहयोग लेने तथा वह मंच साझा करने के लिए भी कहा जा सकता है और कुछ पंथक मामलों पर साझी राय बनाने के लिए भी विचार कर सकते हैं, परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि ज्ञानी हरप्रीत सिंह अकाली दल वारिस पंजाब के साथ शिरोमणि कमेटी चुनाव में इकट्ठे चलने के लिए तो तैयार होंगे, परन्तु राजनीतिक  रूप में अपनी पार्टी को अपने पैरों पर खड़ा करने को ही प्राथमिकता देंगे, क्योंकि कोई भी राजनीतिक पार्टी राजनीति के मंझधार में किनारे पर खडा होकर सफल नहीं हो सकती।
तूफान में हो नाव तो कुछ सब्र भी आ जाए,
साहिल पे खड़े हो के तो डूबा नहीं जाता।
(मुजफ्फर वारसी)

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