इंदौर में सप्लाई के बाद अब बोरिंग का पानी भी दूषित निकला

इंदौर में दूषित पेयजल की आपूर्ति से हुई मौतों के बाद चेता प्रशासन-शासन, जब तक किसी कार्रवाई को ठोस मुकाम पर पहुंचा पाता तब तक, उसके लिए एक बुरी खबर ने चिंताजनक स्थितियां पैदा कर दीं। यहां के भागीरथपुरा में नर्मदा के प्रदूषित जल के बाद अब बोरिंग का पानी भी दूषित मिला है। दुखद और शर्मशार करने वाली खबर यह कि जो पानी मिला है वह कोलिफार्म बैक्टीरिया से ग्रसित है। यह बैक्टीरिया मानव सेहत के लिए जहर का काम करता है। स्थानीय कलेक्टर शिवम वर्मा ने इसकी पुष्टि की तो यहां के प्रशासन के साथ ही उन सभी बोरिंग मालिकों के होश उड़ गए जिन्होंने अपने घरों में बोरिंग करवा रखा है या फिर वह बोरिंग से प्राप्त पानी से अपना जीवनयापन करते हैं। 
पहले नर्मदा जल में मल-मूत्र के विषाणु मिले थे अब बोरिंग के जो सैंपल लिए गए थे, उसमें से भी 35 सैंपल फेल हो गए हैं। मतलब यह कि उनमें भी यही विषाणु मिले हैं। स्पष्ट है कि अब इंदौर के लिए स्थिति खतरनाक हो गई है। यहां पर ना तो नर्मदा का और न ही बोरिंग का पानी पीने योग्य बचा है। इंदौर के बाद गुजरात के गांधी नगर में भी पानी बीमारी बनकर सामने आया और यहां पर 150 से अधिक बच्चे और बड़े गंदा पानी पीकर बीमार होकर अस्पताल पहुंच गए। प्राकृतिक पर्यावरण चक्र के प्रकोप से जूझ रही भारत की धरती के लिए वर्ष 2026 के 5वें दिन आयी इस बुरी खबर ने जल जीवन मिशन व भूमिगत जल भंडार के जानकारों के लिए एक नया विषय खड़ा कर दिया है कि जल वितरण की कौन सी प्रणाली को अपनाएं जिससे दूषित पेयजल से बचा जा सके। 
जब पेयजल के प्रदूषित होने और उसके पीछे का कारण सामने आ गया है, तो यह बात बलवती हो जाती है कि भारत में अब स्वच्छता सर्वेक्षण का दायरा बढ़ाया जाना चाहिए और इसे जमीन के ऊपर के साथ ही आसमान तथा धरती के भीतर भी लागू किया जाना चाहिए। विशेषज्ञ मानते हैं कि इसके लिए अब एकदम सटीक और बेहतरीन समय है। यही समय है जब नदियों में पानी प्रचुर मात्रा में है और आसमान में प्रदूषण का स्तर ग्रीष्म ऋतु के मुकाबले सर्वाधिक होता है। इससे काफी हद तक सही जानकारी सामने आ सकती है। जहां तक धरती के भीतर स्वच्छता सर्वेक्षण की बात है, तो वह उतना ही ज़रूरी हो गया है जितना कि धरती के ऊपर का सर्वेक्षण। 
भारत में होने वाला स्वच्छता सर्वेक्षण अपशिष्ट प्रबंधन के साथ ही स्वच्छता में सही प्रबंधन से सुधार लाने का एक-एक ऐसा अभियान है जो शहरी विकास में ही नहीं पर्यावरण की स्वच्छता में भी खास स्थान रखता है। वर्ष 2014 में आरंभ हुए इस सर्वेक्षण में प्लास्टिक पर प्रतिबंध, स्मार्ट डस्टबिन के साथ ही सीवेज सुविधाओं के विकास पर कार्य होता है लेकिन इंदौर में बोरिंग के पानी में मल-मूत्र के विषाणुओं की उपस्थिति ने सीवेज व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है और अब कोई वजह नहीं है कि धरती के भीतर की स्वच्छता पर सर्वेक्षण को टाला नहीं जाना चाहिए। बड़ी बात यह है कि इंदौर लगातार 8वीं बार देश में सफाई के मामले में पहले नंबर पर रहा है। आखिर फिर क्या कारण रहा कि यहां की सीवेज व्यवस्था इस नंबर एक को संभाल नहीं पायी और बोरिंग के पानी में मल-मूत्र वाले अंश कैसे मिले? 
पिछले माह ही केन्द्रीय आवास एवं शहरी मामलों के मंत्री मनोहर लाल ने स्वच्छता सर्वेक्षण के दसवें संस्करण के लिए जो टूल किट जारी किया है, उसकी थीम स्वच्छता की नई पहल-बढ़ाएं हाथ, करें सफाई रखी गई है। ध्यान देने वाली बात यह कि इसमें एक नई श्रेणी जोड़ी गई है। इसमें देशभर के नदी बहुल शहरों को भी शामिल किया गया है। जोर इस बात पर है कि तटीय क्षेत्रों को भी स्वच्छता के दायरे में रखा जाए और इसके लिए अलग से मैट्रिक्स तैयार हुआ है। जब अभी सर्वेक्षण के नए साल का आगाज हुआ है, तो क्यों नहीं धरती के भीतर, खासकर उन स्थानों का जहां पर पानी है और वह पानी जो पेयजल तथा घरेलू उपयोग के लिए लिया जाता है, वहां पर सर्वे हो कि यह जनसामान्य के लिए उपयोगी है या नहीं? 
यह बात पूछी जा सकती है कि आखिर धरती के भीतर के स्वच्छता सर्वेक्षण से क्या मिलेगा? तो यह जान लिया जाए इससे पता चलेगा कि जो भू-जल नदियों के पानी से, वर्षा के जल से, शहरी कच्ची सीवरेज व्यवस्था से या दूसरे कारणों से बड़ा या घटा है, वह कितना प्रदूषित है? कितना स्वच्छ है। इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि जिन शहरों में सीवर नहीं है, वहां पर कच्ची सीवर व्यवस्था है और घरों के बाहर जो एकत्रीकरण की व्यवस्था है, उसके निकटतम ही निजी बोरिंग हैं। विज्ञान कहता है कि बोरिंग और सेप्टिक टैंक के बीच कम से कम तीस मीटर की दूरी होनी चाहिए। तीस मीटर अर्थात सौ फीट। शहरों में मकानों-प्लैटों में तीस फीट का मानक कितना पूरा हो रहा है यह किसी से छिपा नहीं है। 
एक बात यह भी है कि आज बारिश न होने पर कृत्रिम बारिश जिसे क्लाउड सीडिंग कहा जा रहा है, वह भी धरती की सेहत को खराब कर रही है। कहा तो जाता है कि यह वायु प्रदूषण को कम करता है पर इससे जल प्रदूषण की समस्या बढ़ती है। सिल्वर आयोडाइड जैसे रसायन धरती को क्षति पहुंचाते हैं, पोटैशियम आयोडाइड के साथ यह मिलकर आयोडिज्म पैदा करते हैं। पाचन की समस्या इसी की देन है। धरती के भीतर के सर्वे से यह भी पता चलेगा कि डिटर्जेंट और दूसरे रसायनों से जो घुलनशील पदार्थ निकल रहे हैं, उन्होंने धरती को कितने भीतर तक प्रदूषित कर रखा है। कीटनाशक, रासायानिक खाद, माइक्रोबीड्स-माइक्रोफाइबर भी धरती के भीतर प्रदूषण ही कर रहे हैं न कि वह धरती को शुद्ध रखने में सहायक हैं। इन सब स्थितियों में इंदौर-गांधीनगर बनने से रोकने के लिए, पानी की शुद्धता के लिए, शरीर में जा रहे घातक रसायनों से बचने के लिए तथा आसमानी बारिश में मिलने वाले घातक कणों से बचने के लिए सबसे बेहतर उपाय यही है कि धरती की बाहरी सुंदरता के साथ ही धरती के भीतर की सेहत का भी ख्याल रखा जाए और सेहत के लिए उसकी बीमारी पकड़ना ज़रूरी है।

-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 
 

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