बांग्लादेश के बिगड़ते हालात

बांग्लादेश में जिस तरह हिन्दू भाइयों को टारगेट कर कोहराम की स्थिति बन रही है उससे साफ पता चलता है कि वहां की सरकार का अल्पसंख्यकों के प्रति कैसा शत्रुतापूर्ण रवैया है। किसी देश की सभ्यता और संस्कृति का पता तभी चलता है जब वहां की स्त्रियों के प्रति व्यवहार का आकलन किया जाता है। इसी तरह वहां की राजनीतिक स्थिति और मानवीय व्यवहार का पता तभी चलता है जब हम उस देश के अल्पसंख्यकों के प्रति व्यवहार का आकलन करते हैं। इस हिसाब से वर्तमान दौर में मोहम्मद यूनुस सरकार पूरी तरह से बेनकाब होती जा रही है जब हिन्दुओं के प्रति उन्मत्त भीड़ के व्यवहार को देखते हैं। दो लोगों की हत्या हो गई है जिसका विरोध पूरे भारत में किया जा रहा है। आश्चर्यजनक स्थिति यह है कि विश्व भर में मानवीय दृष्टिकोण का ढिंढोरा पीटने वाली महाशक्तियां ऐसी निंदनीय घटनाओं पर चुप बैठी हैं। हालात लगातार देश की अस्थिरता और बदअमन की तरफ संकेत कर रहे हैं और भारत के प्रति टकराव वाली स्थिति साफ दिखाई देने लगी है। पिछले वर्ष बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना का तख्ता पलट कर दिया गया। वह देश की निर्वाचित प्रधानमंत्री थीं, परन्तु विशेष योजनाबंदी की गई। जमात-ए-इस्लामी पार्टी के नेतृत्व में कट्टरपंथियों ने जनाक्रोश भड़का कर उन्हें देश छोड़ने पर विवश कर दिया। फिर अस्थाई सरकार का गठन हुआ जिसका मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस को बनाया गया। उनकी सरकार पूरे देश में फैली भीड़ तंत्र पर नियंत्रण  बनाये रखने में पूरी तरह असफल रही है। फिर भी काफी असमंजस में चुनाव करवाने की घोषणा कर दी गई, जिसकी तिथि 12 फरवरी निश्चित की गई, लेकिन चुनाव से पूर्व छात्र नेताओं की पार्टी (एन.आई.ए.) और कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी के बीच गठबंधन को लेकर फूट दिखने लगी। 
दिसम्बर 2025 में छात्र नेता उस्मान हादी की हत्या कर दी गई तब से पूरे देश में आगजनी और असुरक्षा का माहौल है। मीडिया संस्थानों पर हमले हुए हैं। हिन्दू अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है। दीपू चंद्र दास की हत्या लीचिंग जैसी दु:खद घटनाएं हो रही हैं। भारत और बांग्लादेश के संबंधों में काफी गिरावट आई है। भारत ने अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों पर कड़ी चिंता जताई है। बांग्लादेश सरकार ने इसे गम्भीरता से नहीं लिया है। 
इतिहास के साथ कितनी भी छेड़छाड़ की जाए. इतिहास नहीं बदलता। और वह यह है कि पाकिस्तानी सरकार ने 1971 में लाखों बांग्लादेश वासियों का रक्त बहाया था। उसके बाद जब शेख हसीना की सरकार बनी अवामी लीग का नेतृत्व करते हुए भारत के साथ अच्छे संबंध बने। वह हमेशा कृतज्ञ रहीं कि भारत ने बांग्लादेश की आज़ादी में शेख-मुजीब-उर-रहमान की सहायता की थी और देश को आज़ादी दिलाई थी। बाद के घटनाक्रम में उनके परिवार के ज्यादातर सदस्यों की हत्या कर दी गई, जिसमें शेख हसीना और उनकी बहन ही बच पाई थीं। शेख हसीना ने लम्बे समय तक सत्ता को सम्भाले रखा और भारत के साथ कई अच्छे संबंध स्थापित किए। परिणामस्वरूप बांग्लादेश के साथ ज़मीनी रास्ते से व्यावारिक साझ बनी रही। तब उनके साथ व्यापार को नई मंजिल मिल रही थी। वर्ष 2023-24 में तीस हज़ार करोड़ से भी अधिक व्यापार हुआ जिसकी उम्मीद वर्तमान हालात में बिल्कुल भी नहीं की जा सकती। हालात फिर लगातार बेकाबू होते चले गये। शेख हसीना को जान बचाने के लिए देश छोड़ना पड़ा। 
नए घटनाक्रम में खालिदा जिया (पूर्व प्रधानमंत्री) के बेटे को, जो 17 वर्ष का निर्वासन झेल रहे थे को ढाका लौटने की आज़ा दी गई है। ढाका की सड़कों पर उसकी पार्टी द्वारा उनका भव्य स्वागत किया गया। तारिक फरवरी में होने वाले चुनाव में उतरने वाले हैं। भविष्य ही बता सकता है कि इनके इस फैसले को जनता की लामबंदी कितना पसंद करती है।

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