न्यायपालिका पर उठते सवाल
किसी भी लोकतांत्रिक देश में लोकतंत्र तभी जीवित रह सकता है यदि न्यायपालिका और मीडिया स्वतंत्र रूप में काम करने के समर्थ हों। देश में विपक्षी दलों को भी अपनी भूमिका निभाने के लिए उचित माहौल मिले। सत्तारूढ़ पक्ष मीडिया और न्यायपालिका पर प्रभावी न हों। नि:संदेह 26 जनवरी, 1950 को भारत द्वारा अपना संविधान बनाए जाने के उपरांत न्यायपालिका और मीडिया ने बड़ी सीमा तक स्वतंत्र रूप से अपनी-अपनी भूमिका निभाई है। आपात्काल के समय ज़रूर मीडिया और न्यायपालिका समय की सत्तारूढ़ सरकार के दबाव में दिखाई दिए थे। समूचे रूप से देश में मीडिया और न्यायपालिका की आज़ादी एवं स्वायत्तता बरकरार रहने के कारण ही पड़ोसी देशों के मुकाबले हमारे देश में लोकतंत्र बचा रहा और देश ने विकास भी किया।
परन्तु विगत कुछ अवधि से मीडिया का एक बड़ा भाग सत्तारूढ़ पक्षों के दबाव में आया दिखाई दे रहा है और इसी कारण यह लोगों में अपनी विश्वसनीयता भी गंवाता जा रहा है। दुर्भाग्य से अब न्यायपालिका पर भी सत्तारूढ़ पक्षों का कुछ न कुछ सीमा तक प्रभाव बढ़ता दिखाई दे रहा है। भीमा कोरेगांव मामले में लम्बी अवधि तक आरोपियों को जेल में रखा गया परन्तु उन पर चलाये गये मुकद्दमे की सुनवाई वर्षों तक नहीं हुई और न ही न्यायालयों द्वारा उन्हें ज़मानतें दी गईं। कई आरोपी जेल में ही दम तोड़ गए। यही सब कुछ 2020 में दिल्ली में हुए दंगों के मामले संबंधी भी दिखाई दे रहा है। 2020 में नागरिकता संशोधन बिल कानून (सी.ए.ए.) और नैशनल रजिस्टर ऑफ सिटीज़न्स (एन.सी.आर.) संबंधी केन्द्र द्वारा बनाए गए कानूनों के विरुद्ध देश भर में विपक्षी पार्टियों और विशेष रूप से भिन्न-भिन्न यूनिवर्सिटियों और कालेजों के विद्यार्थियों द्वारा शांतिपूर्वक और लोकतांत्रिक ढंग से आन्दोलन शुरू किया गया था, परन्तु दिल्ली में हुआ यह आन्दोलन हिंसक रूप धारण कर गया, जिसमें 53 लोगों की मौत हो गई थी और 250 से अधिक घायल हो गए थे। इस संबंध में 750 से अधिक मामले दर्ज किए गए थे, परन्तु इन दंगों का पूरा दोष आन्दोलनकारी विद्यार्थियों पर ही लगा दिया गया, चाहे ये दंगे भड़काने के आरोप कई राजनीतिज्ञों पर भी लगे थे। इन दंगों के संबंध में ही उमर ़खालिद, शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, श़िफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान, शादाब अहमद और कुछ अन्यों को गिरफ्तार किया गया था। इन विद्यार्थियों पर ़गैर-कानूनी गतिविधियों की रोकथाम संबंधी कानून (यू.ए.पी.ए.) और आपराधिक कानून की अन्य कठोर धाराओं के तहत मामले दर्ज किए गए थे। इस्तगासा पक्ष ने इन पर लोगों को भड़काने, आर्थिक नाकाबंदी करने और सरकार को गिराने के यत्न करने आदि के गम्भीर आरोप भी लगाए थे। उक्त आरोपी 5 वर्ष से अधिक समय तक जेल में बंद हैं, परन्तु उन पर दर्ज किए गए मामले की अभी तक बाकायदा सुनवाई शुरू नहीं हो सकी। उन्होंने निचली अदालतों से लेकर दिल्ली हाईकोर्ट तक अनेक बार ज़मानत के लिए याचिका दायर कीं परन्तु उन्हें ज़मानत न मिल सकी। अंतत: ये आरोपी सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और सुप्रीम कोर्ट ने 10 दिसम्बर को इस मामले की सुनवाई करके अपना फैसला आरक्षित रख लिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद और एन.वी. अंजारिया की पीठ ने अब सोमवार 5 जनवरी को सुनाया है। उपरोक्त माननीय न्यायाधीशों ने इस मामले में उमर ़खालिद, शरजील इमाम को छोड़ कर शेष आरोपियों को ज़मानत दे दी है, परन्तु उमर ़खालिद और शरजील इमाम को ज़मानत देने से इन्कार कर दिया है। अदालत ने कहा है कि उमर ़खालिद और शरजील इमाम की स्थिति उन 5 आरोपियों से अलग है, जिन्हें ज़मानत दी गई है। अदालत के अनुसार उमर ़खालिद और शरजील इमाम दिल्ली में दंगे भड़काने के लिए रची गई साजिश में मुख्य आरोपी हैं। चाहे वे लम्बी अवधि तक जेल में बंद हैं, परन्तु उन पर ़गैर-कानूनी गतिविधियां रोकने संबंधी कानून के तहत दर्ज किए गए मामले के कारण, उनकी लम्बी अवधि तक नज़रबंदी संवैधानिक व्यवस्थाओं की अवहेलना नहीं करती। अदालत ने कहा कि चाहे संविधान की धारा 21 के तहत नागरिकों को मिली स्वतंत्रता का अधिकार विशेष महत्त्व रखता है, परन्तु फिर भी मामले से पहले की नज़रबंदी को सज़ा नहीं माना जा सकता। अदालत ने यह भी माना है कि उमर ़खालिद और शरजील इमाम संबंधी इस्तगासा पक्ष ने जो सामग्री पेश की है, उसके आधार पर उपरोक्त दोनों के विरुद्ध प्राथमिक रूप पर मामला बनता है। अदालत ने यह भी कहा है कि उपरोक्त आरोपी एक वर्ष के बाद या गवाहों की गवाहियां हो जाने के बाद ज़मानत के लिए पुन: आवेदन कर सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा उमर ़खालिद और शरजील इमाम को ज़मानत न दिए जाने के कारण कई कानूनी विशेर्ें और वरिष्ठ वकीलों द्वारा उक्त फैसले पर सवाल खड़े किए गए हैं। फैसले की आलोचना करने वालों का कहना है कि ़गैर-कानूनी गतिविधियां रोकने संबंधी (यू.ए.पी.ए.) आदि के मामलों से संबंधित पहले 16 मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने 2016 से लेकर 2025 के बीच आरोपियों को ज़मानतें दी हैं, और इन मामलों में ज़मानतों का आधार आरोपियों को बिना मुकद्दमे चलाए जेल में लम्बी अवधि तक बंद रखे जाने को ही बनाया गया था। वैसे भी सुप्रीम कोर्ट की मुख्य धारणा यह रही है कि ज़मानत दी जानी चाहिए और ज़मानत न देना अपवाद ही होना चाहिए। उपरोक्त मामले में अदालत द्वारा अलग दृष्टिकोण अपनाए जाने के कारण ही कानूनी विशेषज्ञों द्वारा सवाल उठाए जा रहे हैं और यह कहा जा रहा है कि उपरोक्त दोनों आरोपियों को भी ज़मानत दी जानी चाहिए थी, क्योंकि उनके विरुद्ध अभी तक न मुकद्दमा शुरू हुआ है, और न ही इस्तगासा पक्ष द्वारा लगाए गए दोष सिद्ध हुए हैं। इस संबंध में हमारा भी यह विचार है कि आरोपियों को बिना मुकद्दमा चलाए वर्षों तक जेलों में बंद रखना उनके लोकतांत्रिक अधिकारों की अवहेलना है। इससे आरोपियों का जीवन खराब हो जाता है और उन्हें अपूर्णीय नुकसान होता है। भिन्न-भिन्न मामलों में अनेक ऐसे मामले भी सामने आते रहे हैं कि आरोपियों को दशकों तक जेल में बंद रखा गया परन्तु आखिर उन पर लगाए गए आरोप सिद्ध न होने के कारण उन्हें बरी करना पड़ा। पंजाब के कुछ मामलों में तो एक अपवाद यह भी हो रहा है कि कुछ बंदी भिन्न-भिन्न मामलों में अदालतों द्वारा सुनाई गई सज़ाओं से भी अधिक सज़ाएं भुगत चुके हैं परन्तु फिर भी उन्हें रिहा नहीं किया जा रहा। पंजाब के लोग इस बात से भी परेशान हैं कि महिलाओं के साथ दुष्कर्म करने और हत्या जैसे गम्भीर आरोपों में सज़ा काट रहे एक डेरा-प्रमुख को बार-बार पैरोल पर जेल से बाहर आने की छूट दी जा रही है। दूसरी तरफ कुछ आरोपियों को वर्षों तक बिना किसी केस के जेलों में रखने के बाद भी ज़मानत तक नहीं दी जा रही। न्यायपालिका के पक्षपाती होने संबंधी बन रही इस तरह की धारणा को सुप्रीम कोर्ट और अन्य अदालतों को गम्भीरता से लेना चाहिए। लोकतांत्रिक देश में न सिर्फ इन्स़ाफ होना चाहिए, अपितु इन्स़ाफ होता भी दिखाई देना चाहिए।

