कितना जनहित में होगा नया रोज़गार कानून ?
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी एक्ट (मनरेगा) का स्थान लेने के लिए एक नया कानून लोकसभा में पारित किया गया, यह बिल गंभीर चिंता का विषय है। यह कानून ग्रामीण भारत में रोज़ी-रोटी की सुरक्षा की नींव पर हमला करता है और भारत सरकार के अपने ग्रामीण नागरिकों से किए गए ऐतिहासिक वायदे को कमज़ोर करता है। मनरेगा सिफ एक कल्याण योजना नहीं थी, अपितु भारत सरकार की तरफ से ग्रामीण आबादी को रोज़ी-रोटी और गुज़ारा सहायता प्रदान करने की एक कानूनी गारंटी थी। हर घर में रोज़गार सुनिश्चित बना कर इस कानून ने लाखों ग्रामीण परिवारों को मज़बूत किया, परेशानी वाले प्रवास को कम किया और देश भर में गांव के स्तर पर अर्थव्यवस्था को मज़बूत किया था।
यह योजना लोगों से गहराई से जुड़ी हुई थी और गांधीवादी सिद्धांतों पर आधारित थी। इसने लाखों बेरोज़गारों को नौकरी की तलाश में शहरों में जाने से रोका और उन्हें घर पर ही रोज़गार दिया। मनरेगा ने इस विश्वास को बनाए रखा कि हर व्यक्ति को ईमानदारी से काम करके एक अच्छा जीवन जीने का अधिकार है। 2005 में भारत के 365 से ज़्यादा ज़िले आर्थिक असमानता के कारण नक्सलवाद से प्रभावित थे, जो 10 साल में कम होकर 78 ज़िलों तक सीमित हो गए थे। उल्लेखनीय है कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने बार-बार इस फलसफे पर ज़ोर दिया था कि मुफ्त अनाज बांटने की बजाय उन लोगों के द्वार पर रोज़गार प्रदान किया जाए। उनके योग्य नेतृत्व में मनरेगा योजना सामूहिक विकास, सामाजिक न्याय और आर्थिक मज़बूती के लिए एक शक्तिशाली साधन बन गई थी। ऐसे ऐतिहासिक और मानवीय कानून को रोज़गार की कानूनी गारंटी दिए बिना एक नए ढांचे से बदलना ग्रामीण भारत के प्रति सरकार वचनबद्धता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
इस प्रस्तावित नई योजना के बोझ-वितरण फार्मूले के तहत राज्यों को वित्तीय लागत का लगभग 40 प्रतिशत सहन करना पड़ेगा, जो वास्तव में इस कार्यक्रम के लिए मौत की घंटी सिद्ध होगा। बहुत-से राज्य पहले ही बहुत ज़्यादा वित्तीय दबाव में होने के कारण इस बोझ को सहन करने के योग्य नहीं होंगे, जिससे कवरेज कम होने और भुगतान में देरी होने के कारण अंत में यह योजना बंद हो जाएगी। नए कानून को जान बूझकर कमज़ोर किया गया है ताकि यह सुनिश्चित बनाया जा सके कि आने वाले वर्षों में यह कार्यक्रम कमज़ोर होकर अपने-आप खत्म हो जाए। इससे गरीबी और बेरोज़गारी बढ़ेगी। यह सबसे गरीब खासकर कृषि और श्रम क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों को बुरी तरह प्रभावित करेगी। भारत सरकार को यह भी याद रखना चाहिए कि देश में सबसे गरीब लोग भी ज़रूरी वस्तुएं और सेवाएं खरीदते समय अप्रत्यक्ष करों के ज़रिए सरकारी राजस्व में अहम योगदान देते हैं। रोज़गार कोई दान नहीं है, यह नागरिकों का संवैधानिक और नैतिक अधिकार है, जिनकी कड़ी मेहनत और खपत भारत की आर्थिकता को चलाती है। भारतीय संविधान की धारा-38 के तहत राज्य को सामाजिक व्यवस्था को उत्साहित करने और असमानता को कम करने का आदेश देता है, धारा- 39 (ए) राज्य को यह सुनिश्चित बनाने के लिए निर्देश देती है कि नागरिकों के पास रोज़ी-रोटी के पर्याप्त साधन हों। धारा-41 खास तौर पर राज्य को अपनी आर्थिक समर्था के भीतर काम करने का अधिकार देने का आदेश देती है और धारा-43 राज्य को अपनी आर्थिक समर्था के भीरत काम करने का अधिकार देने पर ज़ोर देती है।
-पूर्व मंत्री



