बात सिर्फ लावारिस कुत्तों की नहीं है

देश के सर्वोच्च न्यायालय अर्थात सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर देश भर में करोड़ों की संख्या में घूमते लावारिस कुत्तों संबंधी अपनी कड़ी टिप्पणियां दी हैं। विगत नवम्बर मास में भी उसने ऐसे ही निर्देश दिए थे और स्थान-स्थान से लावारिस कुत्तों को हटाने के निर्देश दिए थे। हम इन जानवरों को आवारा नहीं कहते, अपितु लावारिस इसलिए कहते हैं क्योंकि यदि इनके जीवन के संबंध में सोचें तो यह बहुत बेचारगी वाला और दुखदायी प्रतीत होता है। इनका कोई वारिस नहीं है। इन्हें जहां कहीं भी गंद-मंद मिलता है या रोटी के टुकड़े मिलते हैं, ये उन्हें खाकर गुज़ारा करते हैं। यदि इन्हें ऐसा कुछ नहीं मिलता तो वे अपनी भूख-प्यास कैसे मिटाएंगे, इस संबंध में भी बहुत कम लोग सोचते हैं, परन्तु इसके बावजूद इनकी संख्या बढ़ती जा रही है। गलियों-बाज़ारों में दयनीय हालत में जीवन जीते लावारिस घूमते प्रत्येक तरह के जानवरों को देखा जाता है, जो बेहद दया के पात्र हैं, परन्तु इनके प्रति ऐसी दया की भावना बहुसंख्या में मनुष्यों में पैदा नहीं होती।
अब एक बार फिर कुछ कुछ वरिष्ठ वकीलों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में पुन: याचिकाएं दायर करने के बाद सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने अपनी टिप्पणियों को सीमित करते हुए यह कहा है कि लावारिस कुत्तों का स्कूलों, अस्पतालों, कार्यालयों एवं अन्य संस्थानों में खुलेआम घूमना उचित नहीं है और इस पर प्रतिबन्ध लगना चाहिए, परन्तु सर्दियों-गर्मियों, बारिश और आंधी में ये जीव गलियों-बाज़ारों में कैसे जीवन व्यतीत करते होंगे, इस संबंध में अधिकतर मनुष्य पसीजते दिखाई नहीं देते। विचारणीय बात यह है कि एक सभ्याचार को समर्पित और सचेत देश में ऐसा क्रिया-कलाप क्यों है? आज़ादी के 78 वर्षों बाद भी ऐसा सिलसिला क्यों दिखाई दे रहा है, इसका स्पष्ट उत्तर यह है कि देश में प्रत्येक स्तर पर अनुशासन और उचित योजनाबंदी की बेहद कमी है। देश के पिछड़ने का एक बड़ा कारण ऐसी अनियोजित वाली योजनाबंदी और सोच को कहा जा सकता है। यह भी सोचना बनता है कि विकसित देशों के गलियों-बाज़ारों और गांवों-शहरों में ऐसा कुछ क्यों नहीं है, वहां लावारिस पशु या अन्य जानवर इस तरह खुलेआम घूमते क्यों नहीं दिखाई देते? यह भी विकसित और ़गैर-विकसित देशों की निशानी कही जा सकती है।
यदि लोग घरों में दुधारू पशु या अन्य जानवर पालते हैं तो फिर उनकी गुणवत्ता समाप्त होने के बाद उन्हें सड़कों पर क्यों छोड़ दिया जाता है? क्या उन लोगों या परिवारों की यह ज़िम्मेदारी नहीं बनती कि वे इन जानवरों को सम्भालें? उन्होंने इन जानवरों का पालन-पोषण किया, लाभ उठाया और बाद में उन्हें दयनीय हालत में जीने के लिए क्यों खुला छोड़ दिया? यह ज़िम्मेदारी आरम्भ से शुरू होनी चाहिए। जहां तक लावारिस कुत्तों या जानवरों की बात है, यदि हमारी स्थानीय संस्थाएं इसके प्रति सचेत नहीं हैं और वे अब तक इस संबंध में उचित योजनाबंदी करने से असमर्थ रही हैं, तो उन्हें ऐसा करने के लिए विवश किया जाना चाहिए। जहां तक लावारिस कुत्तों का सवाल है, इनका जीवन कुछ वर्ष तक ही सीमित होता है। यदि इनकी नसबंदी करके इनका प्रभावशाली ढंग से इनकी संतान-वृद्धि रोकने के लिए अब तक टीकाकरण कर दिया जाता तो यह पूरा मामला कभी का हल हो जाना था, परन्तु हमारे देश और समाज की त्रासदी यह है कि ऐसी बातों की मज़बूत और दुरुस्त योजनाबंदी कैसे करनी है, इस ओर किसी का भी गम्भीरता से ध्यान नहीं जाता। ऐसी बातों का महत्त्व ही नहीं समझा जाता। यही स्थिति देश की जनसंख्या की है। जिस तरह लगातार बढ़ती देश की जनसंख्या के प्रति समाज और सरकारें अनजान हैं, इस कारण एक दिन यह जनसंख्या देश के विकास के मार्ग में विनाशकारी अवरोध बनेगी। उपजी ऐसी अनेक समस्याएं देश और समाज को पूरी तरह से रसातल की ओर ले जाएंगी। आज नेता प्रतिदिन बयान देते हैं और गर्व करते हैं कि भारत विश्व का सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश है, परन्तु हम समझते हैं कि इस बात पर कदाचित गर्व नहीं किया जा सकता, अपितु बिना किसी उचित योजनाबंदी के लगातार बढ़ती जनसंख्या को आगामी समय में देश के लिए प्रत्येक पक्ष से घातक समझा जाना चाहिए।
मौजूदा समय में जनसंख्या की बात तो छोड़ें, यदि अब तक हम लावारिस जानवरों की जनसंख्या को सीमित रखने की योजनाबंदी भी नहीं कर सके तो इसे बड़ी विफलता ही कहा जा सकता है। ऐसे दृश्यों के होते नेताओं द्वारा अंतरिक्ष में उड़ान भरने की की जा रही बातों का वज़न कम हो जाता है। देश को दरपेश ऐसी समस्याओं से निपटने के लिए सरकार को ठोस योजनाएं बनाने और इन्हें लागू करने के लिए प्रभावी व्यवस्था बनानी चाहिए। ऐसे प्रबन्ध ही सही अर्थों में देश के प्रत्येक पक्ष से विकास में सहायक हो सकते हैं।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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