राज्यसभा सीट पाने के लिए भाजपा व कांग्रेस के दावेदार हुए सक्रिय
हरियाणा में दो राज्यसभा सीटें तीन महीने बाद अप्रैल में खाली होने जा रही हैं। राज्यसभा सीट पाने के लिए भाजपा व कांग्रेस के दावेदार अभी से सक्रिय हो गए हैं। इनमें से एक सीट बंसीलाल की पुत्रवधु व भाजपा सांसद किरण चौधरी की है और दूसरी सीट भाजपा पिछड़े वर्ग के नेता एवं राज्यसभा सांसद रामचंद्र जांगड़ा की है। किरण चौधरी पिछले साल लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गई थीं और उन्हें सांसद दीपेंद्र हुड्डा द्वारा खाली की गई सीट से राज्यसभा में सांसद बनवा दिया गया था। इसी के साथ ही किरण चौधरी की बेटी व पूर्व सांसद श्रुति चौधरी को भाजपा ने तोशाम से विधानसभा का टिकट दिया था और चुनाव जीतने के बाद उन्हें हरियाणा की नायब सरकार में सिंचाई मंत्री बनाया गया है। जबकि रामचंद्र जांगड़ा 2020 में भाजपा की ओर से राज्यसभा सांसद बने थे। अब हरियाणा विधानसभा की मौजूदा स्थिति को देखते हुए कांग्रेस व भाजपा दोनों को एक-एक सीट मिलने के आसार हैं।
टिकट के कई दावेदार
हरियाणा विधानसभा में भाजपा के पास 48 विधायक हैं और 3 निर्दलीय विधायकों का समर्थन भी भाजपा को मिला हुआ है। दूसरी तरफ कांग्रेस के पास 37 विधायक हैं। इसके अलावा इनेलो के पास भी दो विधायक हैं। भाजपा की ओर से किरण चौधरी को एक बार फिर राज्यसभा टिकट के लिए प्रबल दावेदार माना जा रहा है। इसके अलावा भाजपा के राष्ट्रीय सचिव ओम प्रकाश धनखड़, पूर्व वित्त मंत्री कैप्टन अभिमन्यु, भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मोहनलाल बड़ौली भी भाजपा की ओर से टिकट के प्रमुख दावेदार माने जाते हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस की ओर से जिन केंद्रीय नेताओं को टिकट का दावेदार माना जा रहा है, उनमें पूर्व केंद्रीय मंत्री आनंद शर्मा, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह भी शामिल हैं। अगर हरियाणा से किसी कांग्रेसी नेता को राज्यसभा में भेजने का निर्णय लिया जाता है तो उनमें पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरी बीरेंद्र सिंह व उनके पूर्व सांसद बेटे व आईएएस अधिकारी रहे बृजेंद्र सिंह के नाम भी चर्चा में हैं। हरियाणा में कांग्रेस के ज्यादातर विधायक भूपेंद्र सिंह हुड्डा के विश्वासपात्र हैं और कांग्रेस जो भी उम्मीदवार बनाएगी, वह नेता प्रतिपक्ष भूपेंद्र हुड्डा की सहमति से बनाने के साथ-साथ उसकी जीत सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी भूपेंद्र हुड्डा को ही सौंपेंगी।
कांग्रेस नहीं लेगी रिस्क
इससे पहले पिछले बार राज्यसभा चुनाव में अजय माकन को कांग्रेस ने हरियाणा से राज्यसभा उम्मीदवार बनाया था और कांग्रेस के पास एक सांसद जितवाने के लिए पर्याप्त संख्याबल भी था, लेकिन कांग्रेस विधायकों के भीतरघात के चलते भाजपा समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी कार्तिकेय शर्मा चुनाव जीत गए थे और माकन चुनाव हार गए थे। उससे पहले भी जब इनेलो और कांग्रेस के पास विपक्ष का एक सांसद राज्यसभा में भेजने का मौका था तो उस समय कांग्रेस आलाकमान ने सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट व निर्दलीय उम्मीदवार आरके आनंद को समर्थन देने का ऐलान किया था। इनेलो भी आरके आनंद को समर्थन देने के लिए तैयार थी। लेकिन चुनाव के समय पेन की स्याही बदलकर काफी सारे वोट रद्द करवा दिए गए और इनेलो व कांग्रेस के पास पर्याप्त संख्याबल होने के बावजूद आरके आनंद चुनाव हार गए थे और सुभाष चंद्रा भाजपा के समर्थन से चुनाव जीत गए।
कांग्रेस पहले कई बार झटके खा चुकी है, इसी के चलते जब कुमारी सैलजा की राज्यसभा सीट खाली हुई थी, तब पर्याप्त संख्याबल होते हुए भी कांग्रेस आला कमान ने सैलजा को राज्यसभा उम्मीदवार बनाने की बजाय भूपेंद्र हुड्डा के बेटे दीपेन्द्र हुड्डा को उम्मीदवार बनाया था ताकि भीतरघात में राज्यसभा सीट हाथों से न निकल जाए।
डेरा प्रमुख को मिली 15वीं बार पैरोल
सिरसा डेरा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को एक बार फिर 40 दिन की पैरोल मिल गई है। 2017 में दो साध्वियों के साथ दुष्कर्म के आरोप में गुरमीत राम रहीम को सीबीआई अदालत ने 20 साल की सजा सुनाई थी। इसके बाद पत्रकार रामचंद्र छत्रपति और डेरा मैनेजर रहे रणजीत सिंह हत्या मामले में भी गुरमीत राम रहीम को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी।
डेरा प्रमुख करीब पिछले साढ़े 8 सालों से रोहतक स्थित सुनारिया जेल में बंद है और अब तक उसे 15 बार पैरोल और फरलो मिल चुकी है। जब भी गुरमीत राम रहीम को पैरोल और फरलो मिलती है, उसी समय विपक्षी दलों और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी सहित विभिन्न संस्थाओं व राजनीतिक दलों द्वारा इस का विरोध किया जाता है। गुरमीत राम रहीम को सजा मिलने के 3 साल से ज्यादा समय तक कोई पैरोल व फरलो नहीं मिली थी। इसके बाद अक्तूबर 2020 में डेरा प्रमुख को अपनी बीमार मां से मिलने के लिए एक दिन की पैरोल मिली थी। मई 2021 में भी डेरा प्रमुख को अपनी मां से मिलने के लिए 12 घंटे की पैरोल मिली।
अब तक डेरा प्रमुख को 15 बार पैरोल मिल चुकी है। फरवरी 2022 में गुरमीत राम रहीम को 21 दिन के लिए फरलो मिली और उसके बाद जून 2022 में 30 दिन के लिए पैरोल दी गई। इस दौरान डेरा प्रमुख उत्तर प्रदेश स्थित बागपत आश्रम में भारी सुरक्षा के बीच रहा। अक्तूबर 2022 में भी गुरमीत राम रहीम को 40 दिन की पैरोल मिली और उसके बाद जनवरी 2023 में शाह सतनाम सिंह की जयंती पर डेरा प्रमुख को फिर 40 दिन की पैरोल दी गई। 2023 में ही डेरा प्रमुख को जुलाई में 30 दिन की पैरोल मिली और फिर नवंबर में 21 दिन की फरलो दी गई। जनवरी 2024 में शाह सतनाम जयंती पर डेरा प्रमुख को 50 दिन की पैरोल मिली और फिर अगस्त में 21 दिन की फरलो और अक्तूबर में 20 दिन की पैरोल मिल गई। बीते साल जनवरी 2025 में उसे फिर 30 दिन की पैरोल दी गई। इसके बाद अप्रैल 2025 में 21 दिन की फरलो और अगस्त में 40 दिन की पैरोल दी गई। अब फिर शाह सतनाम जयंती पर बीते दिन गुरमीत राम रहीम को 40 दिन की पैरोल दी गई है।
टाईमिंग को लेकर आलोचना
डेरा प्रमुख के विरोधी और विपक्षी दल पैरोल व फरलो की टाइमिंग को लेकर भी सरकार की अक्सर आलोचना करते हैं। उनका कहना है कि अक्सर चुनावी रणनीति के दृष्टिगत हत्या व दुष्कर्म जैसे मामलों में सजा भुगत रहे डेरा प्रमुख को बार-बार पैरोल और फरलो दी जा रही है। दूसरी तरफ हरियाणा के जेल मंत्री डॉ. अरविंद शर्मा डेरा प्रमुख को दी जाने वाली पैरोल और फरलो का बचाच करते हुए इसको लेकर उठने वाले विवादों को बेवजह और गैर-जरूरी बताते हैं। उनका कहना है कि हर कैदी को जेल मैन्युल के हिसाब से पैरोल और फरलो मिलती है और हर कैदी पैरोल और फरलो के लिए आवेदन दे सकता है। उस कैदी का जेल में व्यवहार कैसा है, उसे देखकर पैरोल और फरलो दी जाती है और साल में कोई भी कैदी 3 बार पैरोल और फरलो ले सकता है। यह पूरी प्रक्रिया जेल मैन्युल और कानून के मुताबिक होती है।
मो.-9855465946



