खतरनाक स्तर तक बढ़ता जा रहा है भू-जल संकट
आप का कोई स़फर बे-समत बे-मंज़िल ना हो,
ज़िंदगी ऐसी न जीना जिसका मुस्तकबिल ना हो।
बात बहुत पुरानी नहीं, 9 जुलाई 2021 के ‘अजीत’ में इसी कॉलम में पंजाब के भू-जल के खत्म होने के बचाव के लिए एक लेख लिखा गया था ‘बेहद ज़रूरी है धान का विकल्प ढूंढना’। किसी सरकार, किसी किसान यूनियन या किसी अन्य ज़िम्मेदार अधिकारी पर उसका कोई असर तो शायद ही हुआ हो, परन्तु यह ज़रूर हुआ कि 3-4 किसानों ने फोन करके विरोध ज़रूर जताया था कि आप किसानों के विरुद्ध लिख रहे हो। जब उनको यह कहा गया कि यह पंजाब और पंजाब का मुस्तकबिल (भविष्य) बचाने का सवाल है तो एक व्यक्ति ने तो यहां तक कह दिया था कि हम अपना वर्तमान देखें या भविष्य। खैर, आज वही बात दोबारा उठाने का कारण यह है कि करीब 98 वर्षीय पदम भूषण ईनाम लेने वाले प्रमुख पंजाबी अर्थ-शास्त्री जो अलग-अलग यूनिवर्सिटियों के प्रमुख रहे, रिज़र्व बैंक के डायरैक्टर भी रहे, भाव स. सरदारा सिंह जौहल ने भी अब यह सवाल उठाया है कि धान और गेहूं का फसली चक्र पंजाब के भविष्य के लिए खतरनाक है। जौहल ने यह कहा कि पंजाब में सिंचाई के लिए करीब 70 प्रतिशत भू-जल का उपयोग किया जा रहा है। उन्होंने साफ-साफ लिखा कि वास्तव में हम भोजन या फसलें पंजाब से बाहर नहीं भेजते, बल्कि हम अपना भू-गर्भ जल पैक करके भेज रहे हैं। उनका यह कहना दिल को हिला कर रख देने वाला है कि सिर्फ एक किलो चावल पैदा करने पर 5000 गैनल भाव 18 हज़ार 925 लीटर पानी उपयोग किया जाता है, जबकि एक किलो गेहूं पैदा करने पर भी 3000 गैलन भाव 11 हज़ार 350 लीटर पानी की खपत होती है। उन्होंने कहा, ‘अफसोस कि अब पंजाब देश के लिए अन्न उत्पादन के लिए भविष्य की पीढ़ियों का पाने योग्य पानी उपयोग कर रहा है।’ उन्होंने ट्यूबवैलों को मुफ्त बिजली का विरोध किया और इसके बदले धान की लागत में पानी की कीमत जोड़कर किसान को सब्सिड़ी अधिक एम.एस.पी. के तौर पर दी जानी चाहिए ताकि धान और गेहूं का रकबा कम हो। उन्होंने बताया कि मुफ्त बिजली के कारण ही कई मिलियन डॉलर का विश्व बैंक का प्रोजैक्ट जो पंजाब की बेहतरी के लिए था, भी खत्म हो गया था। उन्होंने कहा कि किसान को सब्सिडी देनी ज़रूरी है परन्तु बिजली मुफ्त देना खतरे वाला लाल निशान या रैड बॉक्स सब्सिडी है, जबकि अधिक एम.एस.पी. वाली सब्सिडी हरे बॉक्स वाली सब्सिडी होगी। उनका बिल्कुल ठीक परिणाम है कि बिजली पर मिलती सब्सिडी वास्तव में किसान या पंजाब को नहीं मिलती, यह तो पंजाब से बाहर और (देश से बाहर) उपभोक्ताओं को मिल रही है। यदि मुफ्त बिजली के स्थान पर यह सब्सिडी फसल की अधिक एम.एस.पी. के तौर पर मिले तो यह सब्सिडी पंजाब की तरक्की के काम आए और पंजाब की आर्थिकता सुधारने का काम करेगी। उनकी हैरानी भी हक-बजानब है कि नीतियां कभी भी स्थायी नहीं होतीं, यह हालात और समय अनुसार बदलती रहती हैं। परन्तु हमारी सरकार और कृषि यूनिवर्सिटी अभी 1965 वाली गेहूं और धान की कृषि पर ही खड़ी है, जिस कारण पंजाब जल और वातावरण के साथ जुड़ी समस्याओं का सामना कर रहा है। पंजाब का मुस्तकबिल (भविष्य) अंधेरे में है।
हाल ़खूं में डूबा है कल न जाने क्या होगा
अब तो ़ख़ौफ-ए-मुस्तकबिल ज़हन-ज़हन तारी है।
पंजाब : भूमिगत-जल की स्थिति गम्भीर
सैंट्रल ग्राऊंड वाटर बोर्ड की ताज़ा रिपोर्ट अनुसार पंजाब के कुल 153 मूल्यांकण यूनिटों या ब्लाकों में से इस समय 115 से 117 यूनिट तक डार्क ज़ोन वाली स्थिति में हैं, भाव इनमें से भूमिगत रीचाज़र् होने वाले पानी की कुल 100 प्रतिशत मात्रा से अधिक पानी निकाला जा रहा है, जबकि सिर्फ 17 से 20 ब्लाक ही सुरक्षित ब्लाक हैं। इस समय पंजाब 156 प्रतिशत भूमिगत-जल उपयोग कर रहे हैं। यदि ऐसा रूझान जारी रहा तो साल 2039 भाव 13 सालों में ही पंजाब के बहुत सारे इलाकों में पानी 1000 फुट से भी नीचे जा सकता है, जिससे पंजाब के कई क्षेत्र बंजर हो जाएंगे। ऊपर से हालात यह हैं कि पंजाब में 14 से 15 लाख ट्यूबवैल मुफ्त बिजली के साथ बिना मीटरों से आटो स्टार्ट के साथ चल रहे हैं। यह स्थिति ऐसी है कि बर्बादी के बाद पंजाबी बस ताबिश कलाम का यह शेयर दोहराने के योग्य ही रह जाएंगे :
हम उस धरती के बाशिंदे थे ताबिश,
कि जिस का कोई मुस्तकबिल नहीं था।
(बाशिंदे-वासी)
बार-बार एक ही नज़ारा न दिखलाया कर
बात दिलकश भी अगर हो तो न दोहराया कर
(़खाकान ़खावर)
यह कोई बहुत पुरानी बात नहीं, नवम्बर 2017 में ही दिल्ली के भाजपा के कब्ज़े वाली कालेज गवर्निंग बाडी वाले दियाल सिंह कालेज के ईवनिंग कालेज का नाम बदल कर वंदे-मातरम रखने की कोशिश की गई थी। उस समय जब इसका बड़े स्तर पर विरोध हुआ तो यह प्रस्ताव वापिस लेना पड़ा था। ज़िक्रयोग्य है कि उस समय इसके विरोध की शुरुआत भारतीय अल्पसंख्यक कमिशन के पूर्व प्रमुख और पूर्व सांसद तरलोचन सिंह और मौजूदा भाजपा मंत्री मनजिन्दर सिंह सिरसा द्वारा की गई थी। इस बार यह कोशिश गुड़ में लपेट कर देने की कोशिश की जा रही है। इस बार कालेज का नाम हिन्दू विश्वास के साथ जोड़कर वंदे-मातरम रखने का प्रस्ताव नहीं, बल्कि सिख नायक बाबा बंदा सिंह बहादर के नाम पर दिया गया है परन्तु किस को नहीं पता कि आर.एस.एस. अंदरूनी तौर पर बाबा बंदा सिंह बहादुर नहीं, बल्कि उनको बंदा बैरागी के नाम पर एक हिन्दू नायक के तौर पर ही प्रचारित करता है। नाम बदलने के इस प्रस्ताव के लिए बहाना यह है कि सुबह और शाम के दोनों कालेजों का एक ही नाम होने के कारण असमंजस वाली स्थिति बनी हुई है। हैरानी की बात यह है कि कई दशकों से इसके साथ कोई भंबलभूसा नहीं पड़ा तो अब भाजपा शासन में ही ऐसा क्यों महसूस हो रहा है? कोई पूछे कि यदि आपको सचमुच ही बाबा बंदा सिंह बहादुर के साथ इतना ही प्यार है तो दिल्ली यूनिवर्सिटी, दिल्ली सरकार या केन्द्र सरकार बाबा बंदा सिंह बहादुर के नाम पर क्यों नहीं कोई नई संस्था बनाती। एक सिख के नाम पर चलते कालेज का नाम ही बार-बार बदलने की कोशिश क्यों की जा रही है? ज़िक्रयोग्य है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार विकास गुप्ता ने तो पुष्टि भी कर दी है कि नाम बदलने का प्रस्ताव है तो यह यूनिवर्सिटी की एगज़ैक्टिव कौंसल के आगे रखी जाएगी। परन्तु दूसरी तरफ दयाल सिंह ईवनिंग कालेज स्टाफ एसोसिएशन ने सर्वसम्मति के साथ इसका विरोध करने का फैसला कर लिया है, क्योंकि दयाल सिंह मजीठिया ट्रस्ट और दिल्ली यूनिवर्सिटी के बीच हुए समझौते अनुसार ऐसा किया ही नहीं जा सकता। वैसे तो पाठकों को हैरानी होगी कि एक सिख द्वारा स्थापित कालेज की प्रबंधकीय कमेटी में इस समय शायद एक भी सिख सदस्य नहीं है। गौरतलब है कि ‘दि ट्रिब्यून’ अखबार शुरू करने वासे दयाल सिंह मजीठिया ने 1910 में लाहौर में यह कालेज शुरू किया था, जहां आज भी यह कालेज दयाल सिंह के नाम पर ही चल रहा है। यह सरकारी कालेज है, बटवारे के बाद पंजाब यूनिवर्सिटी ने इस कालेज का कैंपस दिल्ली में शुरू दिया था और 1978 में यह दिल्ली यूनिवर्सिटी को सौंप किया गया था। इसके पास 11.8 एकड़ ज़मीन सहित अरबों रुपये की जायदाद है। इस बात का शक भी प्रकट किया जा रहा है कि नये कालेज की आड़ में कहीं इसकी अरबों की जायदाद खुर्द-बुर्द करने का कोई छुपा काम तो नहीं चल रहा? हैरानी की बात है कि स. दियाल सिंह जो कभी ब्रह्म समाज के साथ जुड़े रहे, एक सिख विरासत के मालिक थे और 30 साल श्री दरबार साहिब अमृतसर के मामले भी देखते रहे, परन्तु पूरी तरह धर्म-निर्पेक्ष व्यक्ति थे। उनके नाम पर चलते कालेज का नाम बदलने की कोशिश बार-बार क्यों की जा रही है, जबकि सबको पता है कि सिख समाज इसका विरोध करेगा।
म़कतल से बार बार गुज़रा गया हमें
खंजर से पहले खौफ से मारा गया हमें।
(काश़िफ सय्यद)
-1044, गुरु नानक सट्रीट, समराला रोड़, खन्ना
मो. 92168-60000



