अगर ईरान-अमरीका युद्ध हुआ तो हम पर इसका क्या असर होगा ?
ईरान का यह दावा कि वह अमरीकी हमले के बाद नहीं बल्कि ऐसे किसी खतरे का ठोस संकेत मिलते ही इज़रायल तथा आसपास के अमरीकी सैन्य अड्डों को निशाना बनाना शुरू कर देगा और ट्रम्प के इस उद्गार के बाद कि वे हम बहुत गंभीरता से कुछ असरदार विकल्पों पर विचार कर रहे हैं, ईरानी जनता का लंबा दु:स्वप्न अब खत्म होने वाला है। जल्द कोई फैसला लेंगे, के बाद लगता है कि ईरान का मसला उस मुकाम तक पहुंच गया है, जहां स्थिति सामान्य होना मुमकिन नहीं और युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार हो चुकी। ट्रम्प की सनक का कोई तार्किक आकलन संभव नहीं। फिलहाल सीधे और वास्तविक युद्ध की आशंका कम हैं, लेकिन आशंका से इन्कार भी नहीं किया जा सकता। युद्ध संभव है, पर अनिवार्य नहीं लेकिन भारी तनाव के बीच अमरीका से परोक्ष टकराव की आशंका साफ दिखने लगी है। जिस तरह के हालात हैं उसे देखते हुए सीधे युद्ध न भी हो तो भी ईरान में अमरीकी हवाई हमले, ईरान-इज़रायल टकराव, प्रॉक्सी युद्ध का विस्तार तथा भीषण दमन के जरिये नियंत्रण जैसे परिदृश्य सामने आ सकते हैं। तात्कालिक तौर पर तख्तापलट, गृहयुद्ध, खामेनेई का पलायन या पहलवी की वापसी जैसे परिदृश्य की गुंजाइश कुछ कम है।
ईरान की सबसे बड़ी रणनीतिक ताकत है लेबनान में हिज़्बुल्लाह, यमन में हूती, इराक-सीरिया में शिया मिलिशिया, इस प्रॉक्सी नेटवर्क के इस्तेमाल से वह बिना सीधे युद्ध के अमरीका और उसके सहयोगियों पर दबाव बना सकता है। शैडो वार में ईरान की यही मजबूती उसे पूर्ण युद्ध से अब तक बचाए रखी है और आगे भी काफी हद तक बचाएगी। अमरीका शायद यह जानता है कि वेनेजुएला, ईरान, ग्रीनलैंड, क्यूबा, मैक्सिको जैसे कई मोर्चों पर एक साथ दबाव बनाने की उसकी चाहत रणनीतिक थकान बढ़ा सकती है। ईरान जितना समझा जा रहा है उतना भी कमजोर नहीं है इसलिये वह अमरीका के ‘गले की ऐसी फांस बन सकता है जिसे न पूरी तरह निगला जा सके, न छोड़ा जा सके। इसलिये सीधे युद्ध में उतरने के बजाए वह प्रतिबंध, साइबर-आक्रमण, सीमित हवाई हमला, आक्रामक बयानबाजी और ईरान अपने प्रॉक्सी टकराव पर टिका रह सकता है।
विरोध प्रदर्शन महंगाई से शुरू होकर कुशासन और सत्ता की वैधता के प्रश्नों तक पसर गए हैं। यह स्थिति 2022 के प्रदर्शनों से अधिक जटिल है; क्योंकि तब मुद्दे सामाजिक-सांस्कृतिक थे, आज आर्थिक-राजनीतिक हैं। तब आंतरिक शक्तियां भर थीं, अब इसमें बाहरी तत्वों के दखल से इन्कार नहीं किया जा सकता। हालांकि उम्मीद रखने में कोई बुराई नहीं, कई आंतरिक उथल-पुथल वाले में संकटों में ईरानी राज्य सुरक्षा-संरचना और अपने धार्मिक वैचारिक अनुशासन के सहारे टिकता रहा है लेकिन इस बार सामान्यीकरण बहुत कठिन है। अयातुल्ला अली खामेनेई ने अपने वहां के हालात के लिये अमरीका-इज़रायल को दोषी ठहराना गलत नहीं, बाहरी हस्तक्षेप वास्तविक हैं, सत्ता-परिवर्तन के लिए अस्थिरता पैदा करने का पश्चिम का इतिहास रहा है। इसलिए ईरान में यह आरोप पूरी तरह निराधार नहीं पर आंतरिक कारणों को इससे ढका नहीं जा सकता। असल में संकट के मुख्य खलनायक खामेनेई हैं, जिनकी सरकार के आर्थिक कुप्रबंधन, राजनीतिक दबंगई, सामाजिक स्तर पर सुधार की विफलताएं इसके लिये दोषी हैं। ईरान आज उन्हीं के चलते आर्थिक संकट, प्रतिबंधों, ऊर्जा-जल किल्लत, मुद्रा अवमूल्यन और सामाजिक असंतोष के बहुस्तरीय दबाव में है। उनके इशारे पर ईरानी अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों को आर्थिक विरोध और सत्ता परिवर्तन की मांग करने वालों को बांटने की कोशिश की, सत्ता परिवर्तन की मांग वालों को दंगाई और विदेशी समर्थित किराये के सैनिक बताकर ऐलान किया कि ‘दंगों’ में शामिल सभी लोग खुदा के खिलाफ युद्ध छेड़ने के दोषी हैं, जिसकी सज़ा मौत है।
इससे मामला और भड़का, देशभर में जेन-जी आक्रोश में आ गया और हर महीने लगभग 7 डॉलर कैश की मदद का ऐलान भी नाकाम साबित हुआ। हालांकि हजारों के घायल होने सैकड़ों के मारे जाने के पश्चिमी मीडिया के चित्रण और विदेशी मानवाधिकार समूहों के दावों की स्वतंत्र पुष्टि कठिन है, ‘पूर्ण अराजकता’ का चित्रण अतिरंजित भी हो सकता है, पर दमन हुआ है यह कतई नकारा नहीं जा सकता। ईरान का रक्षा बजट 40 अरब डॉलर है, जो अमरीकी रक्षा बजट 800 अरब डॉलर के मुकाबले कुछ भी नहीं। अमरीका के पास ईरान के नजदीक कई सैन्य अड्डे हैं, सैटेलाइट-आधारित इंटेलिजेंस, स्टील्थ विमान हैं। हवाई ताकत के मामले में अमरीकी एफ 35, एफ 22, अवाक्स जैसे लड़ाकू विमानों, बी-2 बांबरों के सामने कमजोर वायुसेना वाला ईरान कब तक टिकेगा? हालांकि पूर्ण वायु वर्चस्व के बाद भी युद्ध का अंत किसी के पक्ष में तय नहीं होता पर अमरीका द्वारा बड़े पैमाने पर ऐसे हवाई हमले संभव हैं, जो ईरान की वायु रक्षा और एयरबेस को शुरुआती चरण में ही भारी नुकसान पहुंचा देगा।
ईरान के पास भले घोषित तौर पर परमाणु हथियार न हों पर 60 प्रतिशत से अधिक यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम चिंता का विषय तो है- यह निवारक दबाव बना रहेगा। संघर्ष इकतरफा लगता है पर लंबा खिंचा तो ईरान असंयमित युद्ध में भारी पड़ेगा और वैश्विक अर्थव्यवस्था डगमगाएगी। तेल कीमतें, शिपिंग बीमा, वैश्विक महंगाई और उभरती अर्थव्यवस्थाएं प्रभावित होंगी। इस दौरान इजराइल की भूमिका देखनी होगी। यह तय है कि चीन बयानबाज़ी और कूटनीतिक वित्तीय समर्थन, खुफिया मदद तक सीमित रहेगा, सीधी सैन्य मदद की संभावना कम ही है। बहरीन, मिस्र निंदा से अधिक कुछ नहीं करेंगे। भारत के लिए ईरान ऊर्जा, कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय संतुलन का अहम स्तंभ है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



