रंक से राजा हो जाने की चाह
अपने देश में ज़माना काम का नहीं परिणाम का हो गया है। जन-सेवा का नहीं अनुकम्पा वितरण का हो गया है। इसका बहुत बड़ा लाभ देश को मिला है। परिणाम को आंकड़ों में मापा जाता है। आंकड़ों के विज्ञान को आसान शब्दों में स्टैटिसस्किस कहते हैं। लोगों को आजकल अंग्रेज़ी समझ आती है चाहे वह कितनी ही गलत ढंग से बोली जाये। अपनी भाषा के शब्द न हमने पढ़े और न ही उन्हें पढ़ने की इच्छा है क्योंकि अपनी भाषा में अपने आपको बयान करने वाला देसी है, जबकि टूटी गुलाबी अंग्रेज़ी बोलने वाला आधुनिक, अभिजात और अनपढ़ लोगों के बीच दहशतज़दा सम्मान पाता है।
तो इस सच को याद रखते हुए आइए हम देश में काम की नहीं परिणाम की बात करते हैं। जनाब, हम अपनी आज़ादी का अमृत महोत्सव मना चुके हैं, और उसके बाद तेजी से उसका शतकीय महोत्सव मना लेना चाहते हैं। चाहे उस तिथि तक पहुंचने में अभी इक्कीस बरस हैं, लेकिन अभी से यहां उसकी बात कुछ इस प्रकार हो रही है कि जैसे कल ही हम उस तिथि तक पहुंच जाएंगे। बड़े-बड़े सपने आंकड़ों की सहायता से उस शतकीय महोत्सव पर मिलने वाली उपलब्धियों के देखे जा रहे हैं। तब हम अल्प विकसित नहीं, विकासशील नहीं पूरी तरह से विकसित देश हो जाएंगे। पूरी तरह इस लिये कहा क्योंकि हमने दुनिया की आर्थिक शक्तियों के रास्ते पर महा-बली हो जाने का हमेशा परिचय दिया है। एक दशक पहले इन शक्तियों की कतार में हम कहीं नज़र भी नहीं आते थे। देखते ही देखते हम तरक्की करके पांचवीं बड़ी आर्थिक महाशक्ति बन गये। एक छलांग लगाई और हम चौथी बड़ी आर्थिक महा-शक्ति बन गये हैं। एक दो बरस में हम तीसरी बड़ी आर्थिक महा-शक्ति बनने जा रहे हैं। एक खुशी की बात बताएं कि जिस ब्रिटेन ने हम पर डेढ़ सौ बरस शासन किया उसे हमने अब आर्थिक तरक्की के लिहाज़ से पीछे छोड़ दिया है। तीसरी बड़ी आर्थिक महा-शक्ति बन जाएंगे तो हमारे आगे केवल दो देश रह जाएंगे, दूसरे नम्बर का चीन, और पहले नम्बर पर अमरीका। सन सैंतालिस तक पहुंच हम विकसित देश हो जाएंगे। चीन और अमरीका को पछाड़ कर दुनिया की पहली महाबली आर्थिक शक्ति बन जाएंगे, इसकी घोषणा करने पर हम उतारू हो जाना चाहते हैं।
जी हां फिलहाल हम उसी अमरीका और अभी पीछे रह गये, ग्रेट ब्रिटेन की बात कह रहे हैं, जिन देशों की ओर हमारी युवा पीढ़ी से लेकर स्वप्नजीवी अधेड़ और बूढ़ों की वीज़ा बना पलायन कर जाने की कतारें लगी हुई हैं। वैसे ये कतारें तीसरी दुनिया के हर देश के नौजवानों की लगी हैं, लेकिन क्योंकि हम इस तीसरी अभी आज़ाद हुई अल्प-विकसित, अर्ध-विकसित और विकासशील उस दुनिया का नेतृत्व करते हैं, इसलिए हमारे देश से पलायन के इच्छुक लोगों की कतार सबसे बड़ी है। आजकल ब्रिटेन से लेकर अमरीका तक के शासकों को अपने-अपने देशों के मूल नागरिकों की तरक्की की बहुत चिंता सताने लगी है, और वे अपने देश का ‘निजी हित पहले’ के नारे अपनी-अपनी कुर्सी बनाये रखने के लिए हर जगह लगाने लगे हैं, इसलिए अब इस पलायन इच्छुक भीड़ का काम बहुत कठिन हो गया है। उनके ये देश अपने देश में प्रवेश पर प्रतिबन्ध बढ़ाते जा रहे हैं, और अवैध तरीके से अपने-अपने देश में घुस आये प्रवासियों की पहचान करके हथकड़ियों-बेड़ियों में वापस लौटा रहे हैं, इसलिए वहां तस्कर हो जाने का आकर्षण और भी बढ़ गया है।
ज्यों-ज्यों यह पलायन और प्रवेश का रास्ता दुर्गम होता जा रहा है त्यों-त्यों वहां प्रवेश का तरीका और भी कठिन हो गया है। इस प्रबल आकर्षण ने देश में एक नया शैक्षणिक वातावरण, एक नये साहसिक खेल का सृजन कर दिया है। शैक्षणिक वातावरण यह बना है कि अपने नये उभरते शिक्षा परिसरों को नकार कर शहर के अंधेरे कोनों में उभरती वीज़ा कम ब्रांड दिलाऊ अकादमियों के बाहर भीड़ लगाओ और किसी तरह से इन कथित समृद्ध देशों में प्रवेश पाओ, क्योंकि कानूनी रास्ते से इनमें प्रवेश कठिन हो गया है, इसलिए एक नये साहसिक अभियान का ज़िदगी बचाओ प्रेरणा विकास कर दिया है, और वह है ‘डंकी खेल’।
इस डंकी खेल में दुर्गम जंगल और रास्ते पार करते हुए हमारे पलायनकर्मी नौजवान इन धनी देशों की सरहद तक पहुंचते हैं, और फिर वहां चुपके से या राजनीतिक शरण मांगते हुए प्रवेश कर जाते हैं। वे अपने देश में प्रथम दर्जे के सम्मानित, परन्तु भूखे मरते हुए, बेकार नागरिक थे। वहां दोयम दर्जे की गुमनाम नागरिकता मिलती है, तो उसे अपना सौभाग्य मान चुपके से अपना जीवन गुज़ारने की इच्छा पूरी करते हैं, क्योंकि वहां की चलती मुद्रा में अपने देश के अस्सी या सौ रुपये आ जाते हैं। इसलिए वहां का गुमनाम अपने देश में लौट आसानी से करोड़पति बन जाता है, इसलिए रंक से राजा हो जाने का यह बहुत आसान तरीका बन गया है, लेकिन अब वहां प्रवेश कठिन हो रहा है, तो अपने देश में नशों के जाल का निर्माण या ठगी का जाल बिछा कर निर्वासित या शासित इन रंक का राजा होने का प्रयास चलता रहता है। जीवन बिताने के लिए सरकार द्वारा स्थापित अनुकम्पा बांटने वाली रेवड़ियों की दुकान है ही। इसलिए अपने देश में धीरे-धीरे हम अपना आर्थिक और सांस्कृतिक माहौल का चेहरा बदलते हुए पाते हैं। संस्कृति में शार्टकट संस्कृति और कमायी में मुफ्तखोरी का तेज़ी से विकास हो रहा है। क्या इसलिए हम कहते हैं कि दुनिया का सबसे तेज़ विकास दर रखने वाला देश है भारत।



