लावारिस कुत्तों से त्रस्त लोगों के लिए सुप्रीम कोर्ट ही आशादीप
वर्ष 2025 में भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार 37 लाख से ज्यादा लोग लावारिस कुत्तों का शिकार बने। कुछ की मौत हुई। कुछ बेचारे इलाज करवा सके और कुछ किसी से थोड़े से रुपये लेकर पांच इंजेक्शन की जगह एक इंजेक्शन ही लगवा सके। पता नहीं उनमें से कितने ऐसे हैं जो बिना इंजेक्शन के भी ठीक हैं।
आज लगता है कि कुछ लोगों का कुत्तों के प्रति प्रेम ही प्रकट हो रहा है। यह तो भला हो सुप्रीम कोर्ट का जो तीन दिन लगातार लावारिस कुत्तों के विषय पर बहुत-सी अपीलों की लगातार सुनवाई की। बहुत अच्छा लगा जब सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश यह पूछते हैं कि आखिर लावारिस कुत्तों के कारण कब तक लोग परेशान होते रहेंगे? बहुत अच्छा लगा कि देश के सुप्रीम कोर्ट के तीन न्यायाधीशों जस्टिस संदीप मेहता, जस्टिस विक्त्रम नाथ और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की पीठ ने स्पष्ट किया कि सड़कें आवारा जानवरों एवं लावारिस कुत्तों से मुक्त होनी चाहिए। अदालत ने राजस्थान हाईकोर्ट के दो जजों के साथ जो भयानक हादसा हुआ, उसका वर्णन करते हुए यह कहा कि लावारिस कुत्तों और बेसहारा जानवरों के कारण होने वाली दुर्घटनाएं बहुत गंभीर विषय है और इनको नियंत्रित करने के लिए सख्ती से सरकारों को काम करना चाहिए।
पिछले दिनों संगरूर में चार-पांच वर्ष का एक बच्चा मंदिर के आगे खेल रहा है और उसी समय उसे लगभग पांच खूंखार कुत्तों ने घेर लिया। उसे नोंचने लगे। किसी पशु प्रेमी ने तो उसे नहीं बचाया। उसकी चीखें उन्होंने नहीं सुनीं जो पशु प्रेमियों की अपीलें, दलीलें लेकर देश के सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष पहुंचे हैं। आम जनता ने ही उनकी आवाज़ सुनी और कुत्तों के चंगुल से उस बच्चे को बचाया। अच्छा होता यदि पशु प्रेमी संगरूर के अस्पताल में आकर उस गरीब बच्चे को देखते।
कभी-कभी अपने देश के पशु प्रेमियों की बुद्धि पर तरस आता है। पशुओं से, पक्षियों से यहां तक कि कीड़े-मकौड़ों से प्यार करना, उनको भोजन देना अच्छई बात है। सुप्रीम कोर्ट से यह निवेदन है कि जो पशु प्रेमी लावारिक कुत्तों की काउंसलिंग करवाना चाहते हैं, जो उनके स्वभाव को जानकर फिर सड़कों पर छोड़ने की बात करते हैं, उन्हें एक बार यह आदेश दिया जाना चाहिए कि वे सड़कों पर आम आदमी की तरह आकर देखें। अमृतसर में एक दिन में एक ही कुत्ते ने छह यात्रियों को काट दिया था। जैसे ही उसे उठाने की बात होती है तो कानून के रक्षक हाथ खड़े कर देते हैं कि उन पर केस बन जाएगा। कुछ लोगों ने यह धंधा बनाया हुआ है कि जैसे ही कोई काटने वाले कुत्ते पर ज़रा-सा बल प्रयोग करता है तो वह पुलिस को रिपोर्ट कर देते हैं, और बाद में समझौता करवा देते हैं।
भारत के सर्वोच्च न्यायालय से बड़ा और कोई नहीं। उनका आदेश कोई टाल नहीं सकता। हमें तो सुप्रीम कोर्ट का संरक्षण चाहिए। बहुत लोग कुत्तों द्वारा काटे गए, कुछेक की मृत्यु हो गई, कुछ तड़प रहे होंगे कुत्तों के काटने से होने वाली बीमारियों के कारण। जो कुत्तों के बहुत बड़े प्रेमी है, उनसे कहा जाए किपहले अपने घर से सेवा भाव शुरू करें। कम से कम देश के लाखों लावारिस कुत्तों में से दस दस कुत्ते तो अपने घरों में रखें। उनकी देखभाल करें, काउंसलिंग करें, उनके स्वभाव को समझें और फिर उन्हें सार्वजनिक जीवन में ले आएं।
देश में बहुत-से लोग लावारिस कुत्तों के प्रति दया भाव रखते हैं। अच्छा हो यदि ये पशु प्रेमी एक दिन अपने अपने राज्य में चल रहे बूचड़खानों में जाएं। वहां जाकर पशुओं की हालत देखें। लावारिस कुत्तों के पक्षधर शायद यह जान ही नहीं पाए कि भारत में एक वर्ष में 37 लाख 15 हज़ार लोगों को लावारिस कुत्तों ने काटा जबकि जार्जिया की कुल जनसंख्या 36,94,608 है।



