गम्भीर सीमा तक पहुंच चुका है प्रदूषण 

देश में पर्यावरणीय प्रदूषण की स्थिति एक बार फिर गम्भीर स्थिति में पहुंच गई है जिससे सर्वत्र चिन्ता का व्याप्त हो जाना बहुत स्वाभाविक है। सैंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर की एक ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार देश में पर्यावरण एवं वायुमंडल के निरन्तर प्रदूषित होते जाने का परिणाम यह निकला है कि देश के 44 प्रतिशत शहर प्रदूषण की व्यापक चपेट में हैं। इनमें से 24 प्रतिशत बड़े शहरों की वायु गुणवत्ता अतीव प्रदूषण-युक्त हो चुकी है। अनेक महानगरों में तो स्थिति यहां तक पहुंच चुकी है कि वहां की हवा मानव-मात्र के सांस लेने के योग्य भी नहीं रही। इसका कारण पर्यावरण के भीतर तक घुसती विषाक्त गैसें हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार पर्यावरण प्रदूषण और हवा-पानी के दूषित होने से जन-साधारण और खासकर ़गरीब एवं मध्य वर्ग के लोगों के लिए बीमारियों का ़खतरा बढ़ रहा है। दमा, श्वास रोग तो बड़े स्तर पर बढ़े ही हैं, यह प्रदूषण देश और समाज में कैंसर जैसे गम्भीर रोगों का कारण भी बन रहा है।
इस रिपोर्ट में यह भी खुलासा किया गया है कि देश के लगभग 136 शहरों में वायु-प्रदूषण की स्थिति काफी खराब है। इन शहरों की वायु गुणवत्ता बहुत कम निर्धारित मान-दण्डों के करीब आ पाती है। वायु की गुणवत्ता खराब होने से धरती के समस्त जीव चराचर के लिए खतरा बन जाता है। रिपोर्ट में यह भी दर्शाया गया है कि देश की राजधानी दिल्ली की स्थिति यह है कि हवा के प्रदूषण के कारण सूर्य के उदित होने के समय में भी परिवर्तन आया है। मौसम विभाग के जानकारों के अनुसार राजधानी दिल्ली के प्रदूषण का आलम यह है कि यह मंज़ूर कुछ दिनों अथवा महीनों की बात नहीं रहा, अपितु यह स्थिति निरन्तरता का प्रतीक बनती जा रही है। यह भी कि इस प्रदूषण-जनित माहौल के निकट भविष्य में संवरने की भी कोई सम्भावना दिखाई नहीं देती है। दिल्ली के आस-पास के इलाकों बरनीहाट और ़गाज़ियाबाद में भी लगभग ऐसी ही स्थिति पाई गई है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि देश के लगभग 4 प्रतिशत बड़े शहर ही राष्ट्रीय मान-दण्डों के अनुरूप मनुष्य मात्र को साफ और स्वच्छ हवा में सांस लेने का अवसर देने के योग्य पाये गये हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार देश के कुल 4041 छोटे-बड़े शहरों में हवा की गुणवत्ता जांचने हेतु किये गये सर्वेक्षण में लगभग 1787 शहरों में वायु की गुणवत्ता पिछले पांच वर्षों में हमेशा निर्धारित आंकड़ों से अधिक रही। बीच में कोरोना काल के दौरान दो वर्षों में बेशक इन शहरों में स्थिति जीवन जीने के योग्य रही, अन्यथा शेष सभी शहरों में हवा की गुणवत्ता कभी भी निर्धारित अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रही। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि राजधानी दिल्ली से सटे राज्यों के अधिकतर शहरों में भी स्थिति कमोबेश इसी स्तर पर बनी हुई है। उदाहरणतया उत्तर प्रदेश के कई छोटे-बड़े शहर वायु प्रदूषण के स्तर पर निचले पायदान पर आते हैं। उत्तर प्रदेश उन तीन बड़े प्रांतों में शुमार होता है जो देश के सबसे अधिक और बड़े प्रदूषित प्रांत माने जाते हैं। राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश भी दिल्ली और उत्तर प्रदेश के बाद प्रदूषित प्रांतों की कतार में दिखाई देते हैं। पंजाब में भी कमो-बेश ऐसी ही स्थिति है हालांकि यह अभी तक अनियंत्रित तो कदापि नहीं हुई।
हम समझते हैं कि देश में प्रदूषण की स्थिति किसी भी चरण और पायदान पर बेहतर स्थिति में नहीं रही है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी पिछले दिनों देश के प्रदूषित वातावरण को लेकर कड़ी टिप्पणी की थी। अदालत ने इस हेतु देश में वाहनों की बढ़ती संख्या और विकास के कई अन्य पक्षों को उत्तरदायी ठहराया था। प्रमुख पर्यावरण-प्रेमी और सांसद संत सीचेवाल ने भी पर्यावरण की स्वच्छता और वायु की शुद्धता के लिए सामूहिक और सांझे तौर पर यत्न किये जाने की आवश्यकता पर बल दिया है। उन्होंने इसके लिए बढ़ते वैश्विक तापमान और वृक्षों एवं जंगलों की अन्धा-धुंध कटाई और अवैध खनन को उत्तरदायी ठहराया है। हम समझते हैं कि नि:संदेह पर्यावरण को शुद्ध और स्वच्छ किया जाना चाहिए। अधिकाधिक वृक्षारोपण किये जाने से जहां हवा और पर्यावरण साफ होंगे, वहीं प्रकृति और मानसून की गति भी संतुलित होगी। नदियों में गिरते सीवरेज के गंदे और मल-युक्त पानी को साफ किए जाने से भी हवा की शुद्धता बढ़ेगी। बेशक विकास भावी संसार की नियति है किन्तु प्रदूषण बढ़ाने वाले कारकों पर अत्यधिक निर्भरता विनाश का कारण बन सकती है। इस हेतु वन-क्षेत्र बढ़ाये जाने और वन्य धरातल पर आवासीय बस्तियां बसाये जाने पर भी अंकुश लगाना होगा। इस प्रकार के संयुक्त यत्नों के सदका ही हम अपनी भावी संततियों को साफ-स्वच्छ हवा और स्वस्थ पर्यावरण में सांस लेने का अवसर प्रदान करने में सक्षम हो सकते हैं।

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