क्या ईरान के लिये अब परमाणु परीक्षण ज़रूरी हो गया है ?
पिछले दिनों सनकी अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प के निर्देश पर जिस तरह वेनेजुएला पर सैन्य कार्रवाई करते हुये अमरीकी सेना ने वेनेजुएला की राजधानी कराकस से वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो व उनकी पत्नी का अपहरण कर उन्हें न्यूयार्क ले जाया गया, उसने पूरी दुनिया को न केवल अचंभे में डाल दिया है, बल्कि इस घटना ने एक नई विश्व व्यवस्था व नये वैश्विक शक्ति संतुलन के गठन की संभावना को भी प्रबल कर दिया है। कितना आश्चर्य है कि नोबल शांति पुरस्कार की चाहत रखने वाले राष्ट्रपति ट्रम्प अमरीकी शक्तियों का दुरुपयोग कर इस दुनिया को जंगल राज की तरह चलाना चाह रहे हैं। वेनेजुएला पर की गयी यह गैर-कानूनी अमरीकी कार्रवाई कई संकेतों की ओर इशारा कर रही है। एक तो यह कि क्या यह विश्व की उदारवादी सोच रखने वाली ताकतों को विश्व की पूंजीवादी व अतिवादी व्यवस्था की ओर से दी जाने वाली यह एक सीधी चुनौती है? अब कोलंबिया, क्यूबा, मैक्सिको और ईरान जैसे देशों पर अमरीकी सैन्य या आर्थिक दबाव की आशंका व्यक्त की जा रही है। साथ ही अमरीका द्वारा ग्रीनलैंड पर भी अधिग्रहण की धमकी दी जा चुकी है।
इस बीच एक उपाय यह है कि ईरान परमाणु परीक्षण के द्वारा उत्तर कोरिया की तरह एक ऐसी आत्म रक्षक रणनीति पर काम करे जो अमरीका को भी युद्ध से पीछे हटने पर मजबूर कर दे। तो क्या लंबे समय से चले आ रहे तमाम ईरान विरोधी प्रतिबंधों के बावजूद उस के सामने इस समय वैसी ही स्थिति पैदा हो चुकी है कि आत्म-रक्षा के लिये अब उसे परमाणु संपन्न देशों के क्लब में शामिल होना ज़रूरी हो गया है?
गौरतलब है विगत समय में ईरान-इज़राइल के बीच चला 12 दिवसीय युद्ध उस वक्त शुरू हुआ था जब इज़राइल ने ईरान के कई सैन्य और परमाणु ठिकानों पर बमबारी की थी और ईरान के कई प्रमुख सैन्य अधिकारियों, परमाणु वैज्ञानिकों व प्रमुख राजनेताओं की हत्या कर दी थी। इतना ही नहीं अमरीका ने भी इज़राइल के समर्थन में तीन ईरानी परमाणु स्थलों पर बमबारी की। परन्तु बाद में मुंहतोड़ जवाबी कार्रवाई करते हुये ईरान ने 550 से अधिक बैलिस्टिक मिसाइलों और 1,000 से अधिक आत्मघाती ड्रोनों के साथ व्यापक स्तर पर इज़ारइल में राजधानी तेल अवीव सहित कई शहरों पर भीषण हमले किये थे। कम से कम बारह सैन्य, ऊर्जा और सरकारी स्थलों को निशाना बनाया। यहां तक कि कई अमरीकी सैन्य लक्ष्यों को भी निशाना बनाया। उस दौरान भी पश्चिमी मीडिया ईरानी सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामनेई को लेकर बार-बार तरह-तरह की अफवाह उड़ा रहा था। कभी उन्हें भूमिगत बता देता था तो कभी उनके ईरान छोड़कर भाग जाने की खबर फैला देता था। उस समय आयतुल्लाह खामनेई जनता को संबोधित करने के लिये सार्वजनिक रूप से दिखाई देते थे।
ट्रम्प के नेतृत्व वाला वर्तमान अमरीका वेनेजुएला की घटना के बाद पूरी तरह बेनकाब हो चुका है। दुनिया में सबसे अधिक तेल भण्डार रखने वाले अमरीका को विश्व के अन्य तेल उत्पादक देशों से अपनी शर्तों पर तेल चाहिये। चाहे इसके लिये कोई भी बहाना बनाकर किसी राष्ट्रपति का अपहरण तक क्यों न करना पड़े। ज़ाहिर है ईरान भी वेनेजुएला की ही तरह दुनिया के उन गिने चुने तेल उत्पादक देशों में एक है जो अमरीका को सर्वशक्तिमान नहीं मानता और न ही उसकी थानेदारी को स्वीकार करता है।
अब बात इज़राइल की नहीं बल्कि ईरान को सीधे अमरीका चुनौती दे रहा है। ईरान में चल रहे सरकार विरोधी व अमरीका इज़राइल समर्थित प्रदर्शनों को लेकर अमरीका ने ईरान को चेतावनी दी है कि यदि प्रदर्शनकारियों को मारा गया तो अमरीका ईरान पर बड़े हमले करेगा। ऐसे में ईरान अमरीकी हमलों से बचने के लिये आखिर कौन-सी रणनीति अपनाएगा? क्या निकट भविष्य में ईरान भी परमाणु परीक्षण कर ‘परमाणु क्लब’ में शामिल हो जाएगा ताकि अमरीका व इज़राइल जैसे देशों को सैन्य हमले से रोका जा सके? यदि ईरान में उपजे सत्ता विरोधी प्रदर्शनों के बीच ईरान रूस और चीन जैसे सहयोगी देशों की मदद से परमाणु परीक्षण करता है तो इससे ईरान की जनता में सुरक्षा, स्वाभिमान तथा राष्ट्रवाद तो बढ़ेगा ही, साथ ही वहां आंतरिक राष्ट्रीय एकता भी बढ़ेगी। इसके अलावा ईरान का क्षेत्रीय प्रभाव भी बढ़ेगा साथ ही अमरीकी एक-ध्रुवीयता का विरोध करने वाले देशों को भी मज़बूती मिलेगी।
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