मगनरेगा पर भी एकजुट नहीं हुईं विपक्षी पार्टियां
यह सही है कि ‘इंडिया’ ब्लॉक का गठन लोकसभा चुनाव के लिए हुआ था और उसके बाद इसकी प्रासंगिकता ज्यादा नहीं है। राज्यों में विपक्षी पार्टियों को इस गठबंधन के तहत चुनाव नहीं लड़ना है, लेकिन चुनावी राजनीति से अलग जिस तरह से संसद सत्र के दौरान इस गठबंधन की पार्टियां मिल कर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोलती हैं, वैसी कोई पहल संसद के बाहर नहीं दिखती है। इसकी मिसाल मगनरेगा बचाओ आंदोलन है, जिसमें कांग्रेस पार्टी अकेले चल रही है। कांग्रेस ने किसी अन्य विपक्षी पार्टी से सम्पर्क नहीं किया है। 10 जनवरी से उसका देश भर में अभियान शुरू हो गया है। कांग्रेस की कई सहयोगी पार्टियों ने कहा कि अगर उनसे सम्पर्क किया जाता है तो वे इस आंदोलन में शामिल हो सकती थीं। चुनावी राज्यों में खास कर पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में इसे चुनावी मुद्दा बनाया जा सकता था, मगर कांग्रेस अकेले यह लड़ाई लड़ना चाहती है। इसमें मुश्किल यह है कि कांग्रेस के पास अनेक राज्यों में बहुत मज़बूत संगठन नहीं है। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों में कांग्रेस सिर्फ विरोध की औपचारिकता निभा रही है। बिहार और झारखंड में तो कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष ही इतने कमज़ोर हैं कि उनके कहने से कहीं 10 लोग इकट्ठा नहीं हो रहे। गौरतलब है कि इन राज्यों में मगनरेगा के लाभार्थियों की बड़ी संख्या है। अगर समाजवादी पार्टी, झारखंड मुक्ति मोर्चा, राष्ट्रीय जनता दल और वामपंथी पार्टियां भी साथ होती तो कांग्रेस इसे बड़ा आंदोलन बना सकती थी।
मेडिकल कॉलेज बंद होने पर जश्न
देश में अस्पतालों, डॉक्टरों और मेडिकल कॉलेजों की कितनी कमी है, इसका अंदाज़ा देश भर में बड़े सरकारी अस्पतालों के बाहर सड़कों और फुटपाथों पर डेरा जमाए बीमार लोगों और उनके परिजनों को देख कर लगाया जा सकता है। इसीलिए आमतौर पर होता यह है कि लोग अपने शहर या ज़िले में मेडिकल कॉलेज खोलने की मांग को लेकर प्रदर्शन करते हैं और जब उनकी मांग पूरी हो जाती है तो वे ढोल-ढमाके के साथ अपनी खुशी का इज़हार करते हैं, लेकिन जम्मू-कश्मीर में इसका ठीक उलटा हुआ है। वहां लोगों ने मेडिकल कॉलेज बंद कराने के लिए संघर्ष किया और जब उनकी मांग पूरी हो गई तो उन्होंने जमकर खुशी मनाई। जम्मू स्थित श्री माता वैष्णो देवी मेडिकल कॉलेज की मान्यता भारत सरकार के नेशनल मेडिकल कमीशन ने इसलिए रद्द कर दी, क्योंकि 50 सीटों वाले उस कॉलेज में मैरिट के आधार 42 मुस्लिम छात्रों को दाखिला मिला था। दाखिला पाने वाले आठ अन्य छात्रों में सात हिंदू और एक सिख था। ये सभी 50 छात्र राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षा ‘नीट’ (एनईईटी) में सफल होकर आए थे। जम्मू के हिंदू संगठनों को यह बात हज़म नहीं हो रही थी। उनका कहना था कि माता वैष्णो देवी के चढ़ावे से चलने वाले मेडिकल कॉलेज में 50 में से 42 सीटों पर मुसलमान कैसे आ सकते हैं? बस इसी बात को लेकर उन्होंने मेडिकल कॉलेज बंद करने की मांग की और उनकी मांग पर सरकार ने तकनीकी कमियों का बहाना बनाते हुए मेडिकल कॉलेज की मान्यता रद्द कर दी।
बजट रविवार को पेश होगा
इस बार आम बजट रविवार को पेश हो सकता है। केंद्र सरकार की राजनीतिक मामलों की कैबिनेट कमेटी ने हर साल की तरह इस साल भी 28 जनवरी से बजट सत्र बुलाने की सिफारिश की है। साल के पहले संसद सत्र की शुरुआत राष्ट्रपति के अभिभाषण से होती है और उसके बाद वित्त मंत्री द्वारा वार्षिक आर्थिक सर्वे पेश किया जाता है और फिर एक फरवरी को बजट पेश होता है। इस बार एक फरवरी रविवार को है। इसीलिए यह संशय पहले से जताया जा रहा है कि रविवार को बजट कैसे पेश होगा, लेकिन जानकार बताते हैं कि सरकार का इसमें बदलाव करने का कोई इरादा नहीं है। हालांकि अंतिम फैसला अभी नहीं हुआ है। अगर सरकार बजट पेश करने की तारीख में बदलाव नहीं करती है तो रविवार को भी संसद की कार्यवाही चलेगी और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बजट पेश करेंगी। कहा जा रहा है कि वित्तीय प्रक्रियाओं का चक्र और उनकी स्थिरता बनाए रखने के लिए सरकार रविवार को ही बजट पेश करेगी। गौरतलब है कि पहले 28 फरवरी को बजट पेश होता था, लेकिन 2017 में सरकार ने कहा कि 28 फरवरी को बजट पेश करने से इसके प्रावधानों को एक अप्रैल से लागू करने में समस्या आती है। इसलिए 2017 से एक फरवरी को बजट पेश किया जाने लगा।
रेखा गुप्ता का ज्ञान
सोशल मीडिया में इस बात पर हैरानी है कि किसी मुख्यमंत्री की ज़ुबान इतनी कैसे फिसल सकती है, जितनी दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता की फिसल गई? यह सवाल इसलिए है क्योंकि रेखा गुप्ता ने इस देश के दो सबसे महान स्वतंत्रता सेनानियों नेताजी सुभाष चंद्र बोस और शहीद-ए-आज़म भगत सिंह के बारे में गलतबयानी की और उसके बाद भाजपा के लोग ज़ुबान फिसल जाने का तर्क लेकर आए। इसीलिए सवाल है कि क्या हर बार उनकी जबान फिसल रही है या वह इन स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में नहीं जानती हैं? दिल्ली विधानसभा के शीतकालीन सत्र में रेखा गुप्ता ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू की शहादत को याद किया और कहा कि कांग्रेस की बहरी सरकार को सुनाने के लिए भगत सिंह ने असेंबली में बम फेंका था। इसे ज़ुबान फिसलना कहेंगे या अज्ञान? ऐसा लग रहा है कि वह नहीं जानती हैं कि भगत सिंह अंग्रेज़ों के खिलाफ लड़े थे और अंग्रेज़ों ने ही उन्हें फांसी दी थी। इसी तरह कुछ दिन पहले उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम लिया तो नेताजी सुभाष चंद्र पैलेस बोल गईं। नेताजी सुभाष चंद्र पैलेस पीतमपुरा में एक मार्केट प्लेस है। वैसे इतिहास का अटपटा ज्ञान बघारने वाली रेखा गुप्ता भाजपा की अकेली मुख्यमंत्री नहीं हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के मुख्यमंत्री भी अपने ऐसे ही अटपटे बयानों को लेकर आए दिन सुर्खियां बटोरते रहते हैं।
महाराष्ट्र की सभी पार्टियां बेनकाब
वैसे तो पूरे देश में ही राजनीतिक दलों का एकमात्र मकसद सत्ता प्राप्त करना होता है लेकिन महाराष्ट्र का मामला उसमें भी सबसे अलग है। वहां नगर पंचायत और नगर परिषद के चुनाव में सभी पार्टियों का एक-दूसरे के साथ गठबंधन था। इस सिलसिले में अब जो खबर आई है, वह सबसे ज्यादा हैरान करने वाली है। दो नगर परिषदों पर कब्ज़ा करने के लिए भाजपा ने एक जगह कांग्रेस से और दूसरी जगह असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एमआईएम से हाथ मिला लिया। पहला मामला ठाणे की अंबरनाथ नगर परिषद का है, जहां 60 में से 27 सीटें भाजपा की सहयोगी एकनाथ शिंदे की शिव सेना ने जीती हैं। लेकिन अपनी सहयोगी पार्टी को रोकने के लिए भाजपा ने कांग्रेस से तालमेल कर लिया। भाजपा के 14 और कांग्रेस के 12 सदस्य जीते हैं। इसके अलावा अजित पवार की एनसीपी के चार सदस्यों को साथ जोड़ लिया गया। ऐसे ही अकोला ज़िले की अकोट नगर परिषद पर कब्ज़े के लिए भाजपा ने अकोट विकास मंच बना लिया, जिसमें एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे दोनों की शिव सेना और शरद व अजित पवार दोनों की एनसीपी शामिल हैं। ओवैसी की पार्टी के चार सदस्य भी इसी से जुड़े हैं। जब इस बात के लिए आलोचना शुरू हुई तो मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने गठबंधन तोड़ने की बात कही तो कांग्रेस ने अपने सदस्यों को निलंबित कर दिया। कहा जा रहा है कि यह फैसला स्थानीय स्तर पर किया गया था, लेकिन यह लोगों की आंखों में धूल झोंकना है।





