रासायनिक खाद का इस्तेमाल कम करने की ज़रूरत

पिछली शताब्दी के मध्य से सब्ज़ क्रांति के दौरान रासायनिक खाद का इस्तेमाल शुरू हुआ और हर साल बढ़ता गया, जिसमें यूरिया की खपत शिखर पर रही। पंजाब में गेहूं और धान का फसली चक्र प्रधान होने की वजह से प्रति एकड़ यूरिया की खपत सभी राज्यों से ज़्यादा है। पूरे भारत में यह 40 मिलियन टन को छू रही है। भारत सरकार यूरिया पर भारी सब्सिडी देती है। हालांकि 5-6 मिलियन टन यूरिया महंगे दाम पर निर्यात करना पड़ता है। किसानों को यह बहुत सस्ते दाम 266 रुपये में 45 किलो का नीमलिप्त थैला उपलब्ध है। यह एतमात्र ऐसी खाद है जिसकी कीमत पिछले एक दशक से नहीं बढ़ाई गई है। 
पंजाब में 35 लाख हेक्टेयर में गेहूं की बुआई हुई है, जिसके लिए कृषि और किसान कल्याण विभाग के निदेशक डॉ. जसवंत सिंह के अनुसार 15.5 लाख टन यूरिया की ज़रूरत है। पीएयू द्वारा 110 किलो प्रति एकड़ यूरिया डालने की सिफारिश की गई है, परन्तु किसान 200 से 220 किलो प्रति एकड़ तक भी यह खाद डाल रहे हैं।  पीएयू की यूरिया की खपत कम करने संबंधी की गई यह सिफारिश भी है कि यदि दूसरी सिंचाई के दौरान खेत में पानी खड़ा हो तो यूरिया डालने की बजाय 7.5 प्रतिशत यूरिया के घोल के दो छिड़काव बुआई के 42 और 54 दिन बाद किसी धूप वाले दिन किए जाएं। छिड़काव दो-तरफा किया जाना चाहिए ताकि फसल को पूरा लाभ पहुंचे। मध्य दिसम्बर के बाद बोए गए गेहूं को सही समय पर बोए गए गेहूं के मुकाबले 25 प्रतिशत कम नाइट्रोजन (यूरिया) डालने के लिए भी पीएयू ने कहा है। जबकि कलराठी ज़मीन में बोए गए गेहूं को 25 प्रतिशत ज़्यादा नाइट्रोजन डालने की सिफारिश की गई है। पंजाब का फसली घनत्व भी ज़्यादा है होने के कारण यूरिया की खपत ज़्यादा है। आलू की काश्त का रकबा भी बढ़ रहा है। अब यूरिया की कमी प्रत्येक वर्ष महसूस की जा रही है। इस साल तो शुरू-शुरू में कुछ किसानों ने कुछ अधिक दाम देकर भी यूरिया खरीदा था। पंजाब में 60 प्रतिशत यूरिया सहकारी सोसाइटियों के ज़रिए और 40 प्रतिशत यूरिया के निजी डीलरों के माध्यम से दिया जाता है। इस वितरण प्रणाली में सुधार लाने की ज़रूरत है, क्योंकि कहीं पर सोसाइटियों और डीलरों के पास यूरिया अधिक है और कहीं उपलब्ध ही नहीं है।
भारत के सभी राज्य से ज़्यादा पंजाब में गेहूं और धान में यूरिया और डीएपी डाला जा रहा है। यूरिया की खपत बढ़ने से बीमारियां और हानिकारक कीड़ों के हमले बढ़ रहे हैं, जिसकी वजह से कीटनाशकों और नदीननाशकों का इस्तेमाल बढ़ रहा है। हालांकि यूपीएल जैसी कंपनियां जिनके कीटनाशक और नदीननाशक प्रभावशाली सिद्ध हुए हैं, किसानों को स्तरीय उत्पाद दे रही हैं। सरकार यूरिया की खपत कम करने के यत्न कर रही है, जैसे 50 किलो यूरिया का थैला 45 किलो का कर दिया है, लेकिन इसमें कोई ज़्यादा सफलता नहीं मिली। गैर-रासायनिक खादों का इस्तेमाल बढ़ाने की ज़रूरत है। सब्ज़ खाद, वर्मीकम्पोस्ट आदि का इस्तेमाल करके उत्पादन बढ़ाया जा सकता है। पंजाब में बहुत कम रकबा है जहां जैविक कृषि की जाती है। इसे बढ़ाने की ज़रूरत है। रबी की कटाई के बाद खरीफ की फसलों तक जो खाली समय होता है, उस समय में सब्ज़ खाद पैदा करके यूरिया का इस्तेमाल कम किया जा सकता है। इससे ज़मीन की उपजाऊ शक्ति भी बढ़ेगी। सब्ज़ खाद के बहुत लाभ हैं। ज़मीन की निचली परतों से जड़ों के ज़रिए पौष्टिक तत्व ऊपर आ जाते हैं। ज़मीन में कल्लर सुधार आता है। ज़मीन की उपजाऊ शक्ति बढ़ती है। गैर-रासायनिक खाद के इस्तेमाल से दाने का आकार और वज़न सुधरता है। सब्ज़ियों की गुणवत्ता बढ़ती है। वर्मीकम्पोस्ट मिट्टी के खारेपन को ठीक करके पौधों के विकास के लिए ज़रूरी तत्व उपलब्ध करता है जबकि रासायनिक खाद एक-दो तत्व ही उपलब्ध करती है।रासायनिक खादों की अधिक डाली जा रही मात्रा को कम करने से यूरिया की बचत होगी और किसानों की आय बढ़ेगी, खर्च कम होगा, उत्पादन बढ़ेगा। इस समय किसान रासायनिक खाद पर ज़्यादा खर्च इसलिए कर रहे हैं कि प्रति एकड़ उत्पादन बढ़ेगा। बहुमत कोई हिसाब-किताब नहीं रखती। परिणामस्वरूप किसानों पर कज़र् बढ़ रहा है। पंजाब की आर्थिकता मुख्य रूप से कृषि पर आधारित है। कृषि का खर्च बढ़ने से राज्य की प्रति व्यक्ति आय दूसरे राज्यों के मुकाबले कम हो रही है। यहां तक कि हरियाणा और हिमाचल प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय भी पंजाब से बढ़ गई। किसी समय में प्रति व्यक्ति आय के पक्ष से पंजाब सभी राज्यों में शीर्ष पर था, जो अब बहुत नीचे आ गया है। कृषि आय बढ़ाने के लिए फसली विभिन्नता एक समाधान है, लेकिन इसमें कोई खास सफलता नहीं मिल रही है।
स्थानीय कंपनियों जैसे इफ्को, एनएफएल, कृभको, चम्बल फर्टिलाइज़र, आरसीएफ आदि प्लांटों में यूरिया खपत से बहुत कम मात्रा में बनाया जा रहा है। एक अनुमान के अनुसार यदि स्थानीय उत्पादन क्षमता नहीं बढ़ी तो 10 मिलियन टन तक यूरिया आयात भी करना पड़ सकता है। इससे खादों पर सब्सिडी बढ़ेगी और केंद्र को अपने बजट में सब्सिडी में बहुत वृद्धि करनी पड़ेगी।

email: bhagwandass226@gmail.com

#रासायनिक खाद का इस्तेमाल कम करने की ज़रूरत