मगनरेगा को लेकर कांग्रेस में बढ़ी सरगर्मी

राहुल गांधी ने तुरुप का इक्का चल दिया है। यह दांव अगर चल गया तो राहुल और कांग्रेस एक साथ दो बाजियां जीत सकते हैं। एक बाज़ी है महात्मा गांधी के नाम पर बने ग्रामीण रोज़गार गारंटी कार्यक्रम को वापिस लाने की। दूसरी बाज़ी है दलितों के समर्थन के इर्द-गिर्द एक बार फिर ़गैर-भाजपा विपक्षी एकता कायम करने की। कांग्रेस कार्यसमिति की हालिया बैठक में मनरेगा को फिर से लाने के लिए एक राष्ट्रीय मोर्चा बनाने की कसम खाई गई थी। एक संघर्ष करने का व्रत लिया गया था। इन दोनों संकल्पों को पढ़ कर कोई भी समझ सकता है कि यह लड़ाई केवल कांग्रेस पार्टी की नहीं होने जा रही है। इसका मकसद उन पार्टियों को कांग्रेस के साथ एक मंच पर लाना है जो चुनाव लड़ती हैं, और ‘इंडिया गठबंधन’ का हिस्सा या तो हैं, या रह चुकी हैं। साथ ही इसका मकसद देश भर में फैले ऐसे संगठनों को भी उसी मंच पर लाना है जो दलितों में काम करते हैं, जो ग्रामीण इलाकों में देश के सबसे कमज़ोर तबके के लिए संघर्ष करते रहते हैं। ये संगठन अपने झंडे पर चुनाव नहीं लड़ते। हां, उनके कुछ नेता, कुछ कार्यकर्ता ज़रूरी मौका मिलने पर दूसरी पार्टियों के भीतर जा कर चुनाव में अपना भाग्य अजमाते रहते हैं। पर ये संगठन मुख्यतौर पर ़गैर-चुनावी राजनीति करते हैं। जो भी हो, इनका महत्त्व इसलिए है कि ये संगठन दलित समुदायों के भीतर गहराई से उतरे हुए हैं। 
कांग्रेस ने मनरेगा को लेकर सभी राज्यों में आंदोलन का प्लान तैयार किया है। वह नये कानून से प्रभावित गरीबों को बताएगी कि नया कानून मनरेगा को कमजोर करने की साज़िश है। जी राम जी कानून में सब कुछ दिल्ली तय करेगा। पहले मनरेगा डिमांड ड्रिवन था लेकिन अब फंड खत्म होने के बाद कोई काम नहीं मिलेगा। महात्मा गांधी का नाम इस स्कीम से हटाना सबसे दुर्भाग्यपूर्ण है। कांग्रेस कह रही है कि हम मनरेगा बचाओ संग्राम शुरू करने जा रहे हैं ताकि किसानों, पिछड़ों व दलितों के सम्मान की रक्षा कर सके। राहुल जानते हैं, मल्लिकार्जुन खड़गे जानते हैं, कांग्रेस जानती है और अन्य पार्टियां भी जानती हैं कि मनरेगा दरअसल सबसे ज्यादा ग्रामीण दलितों को लाभ पहुंचाने वाला कार्यक्रम था। अगर कोई दलित है, गांव में रहता है, अकुशल मज़दूर है तो वह दरअसल खेत मज़दूरों समेत अन्य क्षेत्रों में मज़दूरी करने वाला ग्रामीण सर्वहारा हुआ। मनरेगा भारत माता की इन्हीं संतानों को रोज़गार मुहैया कराने का काम करता था। अगर कांग्रेस के इस आंदोलन के ज़रिये मोदी सरकार पर मनरेगा को वापिस लाने का मकसद पूरा किया जा सका, तो तय समझिये कि ग्रामीण दलित जनता भाजपा के दायरे में अगर कुछ है, तो वहां से बाहर आ जाएगी। वह या तो कांग्रेस से जुड़ेगी या अन्य विपक्षी दलों से जुड़ेगी। ज़ाहिर है कि इससे भाजपा के वोट कम होंगे, ़गैर-भाजपा दलों के बढ़ेंगे। साथ में यह संघर्ष करते-करते एक बार फिर उसी ‘इंडिया गठबंधन’ की तस्वीर उभरेगी जो 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद दब गई थी। 
कांग्रेस ने काम के अधिकार की रक्षा करने के लिए ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ की राष्ट्रव्यापी शुरुआत 10 जनवरी से 25 फरवरी तक चलने वाली है। इसके कार्यक्रम की जो घोषणा की गई है, कांग्रेस इसके बारे में बहुत गंभीर है। कांग्रेस ने इस आंदोलन के ज़रिये साफ तौर पर तीन मांगें रखी हैं। नया जी राम जी कानून वापस लिया जाए, मनरेगा को अधिकार आधारित कानून के तौर पर बहाल किया जाए, काम के अधिकार और पंचायतों के अधिकार को बहाल किया जाए। यह एक कानूनी गारंटी है। इसके कारण करोड़ों सबसे गरीब लोगों को उनके अपने गांवों में काम मिला, भूख और मजबूरी में पलायन कम हुआ, ग्रामीण मज़दूरी बढ़ी और महिलाओं की आर्थिक गरिमा मज़बूत हुई। जी राम जी कानून इस अधिकार को खत्म करने के लिए बनाया गया है। इसके कारण काम अब गारंटी वाला अधिकार नहीं रहेगा, बल्कि चुनी हुई पंचायतों के हक में सिर्फ एक अनुमति रह जाएगी। इसका बजट सीमित कर दिया जाएगा, इसलिए संकट के समय पैसा खत्म होने पर काम बंद हो जाएगा।  दिल्ली फंड और काम तय करेगी, जिससे ग्राम सभाएं और पंचायतें बेकार हो जाएंगी।   
इसके लिए 8 जनवरी को प्रदेश कमेटी के स्तर पर आंदोलन की तैयारी बैठकें हुईं। 10 जनवरी को ज़िला स्तरीय प्रैस सम्मेलन किये गए। प्रस्तावित कानून के ग्रामीण रोज़गार और आजीविकाओं पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के प्रति मीडिया को संवेदनशील बनाया गया। 11 जनवरी को ज़िला मुख्यालयों, जैसे महात्मा गांधी या डा. बी.आर. आंबेडकर की प्रतिमाओं के पास, पार्टी नेताओं, निर्वाचित प्रतिनिधियों और मनरेगा श्रमिकों की भागीदारी के साथ एक दिवसीय उपवास किया गया। 12 जनवरी से 29 जनवरी तक सभी ग्राम पंचायतों में चौपालें और जनसंपर्क कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। इस चरण के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जन खड़गे तथा नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के पत्र ग्राम प्रधानों, पूर्व ग्राम प्रधानों, रोज़गार सेवकों और मनरेगा श्रमिकों तक पहुंचाए जाएंगे। साथ ही विधानसभा स्तर पर नुक्कड़ सभाएं व पर्चा वितरण भी किया जाएगा। 30 जनवरी  को वार्ड और खंड विकास स्तर पर शांतिपूर्ण धरने होंगे, जिनमें अहिंसा, संवैधानिक मूल्यों और काम के अधिकार पर जोर दिया जाएगा। 31 जनवरी से 6 फरवरी  तक ज़िला स्तरीय मनरेगा बचाओ धरना होगा। ज़िला मजिस्ट्रेट कार्यालयों के दफ़्तरों पर धरने आयोजित किए जाएंगे। फिर इसके बाद  विधेयक को वापस लेने और मनरेगा को उसके मूल स्वरूप में बहाल करने की मांग करते हुए ज्ञापन सौंपे जाएंगे। 
7 फरवरी से यह आंदोलन विधानसभा स्तर पर पहुंच जाएगा। 7 से 15 फरवरी तक राज्य स्तरीय विधानसभा घेराव होगा। प्रदेश कमेटी के नेतृत्व में राज्य स्तर पर विधानसभाओं का घेराव करते हुए अधिकतम गोलबंदी के ज़रिये केंद्र सरकार द्वारा ग्रामीण मज़दूरों के प्रति जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की नीति और राज्यों पर डाले जा रहे बोझ को उजागर किया जाएगा। 16 से 25 फरवरी तक क्षेत्रीय स्तर पर अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी रैलियां करेगी। इस अभियान के समापन के रूप में एआईसीसी द्वारा चार प्रमुख क्षेत्रीय रैलियों का आयोजन किया जाएगा। कांग्रेस आलाकमान ने सभी प्रादेशिक इकाइयों को हिदायत दी है कि वे इस घोषित कार्यक्रम का निष्ठापूर्वक पालन सुनिश्चित करें, प्रत्येक स्तर पर अधिकतम गोलबंदी की जाए तथा पूरे अभियान काल में मीडिया से लगातार संवाद किया जाए और जनसंपर्क बनाए रखा जाए। आंदोलन ठीक से हो, कोई गफलत न हो, केवल खानापूरी न की जाए। अब सवाल यह है कि कांग्रेस के इस आंदोलन की प्रतिक्रिया में सरकार क्या करेगी? क्या वह इस शांतिपूर्ण आंदोलन का दमन करेगी, गिरफ़्तारियां करेगी, मुकद्दमे कायम करेगी या आखिर क्या करेगी? सरकार की प्रतिक्रिया और योजना सामने आने पर इस आंदोलन के दूसरे पक्ष सामने आएंगे जो आकस्मिक निर्णय की मांग करने वाले हैं। इसी तरह सवाल यह भी है कि कांग्रेस के अलावा अन्य विपक्षी दल इस आंदोलन को ज़मीन पर होते देख कर क्या करेंगे?

लेखक अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में प्ऱोफेसर और भारतीय भाषाओं के अभिलेखागारीय अनुसंधान कार्यक्रम के निदेशक हैं।

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