समय के साथ धर्म का सामंजस्य है मकर संक्रांति का मूल भाव

मकर संक्रांति भारतीय संस्कृति का वह दुर्लभ पर्व है, जो परम्परा की जड़ों में भी है और आधुनिकता की शाखाओं पर भी। यह केवल तिल, गुड़, पतंग और दान तक सीमित उत्सव नहीं, बल्कि दिशा-परिवर्तन का सार्वकालिक प्रतीक है, प्रकृति में, व्यक्ति में, समाज में और सत्ता के चरित्र में भी। संक्रांति केवल सूर्य की नहीं, चेतना की भी होती है।
धार्मिक और आध्यात्मिक आधार 
धार्मिक दृष्टि से मकर संक्रांति का मूल भाव है समय के साथ धर्म का सामंजस्य। भारतीय दर्शन समय को निरपेक्ष नहीं मानता, वह समय को नैतिक बनाता है। उत्तरायण को देवताओं का दिन कहना इस बात का संकेत है कि यह काल सत्कर्म, संयम और लोकहित के लिए उपयुक्त है।
आध्यात्मिक स्तर पर यह पर्व हमें याद दिलाता है कि जीवन की वास्तविक साधना बाहरी अनुष्ठानों में नहीं, बल्कि भीतर के सूर्य को उत्तरायण में लाने में है। जब चेतना अंधकार, भय, क्रोध और स्वार्थ से निकल कर विवेक, करुणा और उत्तरदायित्व की ओर बढ़ती है, तभी सच्ची मकर संक्रांति  घटित होती है।
वैज्ञानिक और भौतिक पक्ष
मकर संक्रांति भारतीय कालगणना की वैज्ञानिक सूझ-बूझ का प्रमाण है। सूर्य का मकर राशि में प्रवेश पृथ्वी की धुरी, ऋतु परिवर्तन और जैविक चक्रों से जुड़ा है। यह वह समय है जब प्रकृति धीरे-धीरे पुनर्जीवन की ओर बढ़ती है। भौतिक जीवन में इसका सीधा असर शरीर, कृषि और अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। रबी की फसलें तैयार होती हैं, किसानों के चेहरे पर उम्मीद लौटती है। यही कारण है कि देश के अलग-अलग हिस्सों में यह पर्व फसल उत्सव के रूप में मनाया जाता है। संक्रांति के साथ पोंगल, बिहू, लोहड़ी, जीवन में उत्तरायण यानी देवत्व की आने के प्रतीक हैं। ये सभी पर्व नई फसलों के आने की खुशी में मनाए जाते हैं। इसलिए यह संयोग नहीं, बल्कि संकेत है कि भारतीय परम्परा में आर्थिक चक्र और सांस्कृतिक उत्सव अलग नहीं हैं।
मनोवैज्ञानिक आयाम
लम्बी सर्द रातें मनुष्य के मन पर बोझ डालती हैं। आधुनिक मनोविज्ञान मानता है कि इस समय अवसाद, थकान और निराशा बढ़ती है। मकर संक्रांति  इस मनोवैज्ञानिक जड़ता को तोड़ने का सांस्कृतिक उपाय है। गहराई से देखें तो मकर संक्रांति  पर पतंग उड़ाना केवल आनंद नहीं वरन् आकाश की ओर देखने का अभ्यास है, जो भविष्य की उन्नति का प्रतीक है।
तिल-गुड़ बांटना केवल मिठास ही नहीं, अपितु सामाजिक कटुता कम करने का सामाजिक मनोविज्ञान भी है। दान केवल धार्मिक कर्म नहीं, स्वार्थ के बोझ से मुक्ति का प्रतीक भी है। यह पर्व व्यक्ति को अकेलेपन से निकालकर समुदाय में लौटाता है।
सामाजिक पक्ष 
आज का समाज तेज़ी से खंडित हो रहा है—जाति, वर्ग, भाषा, विचारधारा और डिजिटल दीवारों में बंटता हुआ। मकर संक्रांति का सामाजिक संदेश इसके ठीक विपरीत है। यह पर्व कहता है. ‘तिल जैसा छोटा भी हो, पर साथ जुड़ कर ही मिठास बनती है।’
दान की परम्परा सामाजिक असमानता को पूरी तरह मिटा नहीं सकती, लेकिन यह संवेदनशीलता की संस्कृति ज़रूर पैदा करती है। यह पर्व समाज को याद दिलाता है कि सम्पन्नता का मूल्य तभी है जब वह साझा की जाए। सामाजिक दृष्टि से मकर संक्रांति ऊपर से नीचे देखने की नहीं, बल्कि साथ बैठकर खाने और बांटने की संस्कृति है।
भौतिकवाद के युग में संक्रांति 
आज का मनुष्य भौतिक साधनों से घिरा है, लेकिन भीतर से अक्सर खाली। मकर संक्रांति भौतिकता का निषेध नहीं करती, बल्कि उसे मर्यादा में रखती है। मकर संक्रांति पर्व सिखाता है कि भोग के साथ त्याग भी हो, उपभोग के साथ उत्तरदायित्व भी। तिल-गुड़ का साधारणपन इस बात का संकेत है कि आनंद के लिए ‘अति’ आवश्यक नहीं। आज जब पर्व भी बाज़ार का हिस्सा बनते जा रहे हैं, मकर संक्रांति  हमें याद दिलाती है कि सरलता भी समृद्धि है।
राजनीतिक पक्ष 
मकर संक्रांति का राजनीतिक पक्ष अक्सर अनदेखा रह जाता है, लेकिन यह पर्व सत्ता से भी सवाल करता है। राजनीति में उत्तरायण का अर्थ है लोक की ओर बढ़ना। यदि सत्ता दक्षिणायन में है, स्वार्थ, अहंकार और दमन की ओर है तो उसे भी दिशा बदलनी चाहिए।
दान का अर्थ केवल व्यक्तिगत पुण्य नहीं, बल्कि राज्य की सामाजिक ज़िम्मेदारी भी है। फसल उत्सव का अर्थ केवल उत्सव नहीं, बल्कि किसान के श्रम का सम्मान भी है। प्रकाश की ओर यात्रा का अर्थ केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि पारदर्शी और उत्तरदायी शासन भी है। मकर संक्रांति सत्ता को याद दिलाती है कि उसका धर्म केवल शासन करना नहीं, बल्कि सेवा करना भी है।
आधुनिक संदर्भ
आज मकर संक्रांति का स्वरूप बदल रहा है। डिजिटल शुभकामनाएं, ड्रोन से उड़ती पतंगें, पैकेड मिठाइयां, यह परिवर्तन स्वाभाविक है। परन्तु सवाल यह है कि क्या भाव बचा है? आधुनिक संदर्भ में यह पर्व हमें आत्म-मंथन का अवसर देता है और हमसे प्रश्न करता है कि क्या हमारी प्रगति सचमुच प्रकाश की ओर है? क्या हमारी राजनीति उत्तरायण में है या दक्षिणायन में? क्या हमारा समाज जुड़ रहा है या टूट रहा है? यदि इन सवालों से संवाद हो जाए तो मकर संक्रांति आधुनिक भी है और प्रासंगिक भी।
मकर संक्रांति केवल तारीख या कोई जादुई दिन नहीं, बल्कि जाग जाने का संकेत है। यह हमें याद दिलाती है कि जीवन में, समाज में और राष्ट्र में दिशा बदली जा सकती है और ऐसा तभी संभव है जब व्यक्ति भीतर से बदले, समाज कटुता छोड़कर मिठास चुने और सत्ता स्वार्थ से लोक की ओर बढ़े, तभी सच्ची मकर संक्रांति होगी। सूर्य तो हर साल उत्तरायण होता है, सवाल यह है कि हम भी होते हैं या नहीं, और जिस दिन हम पूर्णतया उत्तरायणी हो जाएंगे, उसी दिन जीवन में मकर संक्रांति हो जाएगी। (एजेंसी)

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