सर्वोच्च् न्यायालय की नाराज़गी

विगत दिवस सर्वोच्च न्यायालय ने देश भर में प्रादेशिक और केन्द्र सरकार द्वारा लोगों को वोटों के लिए लुभाने के लिए ज्यादातर राजनीतिक पार्टियों द्वारा किये जाते वायदों पर कड़ी नाराज़गी प्रकट की है। विशेष रूप से चुनावों के समय इन पार्टियों द्वारा लोक लुभावन वायदे किए जाते हैं ताकि वोट का इस्तेमाल करते हुए उनका झुकाव कहीं इन वायदों या म़ुफ़्तखोरी पर आधारित योजना की ओर रहे और उनका इन चीज़ों से प्रभावित होकर इन पार्टियों को  वोट दें। यह कोई आश्चर्यजनक बात नहीं कि ललचाई जनता का झुकाव अक्सर इन बातों की ओर हो जाता है। सर्वोच्च न्यायालय तमिलनाडु विद्युत कार्पोरेशन और तमिलनाडु सरकार द्वारा सभी उपभोक्ताओं को मुफ्त बिजली देने की बनाई जा रही योजना संबंधी याचिका पर सुनवाई कर रहा था। 
न्यायालय ने निगम को उपभोक्ताओं की वित्तीय स्थिति और जांच किए बिना किसी को मुफ्त बिजली देने का वायदा करने के लिए फटकार लगाई। इसी समय चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने आज देश में पैदा हो रही समूची स्थिति का आकलन करते हुए कहा कि सरकारों का फज़र् तो यह होना चाहिए कि वह अधिक से अधिक रोज़गार पैदा करने के स्रोत जुटाएं। बड़ी जनसंख्या वाले इस देश में बेरोज़गारी आज सबसे बड़ी समस्या बनी दिखाई देती है। यदि सरकारें अपने आर्थिक स्रोतों को मुफ्त की योजनाओं में गंवा दें तो वह रोज़गारोन्मुखी योजनाओं को सफल कैसे बनाएंगी?  सर्वोच्च न्यायालय ने सभी राजनीतिक पार्टियों को गम्भीरता से इस विषय पर सोचने की अपील की और यह भी कहा कि इस पक्ष से समूची स्थिति पर दृष्टिपात करने का समय आ गया है। 
आज देश भर में यह स्थिति देखी जा सकती है। लोगों को मुफ्त भोजन लेने की, मुफ्त बिजली की और सरकारों की लुभावन वाली अनैतिक नीतियों के कारण अपने खातों में सीधी राशि डलवाने की आदत पड़ गई है। चाहे इन राज्यों में कर्मचारियों को वेतन से वंचित होना पड़ रहा हो। क्योंकि उपरोक्त योजनाओं का भार इतना बढ़ चुका है कि संबंधित राज्य सरकारों के लिए सहन करना मुश्किल हो रहा है। आज ज्यादातर प्रदेश कज़र् में डूबे हुए हैं परन्तु इसके बावजूद वह और कज़र् लेने के लिए कोई न कोई ढंग-तरीका ढूंढ लेते हैं। सर्वोच्च न्यायालय की यह कड़ी टिप्पणी तमिलनाडु में उठी समस्या के संबंध में आई है, यदि पीछे की तरफ देखा जाए तो तमिलनाडु ही ऐसा राज्य था, जिसने वर्षों पहले मुफ्त की योजनाओं की इस तरह की परम्पराएं शुरू की थीं। अन्ना डी.एम.के. की नेता जयललिता मुफ्त के तोहफे बांटने की परम्परा शुरू करके सत्ता में काबिज़ हुई थी। उस समय उन्होंने लोगों को हैदराबादी मोतियों के सैट, टी.वी. सैट, डिनरसैट और मोबाइल आदि बड़ी संख्या में बांटने का सिलसिला शुरू किया था। जिसे अब देश की लगभग सभी पार्टियों ने अपना लिया है। सरकारें अपनी प्रशंसा करवाने के लिए साइकिल से लेकर फ्रिज़ तक देने के लिए तैयार रहती हैं। केन्द्र की मोदी सरकार ने भी इस समय ‘मुफ्त की रेवड़ियां’ बांटने पर तंज कसा था और लगातार आपत्ति भी जताई थी परन्तु तथ्य गवाह हैं कि इन आपत्तियों के बाद हुए ज्यादातर सभी प्रादेशिक चुनावों में भाजपा भी मुफ्त के तोहफे बांटने में अन्य पार्टियों के साथ आ खड़ी हुई है। विगत समय में बिहार के हुए चुनावों के अवसर पर महिलाओं के खातों में बड़ी राशि डाली गई थी, जिनका प्रभाव उनके पक्ष में पड़ा दिखाई देता था। विगत लम्बी अवधि से पंजाब भी इसी मकड़जाल में फंसा दिखाई देता है।
बादल सरकार के समय किसानों को मुफ्त बिजली-पानी देने की घोषणा और उस पर क्रियान्वयन करने के परिणाम सभी के समक्ष आ गए थे। उस सरकार द्वारा अलग-अलग क्षेत्रों में मुफ्त की दिखाई दरियादिली ने पंजाब की आर्थिकता को डुबोने में कोई कमी नहीं छोड़ी थी। उसके बाद अब तक की तत्कालीन सरकारों ने भी बसों में महिलाओं को मुफ्त स़फर के साथ-साथ प्रत्येक क्षेत्र में अपनी दरियादिली दिखाई है, जिससे आज प्रदेश बुरी तरह आर्थिक अवसान में फंसा दिखाई देता है। हम सर्वोच्च न्यायालय की इस टिप्पणी से पूरी तरह सहमत हैं, कि देश भर में सभी सरकारों को इस मोर्चे पर गम्भीरता से सोचने की ज़रूरत होगी ताकि पंजाब सहित अनेक अन्य प्रदेशों को बाहर निकाला जा सके जो इस गहरी दलदल में फंस चुके हैं।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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