विदेशी हथियारों पर भारत की निर्भरता चिन्ता की बात
भारतीय रक्षा मंत्रालय की फ्रांस से 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने की नई मंज़ूरी से ज़्यादा उत्साहित होने की कोई बात नहीं है। इसकी कीमत 3.25 लाख करोड़ रुपये है, जिसे ‘सभी डिफैंस डील्स की सबसे बड़ी डील’ कहा जा रहा है। यह बड़ी चिंता की बात है कि आज़ादी के 78 साल बाद भी भारत को अपनी रक्षा के लिए आयातित हथियारों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। फ्रांस से राफेल, अमरीका से पोसाइडन जेट, और रूस से एस-400, ट्रायम्फ जैसे कई दूसरे हथियार। यहां तक कि उन क्षेत्रों जहां भारत विदेशी सहयोग से रक्षा उपकरण बना रहा है, में भी देश अभी भी विदेशी सबसिस्टम पर बहुत ज़्यादा निर्भर है।
हालांकि एयरक्राफ्ट और जहाज़ जैसे प्लेटफॉर्म भारत में असेंबल किए जा सकते हैं, लेकिन ज़रूरी हाई-एंड कंपोनेंट अभी भी आयात किए जा रहे हैं, जिससे आपूर्ति शृंखला कमज़ोर हो जाती है। पिछले कुछ सालों में भारत ने कई राफेल सौदे किए हैं। इनमें लगभग 7.87 अरब यूरो (लगभग 58,891 करोड़ रुपये) के 36जेट शामिल हैं। फिर भारतीय नौसेना के लिए 26 नेवल वेरिएंट के सौदे हुए हैं, जिसकी कीमत 64,000 करोड़ रुपये है। भारत में बने जेट के साथ क्वालिटी एश्योरेंस के मुद्दों पर कई सालों तक बातचीत चलने के बाद भारत ने 2015 में फ्रांस से 126 राफेल विमान खरीदने के समझौते को रद्द कर दिया था।
भारत के आयात पसंद करने वाले राजनीतिक शासकों की वजह से देश को आधुनिक सैन्य तकनीक, खासकर जेट इंजन, एक्टिव इलेक्ट्रॉनिक लीस्कैन्ड ऐरे (एईएसए) रडार, मिसाइल सीकर और स्टील्थ टेक्नोलॉजी विकसित करने में बड़ी कमियों का सामना करना पड़ रहा है। भारत का रक्षा अनुसंधान और विकास खर्च दूसरे देशों के मुकाबले बहुत कम है। डीआरडीओ को 2025-26 में कुल रक्षा बजट का सिर्फ 3.94 प्रतिशत मिलेगा। लम्बे खरीद चक्र और आरएंडडी परियोजनाओं में बहुत ज़्यादा देरी से आधुनिकीकरण में रुकावट आ रही है। एलसीए तेजस प्रोग्राम को अनुमोदन से प्रोटोटाइप बनने में दो दशक से ज़्यादा लग गए। यह कार्यक्रम 1984 में ही शुरू किया गया था ताकि मिग-21 फ्लीट को बदलने के लिए देसी, हल्के, मल्टीरोल फाइटर जेट बनाए जा सकें। भारत के पास यूएवी, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और इलेक्ट्रो-ऑप्टिक्स जैसी अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी के लिए विश्व स्तरीय परीक्षण अवसंरचना भी नहीं है, जिससे देशी उत्पादनों के विकास और प्रमाणीकरण में कमी आ रही है।
भारत के लगभग 80 प्रतिशत रक्षा उपकरण रूस के होने के कारण रूस देश की रक्षा क्षमताओं का एक अहम हिस्सा बना हुआ है। रूस तब सामने आया जब पश्चिमी सैन्य ताकतों ने भारत को हाई-एंड हथियार आपूर्ति करने से लगभग मना कर दिया था। भारत-रूस रक्षा भागीदारी सिर्फ खरीदार-विक्रेता संबंध से बढ़ कर संयक्त विकास और उत्पादन तक फैली हुई है। भारत में मौजूद बड़े खतरनाक रूसी प्लेटफॉर्म में सुखोई एसयू-30 एमकेआई (जो रूस की मदद से भारत में बना), टी.905 ‘भीष्म’ और टी-22मुख्य लड़ाकू टैंक, ब्रह्मोसक्रुज़ मिसाइल, रूस में बनी सबमरीन जिसमें लीज़ पर लिए गए न्यूक्लियर-पावर्ड जहाज़ (अकुला-2) और आईएनएस विक्रमादित्य जैसे एयरक्राफ्ट कैरियर और बहुत ज़्यादा इस्तेमाल होने वाले एमआई-17परिवहन हेलीकॉप्टर शामिल हैं। लंबे समय तक भारत ने अपने निजी क्षेत्र को रक्षा उत्पादन में आने नहीं दिया। हालांकि वह हथियारों और गोला-बारूद के आयात के लिए विदेशी निजी कंपनियों के साथ सौदा करने में हमेशा खुश रहा है।
शुरू में चीन भी रूसी रक्षा आपूर्ति पर निर्भर था, लेकिन कम्युनिस्ट शासन ने रक्षा उत्पादन में आत्म-निर्भरता को बहुत प्राथमिकता दी और सालों से रक्षा उत्पादनों की हाई-एंड मैन्युफैक्चरिंग के लिए दुनिया भर में एक बड़ा दावेदार बन गया। चीन का एक लो-टेक हथियार आयातक से एक हाई-एंड देशी रक्षा उत्पादक और निर्यातक बनना एक लंबे समय की सरकार की बनाई रणनीति से हुआ है, जिसमें अनुसंधान और विकास में भारी निवेश, इंटेंस मिलिट्री-सिविल फ्यूजन (एमसीएफ) और विदेशी प्रौद्योगिकी का लक्षित प्रदर्शन शामिल है। पिछले दस सालों में चीन दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा हथियार निर्यातक बनकर उभरा है। हालांकि भारत अभी भी चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों से अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए बहुत ज़्यादा विदेशी आयात पर निर्भर है। स्वदेशीकरण के तथाकथित दबाव के बावजूद भारत चीन और पाकिस्तान से दोहरे खतरों का मुकाबला करने के लिए ज़रूरी प्रौद्योगिकी, जेट और इलेक्ट्रॉनिक्स के लिए भी काफी हद तक विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर है। अब समय आ गया है कि भारत अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए हाई-एंड घरेलू रक्षा विनिर्माण में बड़ा निवेश करे। (संवाद)



