क्या दीनदयाल उपाध्याय के आदर्शों पर चल रही है भाजपा ?
दीनदयाल उपाध्याय भाजपा के उन नेताओं में से हैं जिन्होंने भाजपा के पूर्व अवतार जनसंघ की स्थापना की थी। बाद में जनसंघ ने भारतीय जनता पार्टी बनाई परंतु भाजपा ने दीनदयाल उपाध्याय को ही अपना सर्वश्रेष्ठ प्रेरणा का स्रोत माना और जब तक वे जीवित रहे तब तक जनसंघ उनके द्वारा बताए गए आदर्शों पर चलती रही, परंतु कुछ समय के बाद भाजपा ने दीनदयाल जी के बताए हुए सिद्धांतों पर अमल करना काफी हद तक छोड़ दिया और अनेक अवसरवादी तरीकों को अपनाकर सत्ता पर कब्जा किया।
इस तरह के मामलों में सबसे बड़ा उदाहरण मध्य प्रदेश का है। कुछ ऐसा चक्रव्यूह चला कि 2018 के चुनाव में कांग्रेस विजय पाने के बावजूद सत्ता में नहीं रह पाई और इस काम में सिंधिया परिवार के ही ज्योतिरादित्य सिंधिया ने प्रमुख भूमिका निभाई। इस तरह ज्योतिरादित्य सिंधिया के सहयोग से मध्य प्रदेश में भाजपा ने सत्ता पर कब्ज़ा कर लिए। सच पूछा जाए तो भारतीय जनता पार्टी दीनदयाल उपाध्याय के आदर्शों पर चलने का दावा खो चुकी है। भाजपा कांग्रेस पर आरोप लगाती है कि वह महात्मा गांधी द्वारा बताए गए मार्ग को त्याग चुकी है। क्या इसी तरह का आरोप भाजपा पर नहीं लगाया जा सकता?
यह मान्यता थी कि दलबदल एक ऐसा संक्रामक रोग है जो हमारी संसदीय व्यवस्था को खोखला कर रहा है। इस रोग की गंभीरता को अन्य लोगों के अलावा दीनदयाल उपाध्याय ने भी समझा था। उन्होंने 27 फरवरी, 1961 को लिखे एक लेख में कहा था कि प्रजातंत्र में एक से अधिक पार्टी होना स्वाभाविक है। इन पार्टियों को एक प्रकार के पंचशील को अपनाना चाहिए, तभी स्वस्थ परंपराएं कायम हो सकेंगी। यदि वैचारिक और सैद्धांतिक आधार पर दल-बदल होता है तो वह कुछ हद तक न्यायोचित माना जा सकता है। अन्य किसी भी आधार पर या कारण से होता है तो उसे उचित नहीं माना जा सकता। यदि ऐसी स्थिति हो कि किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिले या बहुत कम अंतर से बहुमत मिले और राजनैतिक दल सत्ता हथियाने के लिए अनैतिक तरीके अपनाकर बहुमत हासिल करने का प्रयास करें तो यह बहुत गलत होगा। ऐसी स्थितियां उत्पन्न न हों, इसलिए स्वस्थ परंपरा कायम करनी चाहिए। ऐसा होने पर स्थायी सरकारें अस्तित्व में रह पाएंगी और राजनीतिक पार्टियां स्वार्थी राजनीतिज्ञों के चंगुल में नहीं फसेंगीं। यह दु:ख की बात है कि भाजपा, जो दीनदयाल उपाध्याय को अपना सबसे प्रमुख प्रेरणास्त्रोत मानती है, अल्पमत में होने के बावजूद बहुमत हासिल करने का प्रयास करती है। आज हमारे प्रदेश में जो हुआ है वह दीनदयाल उपाध्याय के दिखाए मार्ग के एकदम विपरीत है।
दीनदयाल उपाध्याय द्वारा निर्मित आचार संहिता के विरूद्ध सत्ता प्राप्त करने का प्रथम प्रयास सन् 1967 में हुआ था। उस समय भी दल-बदल कराने में सिंधिया परिवार और जनसंघ की प्रमुख भूमिका थी। सन् 1967 के चुनाव के पूर्व राजमाता विजयाराजे सिंधिया कांग्रेस में थीं। टिकट वितरण एवं कुछ अन्य मुद्दों पर उनके तत्कालीन मुख्यमंत्री पंडित डी.पी. मिश्रा से गंभीर मतभेद हो गए थे।
राजमाता चाहती थीं कि पूर्व ग्वालियर राज्य के क्षेत्र के उम्मीदवारों का चयन उनकी मज़र्ी से हो। जब उन्होंने यह शर्त मिश्रजी के सामने रखी तो उन्होंने कहा कि आप जिस राज्य की बात कर रही हैं, वह सन् 1947 में समाप्त हो गया। यह सुन कर राजमाता आक्रोशित हुईं। उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी और अपनी एक पार्टी बनाकर अनेक सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए और जबरदस्त जीत हासिल की। किंतु राजमाता की चुनौती के बावजूद कांग्रेस सत्ता में आ गई और डी. पी. मिश्र दोबारा मुख्यमंत्री बने। सत्ता खोने के बावजूद राजमाता मिश्रजी का तख्ता पलटने का प्रयास जनसंघ के सहयोग से करती रहीं और अंतत: 36 कांग्रेस विधायकों द्वारा पार्टी से त्याग-पत्र दिलावकर मिश्रजी का तख्ता पलटने में सफलता हासिल की।
इस दौरान राजमाता ने अपना स्वतंत्र अस्तित्व कायम रखा और संयुक्त विधायक दल का गठन किया। इस दल में जनसंघ भी शामिल हुई और चुनी हुई सरकार को अपदस्थ करने में भागीदारी की। जनसंघ का यह फैसला दीनदयाल उपाध्याय के दिशा निर्देशों के विपरीत था। कांग्रेस की सरकार को अपदस्थ करने के बावजूद राजमाता ने कोई पद स्वीकार नहीं किया और गोविंद नारायण सिंह को मुख्यमंत्री बनवाया।ज्योतिरादित्य ने स्पष्टत: पद न मिलने के कारण कांग्रेस छोड़ी और पद पाने के लिए ही भाजपा में शामिल हुए। भाजपा में शामिल होते ही उन्होंने घोषणा की कि वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश व समाज की सेवा करेंगे। न सिर्फ ज्योतिरादित्य परंतु अन्य कांग्रेस विधायकों को सत्ता का लालच देकर और दलबदल करवाकर एक बार फिर भाजपा ने दीनदयाल उपाध्याय के निर्देशों का उल्लंघन किया। भाजपा की कई अन्य राज्यों की चुनी हुई सरकारों को गिराकर सत्ता पर कब्ज़ा करेन की घटनाएं स्पष्ट करती हैं कि पार्टी का दीनदयाल उपाध्याय के सिद्धांतों से नहीं बल्कि अवसरवादिता से रिश्ता है। (एजेंसी)



