हिमाचल की स्पीति घाटी की वादियों में स्थित ‘की मठ’

मेरी आज तक यह बात समझ में नहीं आयी है कि अधिक पर्यटक स्पीति वादी में स्थित अति सुंदर ‘की मठ’ को देखने क्यों नहीं जाते हैं? यह जीता जागता सबूत है कि स्वर्ग पृथ्वी पर उतर आया है। इसलिए यह रहस्य ही है कि दुनियाभर के लोग अक्सर इसे अनदेखा क्यों कर देते हैं। शायद खामोशी ही इसका सबसे बड़ा उपहार है। इस निष्कर्ष से बहस नहीं की जा सकती। स्पीति में नज़ाकत है, लेकिन साथ ही शक्तिशाली आकर्षण भी है, जो आहिस्ता-आहिस्ता यात्रियों को अपनी ओर खींच रहा है ताकि इसके सुंदर, नाटकीय लैंडस्केप को खोज सकें, जो भारत की विविधता को प्रतिविम्बित करती है।
लगभग 13,500 फीट की ऊंचाई पर ‘की मठ’ स्पीति घाटी में सबसे पुराना व सबसे बड़ा मठ है। पहाड़ के ऊपर यह कई मंज़िला मठ है, जिसकी तुलना अक्सर लेह के निकट आइकोनिक थिकसे मठ से की जाती है। इस मठ का गहरा संबंध लोचेन रिनचेन जंगपो के पूजनीय अवतारों से है, जिन्हें ‘महान अनुवादक’ भी कहा जाता है, जो 958 व 1055 एडी के बीच रहते थे। इसकी गहरी जड़ें प्राचीन कदम्पा विरासत में हैं और इसे लोचेन तुलकुस विरासत की पीठ माना जाता है। इस विरासत के माध्यम से की मठ 11वीं शताब्दी के विख्यात बौद्ध विद्वान् व संत अतिशा दिपांकर से जुड़ जाता है। 
साल 2000 में 14वें दलाईलामा ने इस मठ में एक नया तथा अधिक बड़े असेंबली हाल का उद्घाटन किया। इस हाल की दीवारों पर कुछ बहुत ही सुंदर प्राचीन पेंटिंग्स लटकी हुई हैं, जो बुद्ध के पिछले जन्मों की कहानियों को व्यक्त करती हैं। मुख्य असेंबली हाल के सामने पूजा करने का कमरा है, जिसमें एक विशाल पूजा व्हील है और पद्मसंभव व अमितायुस की प्रभावी मूर्तियां हैं। की गोम्पा ऐतिहासिक दृष्टि से स्पीति में सबसे महत्वपूर्ण मठों में से एक है और तिब्बती बौद्ध धर्म में इसका विशेष स्थान है। इसकी स्थापना 15वीं शताब्दी के शुरू में शेरपा जंगपो ने की, जो गेलुग्पा समुदाय के संस्थापक जे त्सोंगखापा के शिष्य थे। इस अवधि के दौरान इस मठ पर अनेक आक्रमण हुए व प्राकृतिक आपदाएं आयीं। पांचवें दलाईलामा के युग में यानी 17वीं शताब्दी में इस पर मंगोलों ने हमला किया, जिसके बाद यह औपचारिक रूप से गेलुग्पा स्कूल का हिस्सा बन गया। फिर 1820 के लद्दाख-कुल्लू टकराव के दौरान भी इसे नुकसान पहुंचा और 1841 में डोगरा सेना ने इसे भारी नुकसान पहुंचाया। फिर उसी साल सिख सेना ने भी उस पर हमला किया। 1840 के दशक में इसमें भयंकर आग भी लगी थी और फिर 1975 में भूकम्प की वजह से इसे अतिरिक्त नुकसान पहुंचा। तब आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑ़फ इंडिया और स्टेट पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट ने इसकी मुरम्मत करायी। 
इस अतीत के बावजूद की मठ अपनी वाल हैंगिंग्स के लिए विख्यात है और ऐतिहासिक कलाकृतियों के लिए भी, जिन्हें केंद्रीय तिब्बत से एक के बाद एक लोचेन अवतार लेकर आये। मठ के टॉप फ्लोर पर जो अपार्टमेंट है, वह दलाईलामा के लिए आरक्षित है। इस पर एक चैम्बर भी है जिसमें 18वें लोचेन तुलकू के अवशेष हैं। निचले माले पर मठ की रक्षा करने वाले देवताओं को समर्पित एक मंदिर है, जबकि उसके नीचे जो एक अन्य असेंबली हाल है, उसे छोटी रस्मों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इस मठ में 17वें लोचेन तुलकू के अवशेषों के अतिरिक्त कीमती धर्मग्रंथ, पुरानी वाल पेंटिंग्स और भविष्य के बुद्ध मैत्रेय की मूर्ति भी है। रक्षा मंदिर तक एक पतले से गलियारे में सीढ़ी से होकर जाना पड़ता है, जिसे आमतौर से जाड़ों के महीनों में इस्तेमाल किया जाता है।
अपने ऐतिहासिक व धार्मिक महत्व के अतिरिक्त ‘की गोम्पा’ अपने सुंदर आर्किटेक्चर व शांत वातावरण के लिए भी विख्यात है। ‘की मठ’ के दर्शन करने के लिए आदर्श समय मई व अक्तूबर के बीच का है, जब जाड़े सुहावने हो जाते हैं, सड़कें खुली होती हैं और स्पीति वादी की सुंदरता अपने शबाब पर होती है। तब तापमान आमतौर से 10 सेंटीग्रेड से 25 सेंटीग्रेड के बीच में होता है। जाड़े यहां बहुत कठिन होते हैं कि तापमान माइनस 20 सेंटीग्रेड तक गिर जाता है, भारी बर्फबारी के कारण सड़कें बंद हो जाती है। हालांकि मठ तो खुला रहता है, लेकिन उस तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है, जो पर्यटक सांस्कृतिक अनुभव करने के इच्छुक हैं वह अपनी यात्रा की योजना जुलाई में बनाएं, जबकि चाम उत्सव का आयोजन किया जाता है। इस उत्सव में परम्परागत मास्क नृत्य होता है, जिसे भिक्षु करते हैं, बुराई पर अच्छाई की विजय के प्रतीक के रूप में।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर

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