समाज को व्यसनी बनाता सोशल मीडिया
सोशल मीडिया एक ओर देश में जितना अधिक लोकप्रिय हुआ है, उतना ही समाज के भिन्न-भिन्न वर्गों विशेषकर बच्चों और युवाओं के लिए हानिकर भी सिद्ध होने लगा है। देश और समाज का एक बड़ा वर्ग आज सोशल मीडिया का आदी अर्थात अभ्यस्त होने लगा है। बच्चे और युवा तो निरन्तरता से इससे जुड़े ही हैं, आज बालिग और प्रौढ़ वय के लोग भी सोशल मीडिया के व्यसनी होते जा रहे हैं। यहां तक कि महिलाएं भी इस आदत का शिकार होती जा रही हैं। स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि बच्चे, बूढ़े एवं युवा स्त्री-पुरुष पूरा-पूरा दिन सोशल मीडिया की जकड़न में फंसे दिखाई देते हैं। सोशल मीडिया के इंस्टाग्राम, टिकटॉक और स्नैप चाट ने माहौल को दूषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। सामाजिक स्वास्थ्य संबंधी विशेषज्ञों के अनुसार इस व्यसन ने समाज के अधिकतर वर्गों के लोगों के स्वास्थ्य, मानसिकता और साधारण दिनचर्या को विपरीत रूप से प्रभावित किया है। इस कारण शारीरिक रोग भी बढ़े हैं। विशेषज्ञों ने सोशल मीडिया की लत को जुए और नशे के बराबर करार दिया है। स्थितियों की गम्भीरता का अनुमान इस एक तथ्य से भी लगाया जा सकता है कि सोशल मीडिया के दिन भर उपयोग से रोकने पर बच्चे जहां चिड़चिड़ा होने लगे हैं, वहीं पारिवारिक व्यसकों में आपसी विवाद भी बढ़े हैं। सोशल मीडिया समाज में विखंडन का कारण बना है, जिससे सामाजिक और पारिवारिक अपराध भी बढ़े हैं। सोशल मीडिया को देख-देख कर बच्चे और युवा अपराध के नये-नये तरीके सीख कर उन्हें घर-परिवार और आस-पास के माहौल में आज़माने लगे हैं। गाज़ियाबाद में तीन सगी बहनों द्वारा सोशल मीडिया पर लगी गेमिंग की लत के कारण बिल्ंिडग की नौवीं मंज़िल से कूद कर आत्महत्या कर लेने की घटना को इसी संदर्भ में देखें, तो मुद्दे की गम्भीरता विकराल होकर सामने आती है।
वाशिंगटन के बेलर कालेज ऑफ मैडीसन की प्रोफैसर डा. लारेल विलियम्स के अनुसार कोई व्यक्ति अपने सामान्य कामकाज को निपटाने से अधिक समय सोशल मीडिया पर व्यतीत करता है, तो समझ लेना चाहिए कि वह इस आदत का व्यसनी होने लगा है। ऐसे लोगों की एक स्पष्ट पहचान उनका आत्म-केन्द्रित और अन्त-र्मुखी होते जाना और उनके स्वभाव में परिवर्तन आना होती है। इसके अनुसार सोशल मीडिया में कई-कई घंटे व्यतीत करने वाले विद्यार्थी पढ़ाई से दूर होते जाते हैं। इसी प्रकार संयुक्त परिवारों में जहां मतभेद बढ़ते हैं, वहीं पति-पत्नी और बच्चों के बीच मतैक्य की कमी पैदा होने लगती है। ऐसे लोग फिर अपनी पारिवारिक और शैक्षणिक ज़िम्मेदारियों से जी चुराने लगते हैं जिसका परिणाम अन्तत: बहुत बुरा प्रतीत होने लगता है। ऐसा माहौल परिवारों में टूटन का कारण बनता है, और अन्तत: लोग शारीरिक और मानसिक रूप से अस्वस्थ दिखाई देने लगते हैं। अमरीका की मैल्बोर्न यूनिवर्सिटी के प्रोफैसर ओफिर ट्यूरल ने भी इसे एक गम्भीर समस्या माना है हालांकि वह इसे एक व्यसन मानने को तैयार नहीं। तथापि उन्होंने दिन भर का अधिकतर समय सोशल मीडिया पर बिताये जाने को गम्भीर प्रवृत्ति करार दिया है।
विशेषज्ञों की राय है कि इस समस्या को यदि समय रहते पकड़ लिया जाए, तो मनुष्य को तर्क, मनो-विज्ञान और सहानुभूति के साथ वर्जित किया जा सकता है, किन्तु यदि स्थिति गम्भीर हो गई हो, तो मनोवैज्ञानिक डाक्टर से परामर्श लिया जाना चाहिए। ऐसे व्यक्ति की पहचान उसकी आंखों के उनींदेपन और उसकी वाचालता कम होने से की जा सकती है। ऐसी व्यसनी व्यक्ति को यह समझाना ज़रूरी होता है कि सोशल मीडिया पर प्रदर्शित अधिकतर विवरण कम्पनियों का विज्ञापन और प्रचार पक्ष होता है। यह भी कि उनका व्यवसायिक पक्ष इस तथ्य में निहित रहता है कि जन-साधारण अधिकाधिक उनके उद्धरणों को देखें। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की मनोवैज्ञानिक प्रोफैसर डा. अन्ना लैंबको के अनुसार सोशल मीडिया के अधिकतर कार्यक्रमों को इस ढंग से तैयार किया गया होता है कि उन्हें देखने वाले चाहें तो दिन-रात इनमें व्यस्त रहें किन्तु लोगों को स्वयं इन तथ्यों को ध्यान में रखना होगा, कि वे अपना मनोरंजन तो करें, कार्यक्रमों से ज्ञान और विज्ञान भी अर्जित करें, किन्तु अपने अन्य पारिवारिक और सामाजिक दायित्वों को दृष्टिविगत न करें। इस संदर्भ में सरकारों और कम्पनियों की ज़िम्मेदारी भी बड़ी अहम हो गुज़रती है। कम्पनियों की व्यवसायिकता उनके अपने लिए एक बड़ा मुद्दा हो सकता है, किन्तु समाज और भावी पीढ़ियों के प्रति उनका दायित्व-बोध अधिक बड़ा होना चाहिए। हम समझते हैं कि सभी वर्गों और पक्षों के सामूहिक प्रयासों से समाज को इस दलदल में धंसने से रोका जा सकता है।



