आंतरिक एकजुटता की कमी का सामना कर रही है पंजाब कांग्रेस
काबिल-ए-रहम हैं वो इंसां जो,
़खाहिश-ए-त़ख्त-ओ-ताज करते हैं।
शायर साहिल कादरी चाहे लाख कहे जाएं कि त़ख्त और ताज की इच्छा रखने वाले आदमी तो रहम के काबिल होते हैं, परन्तु आदमी की फितरत यह है कि ताज चाहे कांटों का ही क्यों न हो, और त़ख्त चाहे कीलों भरा ही हो, वह उसकी इच्छा करता है। कुछ रब्ब के लोग चाहे इस इच्छा पर काबू रख सकते हों। इस समय पंजाब कांग्रेस की अध्यक्षता का ताज तथा त़ख्त भी कांटों तथा कीलों से भरा है, परन्तु इसकी इच्छा रखने वालों की कतार बहुत लम्बी है। इनती लम्बी कि मैं यहां चाहे लगभग एक दर्जन चाहवानों के नाम लिख रहा हूं, परन्तु मुझे पता है कि इसके बाद भी कई कांग्रेसी मित्र नाराज़ होंगे कि मेरे नाम का ज़िक्र क्यों नहीं किया, मैं कौन-सा किसी से कम हूं?
वास्तव में कांग्रेस हाईकमान इस समय पंजाब को लेकर बड़ी मुश्किल में है क्योंकि फरवरी, 2027 में होने वाले पांच विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को सबसे अधिक आशा पंजाब से ही है और पंजाब में कांग्रेस की भीतरी फूट बहुत गहरी है। पंजाब में कांग्रेस पर जाट लाबी पूरी तरह हावी है। उनमें से कोई दो नेता इकट्ठे नहीं हैं। पंजाब में जट्ट आबादी 18 से 25 प्रतिशत मानी जाती है, जबकि एस.सी. भाईचारा 32 प्रतिशत तथा ओबीसी भाईचारे की आबादी लगभग 30 प्रतिशत मानी जाती है। शेष सवर्ण जातियां जिनमें क्षत्रीय, अरोड़ा, ब्राह्मण, बनिया तथा अन्य शामिल हैं, लगभग 15 से 20 प्रतिशत हैं, परन्तु जाति विभाजन के अलावा पंजाब में एक धार्मिक विभाजन भी है, जिसे भाजपा ने तीखा किया है। वह है, सिख व हिन्दू। पंजाब में सिख 58 प्रतिशत तथा हिन्दू 38.5 प्रतिशत हैं। मुस्लिम तथा ईसाई दो-दो प्रतिशत से कम हैं। हिन्दुओं में सवर्ण हिन्दू भी 12 से 14 प्रतिशत ही हैं। माना जाता है कि इस बार भाजपा हरियाणा में आज़मायी गई तथा सफल रही रणनीति ही पंजाब में अपनाएगी। चाहे उसने कांग्रेस तथा अकाली दल में से बहुत-से जट्ट नेता भाजपा में शामिल किए हैं, परन्तु समझा जाता है कि वे इस बार किसी जाट नेता को आगे नहीं करेगी, अपितु हिन्दू, दलित, ओबीसी गठबंधन को उभारने का यत्न करेगी। इसमें किसी ओबीसी सिख का दांव लगने के आसार अधिक होंगे। जैसे उसने हरियाणा में जाट समुदाय को पीछे छोड़ कर किया था। हमारी जानकारी के अनुसार इस पूरी स्थिति से कांग्रेस हाईकमान अनजान नहीं, परन्तु कांग्रेस की परेशानी यह है कि इस समय कांग्रेस के पास पूरे पंजाब में प्रभाव रखने वाला एक भी नेता नहीं जो ‘नायक’ बना कर पेश किया जा सके। जैसे एक बार कैप्टन अमरिन्द्र सिंह को पेश किया गया था। कांग्रेसी नेताओं का हाल ़गज़ल के उस्ताद शायर डा. साधु सिंह हमदर्द के इस मिसरे जैसा है :
‘निक्के कद्दां वाले वड्डे जाये हां’
इसलिए कांग्रेस के पास एक ही रास्ता है कि वह जट्ट सिख, बी.सी., एस.सी. तथा हिन्दू समुदाय का संतुलन बना कर चले, परन्तु विधानसभा में उसके पास कोई ऐसा गैर-जट्ट नेता नहीं जो तेज़-तर्रार मुख्यमंत्री भगवंत मान को हाज़िर जवाबी से जवाब से सकता हो। चाहे प्रताप सिंह बाजवा ने स्वयं कभी ऐसा नहीं कहा, परन्तु यही चर्चा है कि अब वह पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष बनना चाहते हैं, परन्तु यदि कांग्रेस ने उन्हें ही विपक्ष का नेता बनाए रखा तो पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष किसी हिन्दू, ओ.बी.सी. या दलित को बनाया जा सकता है। कांग्रेस हाईकमान की एक बड़ी परेशानी यह भी है कि कांग्रेस के अधिकतर नेताओं के सरकार से डरा हुआ होने की चर्चा सुनाई देती है जबकि कांगे्रस चाहती है कि कांगे्रस अध्यक्ष तथा विपक्ष का नेता ऐसा हो जा विजीलैंस या ई.डी. की परवाह न करता हो। ़खैर, कौन डरता है और कौन नहीं, इसका हमें कुछ पता नहीं, परन्तु जिन नामों की कांग्रेस अध्यक्षता के इच्छुकों के रूप में चर्चा है, उनमें हिन्दुओं में विजय इन्द्र सिंगला, राणा के.पी. सिंह के नाम हैं। जट्ट भाईचारे में बाजवा के अतिरिक्त सुखजिन्दर सिंह रंधावा, राणा गुरजीत सिंह, गुरजीत सिंह औजला, सुखपाल सिंह खैहरा, प्रगट सिंह आदि नाम लिए जा रहे हैं। दलितों में सबसे अधिक चर्चा पूर्व मुख्यमंत्री चरणचीत सिंह चन्नी के नाम की है, परन्तु डा. अमर सिंह तथा सुखविन्दर सिंह डैनी बंडाला का नाम रविदासिया मज़हबी सिख विभाजन के चलते लिया जा रहा है जबकि ओ.बी.सी. में से संगत सिंह गिलजियां, अंगद सैनी तथा हरदयाल सिंह कम्बोज के अतिरिक्त 2-3 अन्य नाम चर्चा में हैं। उल्लेखनीय है कि हाईकमान की ताड़ना के बाद इनमें से कोई अपने-आप को सार्वजनिक तौर पर अध्यक्ष के चुनाव का उम्मीदवार नहीं बताता।
इस प्रकार यदि पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष किसी गैर-जट्ट को बनाया गया तो विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा के ही बने रहने के आसार हैं, परन्तु यदि नेता प्रतिपक्ष बदलने की बात चली तो सुखपाल सिंह खैहरा, अरुणा चौधरी, राणा गुरजीत सिंह, प्रगट सिंह आदि के नाम चर्चा में हैं। वैसे मार्च के महीने में कांग्रेस नेतृत्व में किसी बदलाव के आसार नहीं प्रतीत हो रहे। कांग्रेस हाईकमान आम तौर पर इतना धीरे-धीरे बदलाव करता है कि तब तक गाड़ी स्टेशन से निकल जाती है। वैसे कांग्रेस जात-बिरादरी को प्रतिनिधित्व देने के लिए प्रचार समिति, चुनाव समिति के चेयरमैन तथा दो कार्यकारी अध्यक्ष भी ला सकती है। वैसे अध्यक्ष तो किसी एक ने ही बनना है। जो बन गया ठीक है। बाकी तो कतील सिफाई के इस शे’अर की तरह किस्मत को ही दोष देेंग :
किस को ़खबर थी सांवले बादल बिन बरसे उड़ जाते हैं,
सावन आया लेकिन अपनी किस्मत में बरसात नहीं।
किस पार्टी का कौन होगा 2027 में चेहरा
वही ़गुम हो गया रास्ते में शायद,
जो रहबर था जो मीर-ए-कारवां था।
(मीर-ए-कारवां = काफले का प्रमुख)
अब्दुल मन्नान समदी का यह शे’अर पार्टियों द्वारा बनाए गए अधिकतर चेहरों पर चरितार्थ होता है, क्योंकि आजकल बहुत बार स्वयं नेता ही नहीं जीतते। ़खैर, कांग्रेस के बारे में काफी विस्तार में चर्चा हो चुकी है और बड़ी सम्भावना यही है कि कांग्रेस पंजाब विधानसभा में मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित किए बिना ही चुनाव लड़ेगी। जहां तक सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी का संबंध है, स्पष्ट है कि उनका मुख्यमंत्री का चेहरा भगवंत सिंह मान ही होंगे तथा पार्टी के चुनाव अभियान का नेतृत्व पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल स्वयं करेंगे। यह भी स्पष्ट है कि अकाली दल बादल का किसी से समझौतै हो या न हो, परन्तु उनका मुख्यमंत्री चेहरा सुखबीर सिंह बादल ही होंगे। जहां तक भाजपा का सवाल है, यदि भाजपा अकेले लड़ी या समझौता करके लड़ी तो वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर ही चुनाव लड़ेगी और डबल इंजन सरकार का नारा दिया जाएगा। वैसे यदि चुनाव के बाद जट्ट नेताओं का दांव लगा, जिसकी आशा बहुत कम है, तो पार्टी में रवनीत सिंह बिट्टू, सुनील जाखड़ तथा कैप्टन अमरिन्दर सिंह के नाम लिए जा सकते हैं। वैसे अधिक सम्भावना इस बात की है कि भाजपा पार्टी में शामिल किए बहुत-से जट्ट चेहरों को महत्व न देकर पंजाब में हिन्दू-दलित-पिछड़े वर्गों का गठबंधन बनाने को प्राथमिकता देगी, जैसे भाजपा ने हरियाणा में सफलता से किया है। यही कारण प्रतीत होता है कि भाजपा ने पंजाब की कमान अभी तक एक ओ.बी.सी. नेता तथा हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी को सौंपी हुई है। यह चर्चा भी बड़े ज़ोर से सुनाई दे रही है कि भाजपा दिल्ली में उच्च पद पर तैनात एक गैर-जट्ट सिख नेता या उसके बेटे को चुनाव के बाद छुपे रुस्तम की भांति आगे लाएगी, परन्तु यह सिर्फ चर्चा है। दूसरी ओर अकाली दल पुनर्सुरजीत इन चुनावों में चाहे भाजपा के साथ चाहे किसी अन्य पार्टी से समझौता करे या न करे, परन्तु चुनाव का नेतृत्व ज्ञानी हरप्रीत सिंह ही करेंगे, परन्तु वह स्वयं विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ेंगे, अपितु सिर्फ अपने उम्मीदवारों के लिए चुनाव प्रचार करने को ही प्राथमिकता देंगे, जबकि अकाली दल (वारिस पंजाब दे) के अध्यक्ष भाई अमृतपाल सिंह जेल में हैं, तो इस हालत में चाहे कुछ नेता उनकी पार्टी में शामिल हो रहे हैं, परन्तु वास्तव में उनकी रणनीति क्या होगी, अभी इस बारे कुछ भी नहीं कहा जा सकता।
आदमी के हाथ है बस सिर्फ मेहनत का शऊर,
जिस की किस्मत में है, मीर-ए-कारवां हो जाएगा।
—लाल फिरोज़पुरी
(शऊर =अक्ल या काम करने का ढंग)
-1044, गुरु नानक स्ट्रीट, समराला रोड, खन्ना
-मो. 92168-60000



