ट्रम्प की दादागिरी
अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने इज़रायल के साथ मिल कर ईरान पर जिस तरह हमला किया और जिस तरह वहां के कद्दावर नेताओं और जरनैलों को बमबारी में मार दिया है, उससे स्थिति और भी गम्भीर हो गई है। ट्रम्प चाहे बार-बार यह दावा कर रहे हैं कि उन्होंने ईरान को दबा कर दीवार से धकेल दिया है परन्तु जिस तरह ईरान अमरीका के सहयोगी खाड़ी देशों में अमरीकी अड्डों पर लगातार हमलावर है, उसने खाड़ी देशों सहित अमरीकी प्रशासन को चिंता में डाल दिया है। ट्रम्प ने पिछले वर्ष जनवरी में अपना पद सम्भाला था। इससे पहले उन्होंने पहली बार वर्ष 2017 में चुनाव जीत कर वर्ष 2021 तक प्रशासन चलाया था।
अपनी दूसरी पारी में जिस तरह उन्होंने विश्व भर के देशों को तरह-तरह की धमकियां दी हैं और जिस तरह अमरीका को निर्यात करने वाले दर्जनों ही छोटे-बड़े देशों पर अपनी इच्छा अनुसार कर (टैरिफ) लगाने की घोषणा की है, उससे उनके दशकों से मित्र रहे देश भी एक तरह से उनका साथ छोड़ गए हैं। यहीं बस नहीं, उन्होंने ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करने की धमकी भी दी थी और अपने वर्षों से साथी साझेदार बड़े पड़ोसी देश कनाडा को भी अमरीका का एक प्रदेश बनाने की धमकी भरा दावा किया था। अब अपने सवा वर्ष के प्रशासन में उन्होंने जिस तरह विश्व भर के देशों में अपने हस्तक्षेप को बढ़ाया है और जिस तरह स्थान-स्थान पर छोटे-बड़े युद्ध करवाए हैं, ऐसा अमरीका के इतिहास में बहुत कम बार हुआ है। उन्होंने पश्चिमी एशिया में अपना हस्तक्षेप बेहद बढ़ा दिया है। पूर्वी अफ्रीका के यमन और सोमालिया पर लगातार हमले किए हैं। यमन में हूतियों के लाल सागर में जहाज़ों पर हमलों को लेकर उन्होंने इस देश में लगातार बमबारी जारी रखी है। इसी तरह वह सोमालिया में लगातार हमले कर रहे हैं, जहां से प्राप्त विवरणों के अनुसार अब तक 4000 से भी अधिक मौतें हो चुकी हैं। इन विवरणों के अनुसार ही वर्ष 2025 से अब तक सोमालिया में लगभग 150 हमले अमरीका द्वारा किए गए हैं।
आश्चर्यजनक बात यह है कि एक तरफ ट्रम्प ने विश्व में शांति करवाने के यत्नों के पुरस्कार स्वरूप ‘नोबेल पुरस्कार’ के लिए लगातार गुहार लगाई थी और दूसरी तरफ उन्होंने स्थान-स्थान पर हुईं छोटी-बड़ी लड़ाइयों में अपने हस्तक्षेप को लगातार बढ़ाया है। पिछले वर्ष भारत-पाकिस्तान के बीच हुए कुछ दिनों के युद्ध संबंधी वह अब तक दर्जनों बार यह बयान दे चुके हैं कि उनके यत्नों से ही यह युद्ध रुका था। जबकि भारत ने उनके इस दावे को लगातार नकारा है। इस वर्ष के शुरू में उन्होंने लेटिन अमरीका के देश वेनेजुएला पर हमला करके वहां के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को नज़रबंद कर लिया और वहां अपनी कठपुतली सरकार बना दी थी। गाज़ा पट्टी में जहां इज़रायली हमलों में 70,000 से भी अधिक फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं, संबंधी भी उन्होंने इस पट्टी को पर्यटन में बदलने के बयान दिए थे। उन्होंने सभी देशों को यह भी अपील की कि वह गाज़ा की शांति संबंधी योजना में शामिल हों, परन्तु ज्यादातर देशों ने उनकी इस योजना की ओर कोई ध्यान नहीं दिया। ईरान ने होर्मुज़ जलडमरू की प्रभावशाली ढंग से नाकाबंदी करके वहां से गुज़रने वाले जहाज़ों को रोक दिया है, इस समुद्री मार्ग से विश्व के 20 प्रतिशत से भी अधिक कच्चे तेल का व्यापार होता है।
ट्रम्प ने इसके लिए जापान और दक्षिण कोरिया सहित यूरोपीयन देशों को यह गुहार लगाई है कि वे वहां अपने युद्धपोत भेज कर इस नाकाबंदी को हटाने में सहायक हों, जिस कारण विश्व भर में तेल की कीमतों में वृद्धि हो रही है। यदि यह युद्ध और भी बढ़ता है तो तेल की कीमतें और भी आसमान को छू जाएंगी, जिससे ज्यादातर देशों की आर्थिकता बुरी तरह से लड़खड़ा जाएगी, परन्तु ट्रम्प की इस अपील के बावजूद जर्मनी, स्पेन, आस्ट्रेलिया, जापान और ब्रिटेन जैसे देशों ने इस युद्ध में शामिल होने से इनकार कर दिया है, जिससे अमरीकी राष्ट्रपति की स्थिति और भी खराब हो गई है। यहां तक कि अमरीका में भी उनका भारी विरोध होना शुरू हो गया है।
नि:संदेह उनकी नीतियों के कारण विश्व भर के ज्यादातर देशों में अमरीका के प्रति नाराज़गी पैदा होनी शुरू हो गई है, जो इस बड़े देश के लिए बहुत बड़ी चुनौती सिद्ध हो सकती है। देखने वाली बात यह होगी कि इस बन रहे दबाव को ट्रम्प किस सीमा तक सहन कर सकते हैं, क्योंकि उनकी मानसिकता विनाश की ओर ही केन्द्रित होती जा रही है, जो विश्व भर के लिए एक बहुत ही चिन्ताजनक संदेश माना जा रहा है।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

