एक चुनावी दंगल और
देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में चाहे लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों के लिए क्रमवार पांच-पांच साल का समय निश्चित किया गया है परन्तु इस विशाल देश में हर समय कहीं न कहीं चुनाव प्रक्रिया चलती रहती है। केन्द्रीय चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल और असम के साथ-साथ केन्द्र शासित राज्य पुडुचेरी में अप्रैल माह में चुनावों की घोषणा कर दी है। इस समय यह चुनाव इस कारण भी दिलचस्प बनते नज़र आ रहे हैं कि इनमें से तीन राज्यों में एक तरह से प्रांतीय पार्टियां ही प्रशासन चला रही हैं। असम और पुडुचेरी में भाजपा के नेतृत्व वाली एन.डी.ए. सरकार प्रशासन चला रही है, जबकि पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में अलग-अलग पार्टियों का राज है। तमिलनाडु में डी.एम.के. की सरकार है, पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली त्रिणमूल सरकार तीसरी बार प्रशासन में है और केरल में मार्क्सवादी पार्टी के नेतृत्व वाली वामपंथी सरकार बनी हुई है। केरल की वामपंथी सरकार पिछली दो पारियों से प्रदेश में राज कर रही है।
चाहे मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी को प्रांतीय पार्टी तो नहीं कहा जा सकता परन्तु इसका घेरा पिछले लम्बे समय से बड़ी हद तक केरल में ही सिंकुड़ कर रह गया है। इन तीन राज्यों में लगातार प्रशासन उक्त पार्टियों का रहने के कारण सत्ता विरोधी रुझान भी देखने को मिल सकता है, जहां भारतीय जनता पार्टी लगातार आगे बढ़ रही है और इन तीनों राज्यों में भी उसने अपनी अच्छी पैठ बना ली है परन्तु ममता बनर्जी, एम.के. स्टालिन और पिनाराई विजयन जैसे बड़े प्रांतीय नेताओं को चुनौती देना उसके लिए कोई आसान काम नहीं है, परन्तु पिछले सालों में हरियाणा, महाराष्ट्र और बिहार पर जीत प्राप्त करने के बाद भाजपा बड़े हौसले में आई दिखाई देती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का प्रभाव अभी भी बड़ी हद तक कबूला जाता है। नि:संदेह राज्यों के चुनावों में प्रांतीय मुद्दे अधिक हावी रहते हैं, परन्तु इनके साथ-साथ राष्ट्रीय मुद्दों का प्रभाव भी दृष्टिविगत नहीं किया जा सकता। इन चुनावों की घोषणा उस समय की गई है, जब विपक्षी पार्टियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए राज्यसभा तथा लोकसभा दोनों सदनों में नोटिस दाखिल करवा दिया है। इस प्रस्ताव के तकनीकी पक्ष से सफल होने की तो कोई उम्मीद नहीं, परन्तु विपक्षी पार्टियां चुनाव प्रचार के दौरान एस.आई.आर. (मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण) को अपने प्रचार का मुख्य मुद्दा बना सकती हैं, क्योंकि इन चुनावों में अधिकतर राज्यों में इस निरीक्षण के समय भारी मात्रा में मतदाताओं के नाम सूची में से काट दिए गए हैं, जिनमें बहुत-से मतदाताओं संबंधी मामले अभी भी अदालतों की नज़र में हैं। चाहे चुनाव आयोग ने लगातार इस मतदाता कवायद संबंधी स्पष्टीकरण दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट में विपक्षी पार्टियों द्वारा एस.आई.आर. संबंधी शिकायतें करने के बाद उच्च अदालत ने इस प्रक्रिया को जारी रखने के निर्देश दिए हैं। इसे किस प्रकार हर हाल में पारदर्शी बनाया जाना चाहिए, इस संबंधी भी उच्च अदालतों द्वारा निर्देश जारी किए गए हैं। चुनाव आयोग ने 100 प्रतिशत मत केन्द्रों पर वैब कास्टिंग की व्यवस्था करके चुनाव की निष्पक्षता तथा पारदर्शिता को बनाए रखने का पूरा यत्न भी किया है, परन्तु चुनावों के दौरान भी इस मामले के गर्म रहने की सम्भावना बनी रही है। होने वाले इन चुनावों में राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस का अधिक प्रभाव दिखाई नहीं देता।
चाहे केरल में इसे कुछ सफलता मिलने की उम्मीद की जा रही है, परन्तु तमिलनाडु में जहां यह डी.एम.के. से मिलकर चुनाव लड़ रही है, वहीं इस पार्टी द्वारा कांग्रेस को 20 से 25 सीटें ही देने की पेशकश की गई है, परन्तु तमिलनाडु में फिल्म अभिनेता विजय ने भी अब तक बड़ा प्रभाव बनाया है, जो आगामी समय में डी.एम.के. के लिए एक बड़ी चुनौती बनता दिखाई दे रहा है। इन पांच राज्यों में से दो में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार है। तीन राज्यों में विपक्षी पार्टियां शासन कर रही हैं, परन्तु इनमें भी कांग्रेस का कोई अधिक प्रभाव दिखाई नहीं देता, जिसके लिए उसे आगामी महीनों में कड़ी मेहनत करने की ज़रूरत होगी। कुल मिला कर 4 मई को आने वाले इन राज्यों के परिणामों का प्रांतीय स्तर के साथ-साथ राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक प्रभाव पड़ने से भी इन्कार नहीं किया जा सकता।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

