कहां हैं संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद ?
इन दिनों दुनिया एक ऐसे सनकी नेता का सामना कर रही है जिसकी सनक ने चारों ओर आतंक मचा रखा है। चाहे कोई भी देश हो, भले ही सुंदरता और अच्छे वातावरण के लिए जाना जाने वाला दुबई हो या फिर सऊदी अरब। अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प तरह की सनक हर दिन दिखा रहे हैं। अभी तक टैरिफ का आतंक मचाने वाले ट्रम्प किसी देश के राष्ट्रपति को सोते समय पतन्ी समेत उठा लेते हें तो किसी पर देश पर हमला करके उसके सर्वोच्च नेता को परिवार समेत खत्म कर देते हैं, लड़कियों के स्कूल पर बमबारी कर देते हैं। आज उनके रवैये से दुनिया के सारे देश परेशान हैं, चाहे वह युद्ध में शामिल हों या न हों। चाहे उनका युद्ध से दूर-दूर तक का संबंध न हो। अब सवाल यह उठता है कि ट्रम्प पर अंकुश लगाने वाला कोई है या नहीं। ऐसे में बस एक ही नाम याद आता है संयुक्त राष्ट्र और उसकी सुरक्षा परिषद।
ऐसे संकट में उम्मीद की जाती है कि संयुक्त राष्ट्र और उसकी सुरक्षा परिषद चल रहे युद्ध में हस्तक्षेप और मध्यस्थता करें। युद्ध को रोकने में प्रभावी भूमिका निभाए। पिछले कुछ सालों में चाहे यूक्रेन-रूस का युद्ध हो या अमरीका-इज़रायल का ईरान से चल रहा मौजूदा युद्ध, इनकी भूमिका पर सवाल उठ रहा है। ईरान-अमरीका संघर्ष से तीसरे महायुद्ध की आशंका के बीच सुरक्षा परिषद मूकदर्शक बनी हुई है। 2022 से चल रहे रूस-यूक्रेन संघर्ष में सुरक्षा परिषद कोई ठोस कार्रवाई करने में असमर्थ रही है। हालांकि सुरक्षा परिषद की ज़िम्मेदारी युद्धों को रोकने की है। ईरान युद्ध के बढ़ते दायरे के बीच संयुक्त राष्ट्र और उसकी सुरक्षा परिषद की प्रासंगिकता पर सवाल उठ रहे हैं।
प्रथम विश्व युद्ध के बाद 1919 में दुनिया के कुछ देशों ने लीग ऑफ नेशन की स्थापना की थी, लेकिन यह संगठन दूसरा विश्व युद्ध रोकने में विफल रहा। दूसरे विश्व युद्ध के घाव काफी गहरे थे। इसमें पहली बार परमाणु बम का इस्तेमाल हुआ। नागासाकी और हिरोशिमा पर गिराए गए इन बमों से हुई असंख्य मौतों और विकिरण के दुष्परिणामों से समूची मानवता विचलित हो गई थी। इस महायुद्ध की अकथनीय पीड़ा ने सबक दिया कि विवादों-समस्याओं के निदान के लिए युद्ध नहीं शांति का रास्ता खोजना होगा। सवाल था यह कैसे मुमकिन हो? जरूरत महसूस की गई कि इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एक प्रभावशाली मंच हो। इसी मंशा से 24 अक्तूबर, 1945 को संयुक्त राष्ट्र संगठन की स्थापना की गई थी।
1945 की सैन फ्रांसिस्को कॉन्फ्रैंस में 50 देशों ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर पर हस्ताक्षर किए थे। इस चार्टर के मुख्य उद्देश्यों में अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा बनाए रखना, सदस्य देशों के मध्य सहयोग बढ़ाना, मानवाधिकारों की रक्षा और आर्थिक- सामाजिक विकास को बढ़ावा देना शामिल है। संस्था की सबसे महत्वपूर्ण इकाई सुरक्षा परिषद बनाई गई, जिसे युद्ध और शांति के प्रश्नों पर निर्णय लेने की शक्ति दी गई। सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्यों में 5 स्थायी सदस्य हैं बनाए गए, जिन्हें वीटो पावर दी गई। ये पांच देश अमरीका, रूस, इंग्लैंड, फ्रांस और चीन को मिली। किसी प्रस्ताव का इनमें एक भी विरोध कर दे तो वह प्रस्ताव पास नहीं हो सकता। दूसरे विश्व युद्ध के विजेता देशों की संगठन में प्रभावी भूमिका के लिए सौंपी गई यह अतिरिक्त शक्ति आगे चलकर संगठन की कमज़ोरी का कारण बन गई। जल्द ही संयुक्त राष्ट्र वीटो प्राप्त महाशक्तियों की राजनीति का मंच बन गया। सोवियत संघ ने 1946-1991 के बीच लगभग 120 बार अपने समर्थक देशों के लिए इस अधिकार का उपयोग किया। अमीरीका ने भी अपने गुट के लिए यही रास्ता अपनाया। नतीजतन कई अंतर्राष्ट्रीय संकटों के समय संयुक्त राष्ट्र किसी प्रभावी हस्तक्षेप की स्थिति में नहीं रहा।
1991 में खाड़ी युद्ध के दौरान सुरक्षा परिषद ने इराक के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को मंजूरी दी। हर्जेगोविना, कोसोवो, ईस्ट टाइमोर शांति अभियानों में भी उसकी भूमिका प्रभावी रही, लेकिन 1994 के रवांडा नरसंहार जिसमें लगभग 8 लाख लोग मारे गए, के मामले में संयुक्त राष्ट्र कुछ नहीं कर सका। 1995 में बोस्निया के स्रेब्रेनिका नरसंहार में भी यही स्थिति रही जब संयुक्त राष्ट्र की शांति सेना हज़ारों नागरिकों की हत्या को रोकने में विफल रही। इन असफलताओं ने संगठन की विश्वसनीयता को गंभीर नुकसान पहुंचाया। 2003 में इराक पर अमरीकी हमले ने संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता पर गम्भीरे सवाल खड़े किए थे। सुरक्षा परिषद से इजाज़त न होने पर भी अमरीका ने इराक पर हमला किया। संदेश साफ था कि महाशक्तियां चाहें तो संयुक्त राष्ट्र को दरकिनार कर सकती हैं। सीरिया और यूक्रेन संकट भी संयुक्त राष्ट्र संघ की लाचारी सामने आई।
खाड़ी देशों में विध्वंस की आग दूर तक धधक रही है। तीसरे महायुद्ध की आशंका से दुनिया डरी हुई है। संयुक्त राष्ट्र इसे रोकने का कोई प्रभावी मंच बन सकता है, इसकी कोई संभावना नहीं दिखती। एक बार फिर सवाल पैदा हो रहा है कि क्या संयुक्त राष्ट्र आज भी वैश्विक शांति का प्रभावी मंच है? क्या संयुक्त राष्ट्र अप्रासंगिक हो गया है? शायद इसका उत्तर इतना आसान नहीं है। हाल के कई युद्धों के समय यह संगठन जितना कमज़ोर दिखा है, उसके कारण उसमें बड़े सुधार की आवश्यकता महसूस की जा रही है। इसके लिए सुरक्षा परिषद के विस्तार, वीटो शक्ति पर नियंत्रण और भारत जैसी नई वैश्विक शक्तियों को सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता प्रदान किया जाना ज़रूरी माना जा रहा। (एजेंसी)

