ईरान युद्ध के कारण तेल से भी भयावह हो रहा जल संकट

ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट बंद कर देने से दुनिया भर के अधिकतर देशों में तेल व गैस की गंभीर स्थिति उत्पन्न हो गई है, महंगाई में भी इजाफा हुआ है, लेकिन इस युद्ध की वजह से मध्य पूर्व में तेल से भी बड़ा संकट पानी बन गया है। यह इज़रायल व अमरीका द्वारा ईरान पर बेमकसद थोपे गये युद्ध का छुपा हुआ संकट है, जबकि अमरीका व ईरान के बीच समझौता वार्ता चल रही थी, जिसके बारे में दोनों देश सकारात्मक परिणाम को लेकर आश्वस्त थे, लेकिन 2025 की तरह इस बार भी 28 फरवरी, 2026 को वार्ता के बीच में ही ईरान पर हमला कर दिया गया, क्योंकि इज़रायल इस संभावित समझौते के पक्ष में नहीं था। अब स्थिति यह है कि इस युद्ध में पानी हथियार बन गया है। दरअसल, पानी का महत्व तेल से भी अधिक हो गया है, क्योंकि जहां तेल ने फारस की खाड़ी को समृद्ध किया, वहीं डीसेलिनेटिड पानी उसे जीवित रखता है और यही बात इज़रायल व गाज़ा पर भी लागू होती है। इज़रायल ने ईरान के डीसेलिनेशन (अलवणीकरण) प्लांट व उससे जुड़े पॉवर स्टेशन पर बमबारी की तो जवाबी कार्रवाई में ईरान ने इज़रायल, कुवैत, बहरीन आदि के ऐसे ही इन्फ्रास्ट्रक्चरों पर ड्रोन व मिसाइल से हमले किये, जिससे मध्य-पूर्व में वास्तव में सबसे कमज़ोर रणनीतिक बिंदु तेल की जगह पानी बन गया है, यह सब कुछ ऐसे समय में हो रहा है, जब जगह जगह विश्व जल दिवस (22 मार्च) मनाने की तैयारी चल रही है, जिसका 2026 का थीम, संयक्त राष्ट्र के अनुसार ‘वाटर एंड जेंडर’ है, इस संदेश के साथ कि ‘जहां पानी बहता है, वहां समता विकसित होती है’। 
सोचने की बात है कि जिस युद्ध में प्रारम्भिक स्कूल की 170 बच्चियों की मृत्यु हो गई हो, उसमें संयुक्त राष्ट्र के इस नारे की भला क्या प्रासंगिकता रह जाती है? बहरहाल, मध्य पूर्व में पानी संकट निरन्तर तेज़ी के साथ गंभीर व चिंताजनक होता जा रहा है। इस क्षेत्र में पानी की कमी तो पहले से ही थी (कि सऊदी अरब में एक भी नदी नहीं है), जो महत्वपूर्ण पानी इन्फ्रास्ट्रक्चर पर हमला करने की वजह से अतिरिक्त संकटमय हो गई है, जिससे दीर्घकाल में कुप्रभाव की आशंका बढ़ गई है। दोनों पक्षों की तरफ से न सिर्फ  डीसेलिनेशन प्लांट्स को निशाना बनाया जा रहा है बल्कि कुछ मामलों में उन्हें चलाने वाले पॉवर स्टेशनों को भी नष्ट किया गया है, जिससे लाखों लोगों के लिए पानी के बुनियादी स्रोत पर खतरा मंडराने लगा है। खाड़ी के कुछ देशों में 90 प्रतिशत पीने का पानी डीसेलिनेशन प्लांटों से ही आता है। इस युद्ध से जो प्रारम्भिक रिपोर्ट्स मिली हैं, उनसे मालूम होता है कि पहले अमेरिका व इज़रायल ने ईरान के केशम द्वीप पर बने डीसेलिनेशन प्लांट पर बमबारी की, जिससे लगभग 30 गांवों को होने वाली जल आपूर्ति बाधित हुई। इसके जवाब में ईरान की मिसाइल/ड्रोन ने जेबेल अली पोर्ट (यूएई), फुजैरह एफ1 पॉवर/वाटर काम्प्लेक्स (यूएई), दोहा वेस्ट प्लांट (कुवैत) आदि पर या उनके पास गिरीं, जिससे उन्हें नुकसान पहुंचा। बहरीन व इज़रायल के डीसेलिनेशन प्लांट्स पर भी हमले हुए हैं। 
खाड़ी में लगभग 400 और इज़रायल में पांच डीसेलिनेशन प्लांट्स हैं और अगर इन्हें ‘वैध निशानों के रूप में देखा जाने लगा तो कुछ ही दिनों में इस क्षेत्र में पीने के पानी का इतना गंभीर संकट उत्पन्न हो जायेगा, जिसकी कल्पना भी करना कठिन है’, ऐसा विशेषज्ञों का कहना है। गौरतलब है कि पृथ्वी पर जो कुछ सबसे रईस देश हैं, वह पूर्णत: डीसेलिनेशन प्लांट्स पर पीने के पानी के लिए निर्भर हैं, जो समुद्र के खारे पानी को पीने के पानी में तब्दील करते हैं। दुबई, कुवैत सिटी व मनामा जैसे शहरों का अस्तित्व तो केवल इसलिए है कि उनके तटों पर जो डीसेलिनेशन प्लांट्स स्थापित हैं, वह समुद्र से खारे पानी को पम्प करते हैं और फिर उसे पीने योग्य बनाकर लाखों लोगों को सप्लाई करते हैं, इनके बिना नलके कुछ ही दिनों में सूख जायेंगे। ईरान पर थोपे गये युद्ध के पहले सप्ताह में दुनिया का ध्यान पूर्णत: तेल पर केंद्रित था। समीक्षक होर्मुज स्ट्रेट में टैंकरों की आने-जाने, खाड़ी में रिफाइनरियों के बंद होने और कच्चे तेल में अचानक उछाल आने पर ही चर्चा कर रहे थे। 
लेकिन तेल बाज़ारों के इस शोर में जल के त्वरित संकट को अनदेखा कर दिया गया था, जबकि अब पानी ही सबसे बड़ी समस्या बनकर सामने आ रहा है। कुवैत व बहरीन जैसे देश तो पीने के पानी के लिए क्रमश: 90 प्रतिशत व 95 प्रतिशत डीसेलिनेशन प्लांटों पर ही निर्भर हैं, जबकि ओमान की निर्भरता 86 प्रतिशत व सऊदी अरब की 70 प्रतिशत है। गाज़ा में अधिकतर जल इन्फ्रास्ट्रक्चर नष्ट हो चुका है, जिससे वहां पानी की भारी कमी महसूस की जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि जल इन्फ्रास्ट्रक्चर पर अगर हमलों को रोका न गया तो 100 मिलियन से अधिक लोग पीने के पानी को तरसने लगेंगे, जिससे बड़े पैमाने पर विस्थापन की आशंका बढ़ जायेगी। गौरतलब है कि युद्ध से पहले ही ईरान लगातार पिछले छह साल से सूखे का सामना कर रहा है कि उसके रिज़र्वायरों में क्षमता का 10-12 प्रतिशत पानी ही रह गया है। पानी की कमी मध्य पूर्व में कृषि को भी प्रभावित कर रही है। इराक में इस समय सूखे की स्थिति ऐसी है, जो पिछले 100 वर्षों के दौरान देखी नहीं गई। जल इन्फ्रास्ट्रक्चर को हथियार बनाया जाना 1990-91 के खाड़ी युद्ध की याद दिला रहा है और इसका सबसे बड़ा खतरा यह है कि पानी की उपलब्धता में स्थायी संकट उत्पन्न हो सकता है। ध्यान रहे कि जल संकट कृषि उत्पादन को भी प्रभावित करता है, जिससे खाद्य सुरक्षा को खतरा उत्पन्न होता है और वैश्विक खाद्य दामों में वृद्धि हो जाती है। 
मध्य-पूर्व में जल सुरक्षा का जो खतरा है वह ‘छुपा हुआ संकट’ है, जिसका कुप्रभाव तेल से भी अधिक हो सकता है और इससे बड़े पैमाने पर पलायन की चिंताएं बढ़ गई हैं। हर कोई सऊदी अरब व उसके पड़ोसी देशों को पेट्रोस्टेट्स समझता है, लेकिन वह वास्तव में समुद्र के खारे पानी की राजशाही हैं। वह मानव-निर्मित फॉसिल-फ्यूल वाटर सुपरपॉवर है। यह 20वीं शताब्दी का करिश्मा ही है कि खारे पानी को पीने योग्य बना दिया गया है, रिवर्स ओसमोसिस से, लेकिन यह एक प्रकार की ज़बरदस्त कमज़ोरी भी है, जैसा कि इस युद्ध में देखा जा रहा है कि डीसेलिनेशन प्लांट्स व उन्हें चलाने वाले पॉवर स्टेशनों पर बारूद बरसाया जा रहा है ताकि पानी का संकट पैदा हो जाए।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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