बन रहे अनिश्चित हालात

अमरीका और इज़रायल के ईरान के साथ चल रहे विनाशकारी युद्ध के अभी खत्म होने की सम्भावनाएं दिखाई नहीं देती। अमरीका और इज़रायल ने 28 फरवरी को ईरान पर हमला किया था। उसके मुख्य नेता अयातुल्ला अली खामेनेई सहित वरिष्ठ नेताओं और महत्त्वपूर्ण सैन्य जरनैल इस हमले में मारे गए थे। इनका युद्ध तो चाहे दो सप्ताह पहले ही शुरू हुआ था, परन्तु ईरान और इज़रायल की दुश्मनी दशकों पुरानी है। ईरान ने इज़रायल का अस्तित्व मिटाने का पहले से ही संकल्प लिया हुआ है। इज़रायल न सिर्फ उससे पूरी टक्कर ले रहा है अपितु नज़दीक के कई अरब क्षेत्रों, जिनमें फिलिस्तीनियों ने शरण ली हुई है, पर भी समय-समय पर कब्ज़ा करके वहां उसके द्वारा अपनी स्थायी बस्तियां बना ली गई हैं।
चाहे लम्बी अवधि व्यतीत होने के बाद ज्यादातर अरब देश इज़रायल के अस्तित्व को स्वीकार भी करने लगे हैं और उसके साथ किसी न किसी रूप में अपने संबंध भी बहाल कर रहे हैं परन्तु ईरान ने नज़दीकी देश लेबनान में हिजबुल्ला जैसे कट्टर संगठन और यमन में हूती संगठन के साथ-साथ गाज़ा पट्टी में हमास गुरिल्लों को दशकों से सहायता देकर उन्हें इज़रायल से मुकाबले के लिए पूरी तरह तैयार किया हुआ है, जो समय-समय पर इस पर हमले भी करते रहते हैं। इस बार इस लड़ाई की शुरुआत भी गाज़ा पट्टी में प्रशासन चला रहे हमास संगठन द्वारा 7 अक्तूबर, 2023 को पहले इज़रायल पर हमला किया गया था, जिसके बाद यह लड़ाई गम्भीर रूप धारण करती रही, जिसकी भेंट 80,000 से अधिक गाज़ा पट्टी में बसे हुए फिलिस्तीनी भी चढ़ गए परन्तु इसके साथ-साथ दोनों देशों की आपसी दुश्मनी लगातार और भी बढ़ती गई। अब शुरू हुई इस लड़ाई में जहां अमरीका द्वारा ईरान का प्रत्येक पक्ष से भारी नुकसान किया जा रहा है, वहीं ईरान की ओर से भी वैकल्पिक रूप में इज़रायल और खाड़ी देशों के उन देशों पर हमले किए जा रहे हैं, जिनमें अमरीकी अड्डे स्थापित हैं। यह लड़ाई तेल और गैस से भरपूर खज़ानों वाले देशों में हो रही है, जिसका सीधा प्रभाव विश्व भर के देशों पर पड़ रहा है। कच्चे तेल के साथ-साथ कृषि क्षेत्र में आयात की जाती महत्त्वपूर्ण खाद की भी बड़ी कमी महसूस की जाने लगी है।
भारत में 80 प्रतिशत से भी अधिक कच्चे तेल और यूरिया का आयात किया जाता है। इसीलिए इस युद्ध का सीधा प्रभाव देश पर पड़ा है। इससे एक तरह से हाहाकार मचा हुआ दिखाई देने लगा है। युद्ध लम्बा होने की आशंका से लोगों में बेचैनी और परेशानी लगातार बढ़ रही है।  देश भर में पेट्रोल और डीज़ल के साथ-साथ रसोई गैस की भी भारी किल्लत पैदा होने के समाचार मिलने शुरू हो गए हैं, जिस कारण इन वस्तुओं की मांग एकाएक बढ़ गई है, जिसकी शीघ्र पूर्ति करना बेहद कठिन है। चाहे ऊर्जा मंत्री लगातार संसद में यह बयान दे रहे हैं कि इन ज़रूरी वस्तुओं की कमी नहीं आने दी जाएगी और यह भी कि इसके बड़े भंडार देश में हैं परन्तु इसके बावजूद जिस तरह अफवाहें फैल रही हैं और सप्लाई संबंधी अनिश्चितता बढ़ती जा रही है, उसे लेकर देश भर में गैस एजेंसियों के समक्ष भीड़ एकत्रित होना शुरू हो गई है। पेट्रोल और डीज़ल के साथ-साथ गैस की मांग भी चार गुणा बढ़ गई है, जिससे हालात बेकाबू होने लगे हैं। स्थिति का लाभ उठाकर जमाखोरी और काला-बाज़ारी का धंधा भी प्रफुल्लित होने लगा है। मांग बढ़ने से पम्पों पर पैट्रोल और डीज़ल की सप्लाई में देरी होने लगी है। ग्रामीण क्षेत्रों में पेट्रोल पम्पों से किसानों और अन्य द्वारा भारी मात्रा में डीज़ल और पेट्रोल खरीदने  के समाचार प्राप्त होने शुरू हो गए हैं। विपक्षी पार्टियों ने चल रहे संसद अधिवेशन में और बाहर इन वस्तुओं की आपूर्ति के विरुद्ध कड़ी बयानबाज़ी और प्रदर्शन करने शुरू कर दिए हैं। 
इस संबंध में पैट्रोलियम और गैस मंत्री हरदीप पुरी के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी स्थिति के संबंध में डर का माहौल पैदा करने का यत्न करने वाले लोगों की कड़ी आलोचना की है और कहा है कि मौजूदा संकट से कोई भी देश बच नहीं सका परन्तु सरकार देश की ऊर्जा सुरक्षा को बनाये रखने के लिए पूरा यत्न कर रही है। उन्होंने जहां जमाखोरी और कालाबाज़ारी करने वाले लोगों को चेतावनी दी है, वहीं राज्य सरकारों को भी ऐसी स्थिति पर नज़र रखने के लिए कहा है, परन्तु हालात ऐसे बन रहे हैं कि देश में ज्यादातर स्थानों पर व्यापारिक (कमर्शियल) सिलेंडरों की कमी के कारण होटल कारोबार और उद्योग पर प्रभाव पड़ना शुरू हो गया है। गैस के लिए ज्यादातर स्थानों पर ऑनलाइन बुकिंग बंद कर दी गई है। राजधानी दिल्ली में भी कई रैस्टोरेंट और दुकानें बंद रहीं। एक अनुमान के अनुसार 70 प्रतिशत रैस्टोरैंटों का काम प्रभावित हुआ है। गैस एजेंसियों के बाहर भीड़ की लम्बी कतारें लगनी शुरू हो गई हैं, जिस कारण स्थान-स्थान पर उलझन भरी स्थिति बन गई है।
नि:संदेह भारत के लिए इस युद्ध के प्रभाव से बच पाना बेहद कठिन है। सरकार के समक्ष पैदा हो रही यह स्थिति एक बड़ी चुनौती है। पहले ही चिन्तावान हुई केन्द्र सरकार को बड़ी तत्परता दिखाते हुए इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए बड़े यत्न करने की ज़रूरत होगी।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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