दृढ़ अन्तर्राष्ट्रीय नीति की ज़रूरत

अमरीका-इज़रायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध का ताप विश्व भर को लगना शुरू हो गया है। ईरान द्वारा अपने समुद्र में होर्मुज़ जलडमरू मार्ग को बंद कर देने से विश्व भर में कच्चे तेल की किल्लत पैदा होनी शुरू हो गई है। भारत में कच्चा तेल 40 प्रतिशत से अधिक और गैस 90 प्रतिशत तक खाड़ी देशों से आते हैं, इनकी सप्लाई में विघ्न पड़ने से देश को बड़े संकट का सामना करना पड़ सकता है। भारत अपने कच्चे तेल की ज़रूरत का लगभग 88 प्रतिशत आयात करता है, इसमें आधा हिस्सा होर्मुज़ जलडमरू के रास्ते से आता है। दूसरी तरफ अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने लगी हैं। गत 28 फरवरी को अमरीका ने ईरान पर हमला किया था। उस समय के बाद अन्तर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की कीमत 70 डॉलर से बढ़ कर 92 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। गैस (एल.पी.जी) की कीमतें भी दोगुनी हो गई हैं।
भारत सरकार देश की रिफाइनरियों की मांग पूरी करने के लिए अमरीका, लतीनी अमरीका और पश्चिमी अफ्रीका से कच्चे तेल का आयात कर रही है। अब अमरीका ने भारत में पैदा हो रही हंगामी स्थिति को देखते हुए 30 दिनों के लिए इसे रूस से कच्चा तेल खरीदने की इजाज़त दे दी है, जहां तक अमरीका के साथ हुए व्यापारिक समझौते का संबंध है, उस संबंध में भी अनेक ही किन्तु-परन्तु लगाए जा रहे हैं। विपक्षी पार्टियों द्वारा यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि भारत ने इन व्यापार समझौतों में अमरीका के समक्ष घुटने टेक दिए हैं, जहां तक भारत की विदेश नीति का संबंध रहा है, देश की आज़ादी के बाद इसकी सरकारों ने बड़ी सीमा तक स्वतंत्र नीति ही अपनाई है। यहां तक कि पंडित जवाहर लाल नेहरू के प्रधानमंत्री होते उस समय सोवियत यूनियन और अमरीका के बीच शीत युद्ध चल रहा था। भारत तत्कालीन युगोस्लाविया और मिस्र ने दोनों पक्षों के दबाव से प्रभावित न होने के लिए गुट-निरपेक्ष ग्रुप बना कर अपने स्वतंत्र अस्तित्व का प्रकटावा किया था। फिर भी उस समय देश सोवियत यूनियन की ओर अधिक झुका हुआ दिखाई देता था, परन्तु ऐसा व्यवहार इसने अपनी ज़रूरतों की पूर्ति के लिए ही धारण किया था।
नि:संदेह सोवियत यूनियन भारत को अपने पांवों पर खड़ा करने के लिए लगातार इसकी प्रत्येक क्षेत्र में सहायता करता रहा था। बड़े उद्योगों से लेकर हथियारों की सप्लाई तक इसने कठिन समय में भारत के साथ कंधे से कंधा मिलाया था। अमरीका के प्रति भी भारत का दृष्टिकोण और नीति बहुत ही संतुलन वाली रही थी, जबकि नया बना पाकिस्तान पूरी तरह अमरीकी कैंप में शामिल हो गया था और लम्बी अवधि तक वह उसकी वैसाखियों पर ही चलने को प्राथमिकता देता रहा। भारत की स्वतंत्र विदेश नीति ने अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर इसके प्रभाव को हमेशा बढ़ाया है। उस समय इसने फिलिस्तीन के मामले पर भी डट कर यह आवाज़ उठाई थी कि इसके समाधान के लिए एक अलग स्वतंत्र राज्य स्थापित किया जाना ज़रूरी है। भारत ने  वर्तमान समय में भी रूस, यूरोपियन यूनियन, ब्रिटेन और अन्य क्षेत्रों के देशों के साथ संतुलन बना कर जहां अच्छे संबंध स्थापित किए, वहीं उनके साथ व्यापारिक समझौतों को भी सन्तोषजनक ढंग से सफल बनाया, परन्तु अब इज़रायल और अमरीका के मामले में देश की विदेश नीति लड़खड़ा रही प्रतीत होती है। विशेष रूप से अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प विश्व भर के अन्य देशों के साथ-साथ जिस तरह का भारत के साथ भी व्यवहार कर रहे हैं और जिस तरह अनावश्यक बयानबाज़ी करते दिखाई दे रहे हैं, उसने भारत की स्थिति को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कमज़ोर किया है।
अमरीकी प्रशासन लगातार और बार-बार यह प्रभाव दे रहा है कि वह अन्तर्राष्ट्रीय मामलों में भारत को आदेश दे रहा है। इस बयानबाज़ी का भारत सरकार कोई स्पष्ट और दृढ़ उत्तर देने में भी असमर्थ दिखाई दे रही है। पाकिस्तान के साथ भारत की कुछ दिनों की लड़ाई संबंधी भी जिस तरह की बयानबाज़ी डोनाल्ड ट्रम्प ने लगातार की है, उससे देश की स्वतंत्र शख्सियत पर प्रश्न-चिन्ह लगा है। अभी भी अमरीका के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते के समय जिस तरह ट्रम्प ने भारत को रूस से तेल का व्यापार करने से रोका है और भारत इस संबंध में कोई दृढ़ इच्छा-शक्ति नहीं दिखा सका, यह बात भी ज्यादातर भारतीयों के गले से नीचे नहीं उतर रही। इसे पचा पाना बेहद कठिन है। अभी भी अमरीकी शासकों द्वारा हंगामी स्थिति में रूस से कच्चा तेल खरीदने के लिए 30 दिन का समय देने के अमरीकी शासकों के बयानों ने भारत की स्थिति अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर और भी दयनीय कर दी है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बने हालात के कारण देश को अनेक तरह की समस्याएं पेश आ सकती हैं, परन्तु इन चुनौतियों का किस तरह सामना करना है और किस तरह अपना पक्ष मज़बूत और स्पष्ट रखना है, इसकी भारत जैसे प्रभुसत्ता सम्पन्न देश को आज बड़ी ज़रूरत है। इसके लिए सरकार को किसी भी स्थिति में अपनी कमज़ोरी प्रकट करने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए। इसी ढंग से देश के गौरव और सम्मान को दृढ़ रखा जा सकता है।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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