सदनों में अपनी भाषा का ध्यान रखें राजनीतिक नेता

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है।
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-़गुफ्तगू क्या है।।
(अंदाज़-ए-़गुफ्तगू = बातचीत करने का तरीका)
मिज़र्ा ़गालिब का यह शे’अर लिखने के लिए इस कारण मजबूर हूं कि आजकल लोकसभा, राज्यसभा तथा विधानसभाओं के सत्रों में प्रत्येक जनप्रतिनिधि ऐसी ही भाषा बोल रहा है जैसे दूसरे को कह रहा हो कि तू है क्या शैअ? सत्य तो यही है कि अब लोकतंत्र के इन मंदिरों में, जहां बैठ कर देश तथा राज्यों को दरपेश मामलों के समाधान पर विचार-विमर्श होना चाहिए और गलतियों को सुधारने की बात होनी चाहिए, वहां अब सिर्फ राजनीति ही नहीं होती, अपितु वहां गाली-गलोच तथा वे मामले उठाए जाते हैं जो वास्तव में मामले ही नहीं होते। हालत यह है कि एक-दूसरे को देख लेने तथा नीचा दिखाने के लिए कोई किसी भी स्तर तक जाने के लिए तैयार होता है। भाषा का स्तर इनता गिर गया है कि तौबा भी भली। कभी वक्त था कि लोकसभा, राज्यसभा तथा विधानसभा में पूछे जाने वाले सवालों के जवाब देने के लिए मंत्रियों को इतनी मेहनत करनी पड़ती थी कि उन्हें पसीना आ जाता था। उस समय कोई विधायक या सांसद सदन में झूठ बोलने की हिम्मत कम ही करता था। जवाब देने वाले मंत्री तथा प्रधानमंत्री के जवाब के झूठे होने की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। हां, उस समय भी बड़े-बड़े उद्योगपति घराने अपने मतलब के सवाल उठाने के लिए सांसदों तथा विधायकों को पैसे देकर सवाल उठवाते थे, परन्तु अब तो इन सदनों में उठाए गए सवालों का कोई महत्व ही नहीं रहा। कई बार तो सवाल राज्य की नीति को बदलने तक के लिए मजबूर कर देते थे, परन्तु अब हालात बदल गए हैं। प्रत्येक सत्तारूढ़ पार्टी के नेता बहुमत के दम पर स्वयं को शक्तिशाली दिखाने की कोशिश करते हैं।
हालांकि पंजाब गुरुओं-पीरों की धरती है। यहां जात-पात तथा महिलाओं को हीन समझने के खिलाफ महापुरुषों ने एक सामाजिक क्रांति उत्पन्न की थी। गुरु नानक साहिब का तो साफ संदेश था कि :
जब लग दुनिया रहीऔ नानक
किछु सुणीअै किछु कहीअै। 
(महला 1, अंग 660 )
नि:संदेह यह परमात्मा की प्रशंसा के बारे में कहा गया हो, परन्तु इसके दुनियावी अर्थ तो यही हैं कि पहले कुछ सुनो, फिर कुछ कहो, परन्तु हमने अपनी विधानसभा में इस फलसफे को भूल कर सिर्फ शोर-शराबा, धौंस वाले तरीके से अपनी बात कहना, यहां तक कि गाली-गलोच को ही अपनी बहादुरी एवं अकल समझ लिया है।
सरकार ने महिलाओं को 1000 रुपये प्रति माह देने की घोषणा की है। नि:संदेह यह चुनावी राजनीति है, परन्तु यह देश भर में जारी है। पहले बिहार में महिलाओं के खाते में 10 हज़ार रुपये यकमुश्त डाले गए। अब असम में भी 9000 रुपये यकमुश्त डाले गए हैं। इसके गुण-दोष तथा बहस की बजाय सत्तारूढ़ पार्टी किसी एक सदस्य की टिप्पणी पर पूरा समय लगा रही है और दूसरी ओर विपक्ष मुख्यमंत्री के एक बयान को महिलाओं का अपमान बता रहा है। बेशक टिप्पणियां पर बात होनी चाहिए, परन्तु पूरा समय टिप्पणियों पर व्यर्थ गंवाया जा रहा है, मुद्दों पर कोई बात नहीं। अब बंधुआ मज़दूर की टिप्पणी मुद्दा है जबकि पंजाब में जात-पात इतना बड़ा मुद्दा नहीं है। विशेषकर गुरु साहिब ने दरबार साहिब के 4 दरवाज़े रख कर सबको एक पंगत में लंगर ग्रहण करवा कर इस क्षेत्र जात-पात के बंधन बहुत कमज़ोर कर दिए थे, परन्तु उत्तराखंड में तो बद्रीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति ने गैर-सनातनियों के मंदिर में प्रवेश पर ही पाबंदी लगा दी है। 
अफसोस है कि जो बजट किसी राज्य के भविष्य की नींव मज़बूत करने अथवा कमज़ोर करने का कारण बन सकता है, की मदों पर पंजाब विधानसभा में भी कोई सार्थक बहस नहीं की जा रही, अपितु वे मामले जो वास्तव में मामले ही नहीं, सिर्फ निजी टिप्पणियां हैं, उन पर सारा समय व्यर्थ गंवाया जा रहा है। रब्ब का वास्ता है, पंजाब के विधायकों तथा पार्टियों को कि राजनीति अवश्य करें, परन्तु अपनी भाषा की मर्यादा न छोड़ें। विधानसभा को मल्ल-युद्ध का अखाड़ा न बनाएं, पंजाब के भविष्य की चिन्ता करें। पंजाब के बहुत मामले हैं, पंजाब के मतलब की बात करें।
मतलब की तुम सुनो तो ज़रा कोई कुछ कहे,
जब बे-सुने ़खफा हो दो क्या कोई कुछ कहे।
—द़ाग देहलवी
अमित शाह की रैली
14 मार्च को भाजपा की मोगा रैली में होने वाली गृह मंत्री अमित शाह की परिवर्तन रैली एक तरह से 2027 की विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा द्वारा डंके पर पहली चोट होगी। वह अपने चुनाव अभियान का आगाज़ कर देंगे। चाहे भाजपा-अकाली दल समझौते के आसार दिखाई नहीं देते, परन्तु भाजपा इस रैली के माध्यम से स्वयं को पंजाब में एक बढ़िया विकल्प के रूप में पेश करेगी और अपनी डबल इंजन सरकार के लाभ भी गिनाएगी। उम्मीद है कि श्री अमित शाह इस रैली में नशे, गैंगस्टरवाद, अमन-कानून की खराब स्थिति, धर्म परिवर्तन रोकने, भ्रष्टाचार खत्म करने तथा विकास का रोड मैप पेश करेंगे। यह भी निश्चित है कि श्री अमित शाह इस रैली में पंजाबियों तथा विशेषकर सिखों की हमदर्दी जीतने वाला रवैया भी व्यक्त करेंगे। हो सकता है कि बंदी सिंहों की रिहाई बारे कोई घोषणा भी हो परन्तु यह हो या न हो, फिर भी सिख समुदाय में भाजपा की स्वीकार्यता बढ़ाने वाला कोई संदेश दिये जाने की सम्भावना बहुत ज़्यादा है। यह रैली इस बात का एहसास भी अवश्य करवाएगी कि भाजपा अकाली दल के साथ कोई चुनावी समझौता करेगी या नहीं? परन्तु सबसे बड़ी बात यह है कि यह रैली पंजाब में एक तरह से भाजपा का शक्ति प्रदर्शन होगी। हम आशा करते हैं कि अमित शाह पंजाब तथा सिख मामलों के बारे में कुछ न कुछ साफ-साफ अवश्य कहने का हौसला करेंगे। 
करीये कभी तो कोई सी ग़ुफ्तार स़ाफ स़ाफ,
इन्कार स़ाफ स़ाफ या इकरार स़ाफ स़ाफ।
(ग़ुफ्तार = बातचीत)
(अशोक सिंह)
अपनेपन का एहसास
एक वक्त था कि देश में अल्पसंख्यकों को उनकी संख्या से अधिक पद देकर सम्मान तथा अपनेपन का एहसास करवाया जाता था, परन्तु अब सत्तारूढ़ भाजपा देश के दो बड़े अल्पसंख्यकों को तो एक तरह से सबक सिखा रही है और साफ संदेश दे रही है कि यदि आपने हमें वोट नहीं देना तो अपने अल्पसंख्यकों के लिए किसी सम्मान या रियायत की उम्मीद भी न  करें, परन्तु भाजपा चाहे देश के तीसरे सबसे बड़े अल्पसंख्यक सिखों के साथ कहीं न कहीं प्यार दिखाने का यत्न अवश्य करती है, उसका एक अच्छा और हमदर्दी वाला कार्य दूसरे विरोधी कार्यों के नीचे दब जाता है और अल्पसंख्यक सिख समुदाय का विश्वास डावांडोल हो जाता है। नि:संदेह प्रत्येक पार्टी हर काम अपनी राजनीतिक मसलहत को सामने रख कर करती है, परन्तु केन्द्र सरकार द्वारा एक पूर्व सिख कूटनीतिक तथा मौजूदा भाजपा नेता स. तरनजीत सिंह संधू को दिल्ली का उप-राज्यपाल बनाए जाने का स्वागत करना बनता है। इससे पहले सिर्फ एक सिख एयर मार्शल अर्जुन सिंह 12 दिसम्बर, 1989 को दिल्ली के उप-राज्यपाल बने थे। इसलिए जब किसी अल्पसंख्यक को कोई सरकार प्रतिनिधित्व देती है तो उसका धन्यवाद करना बनता है, परन्तु इस समय सिखों के लिए दो और चुनाव भी धन्यवाद करने वाले हैं। एक तो जम्मू-कश्मीर की सत्तारूढ़ पार्टी नैशनल कांफ्रैंस ने एक सिख गुरविन्दर सिंह ओबराय (शम्मी ओबराय) को राज्यसभा का सदस्य बनवाया। वह जम्मू-कश्मीर से तीसरे सिख राज्यसभा सदस्य हैं। उनसे पहले भाई बुद्ध सिंह त्यागी 1952 से 1964 तक नैशनल कांफ्रैंस की ओर से राज्यसभा सदस्य तथा फिर 2002 से 2008 तक पी.डी.पी. की ओर से तरलोचन सिंह बाजवा भी राज्यसभा सदस्य रहे हैं। दूसरी ओर टीएमसी ने पश्चिम बंगाल से एक सिख परिवार की बहू तथा प्रमुख अभिनेत्री कोयल मलिक को राज्यसभा में भेजा है। टीएमसी द्वारा इससे पहले भी एक सिख परिवार के सदस्य कंवरदीप सिंह को राज्यसभा में भेजा गया था, जो पहले झारखंड मुक्ति मोर्चा की ओर से भी राज्यसभा सदस्य रहे थे। बेशक वह आर्थिक मामलों में काफी विवादित रहे थे। खैर, यह अच्छी बात है कि राष्ट्रीय पार्टियों के अतिरिक्त क्षेत्रीय पार्टियां भी सिखों जैसे अहम अल्पसंख्यकों को उनकी संख्या से अधिक सम्मान दे रही हैं। वैसे राष्ट्रीय पार्टियां तथा भाजपा को विशेषकर यह समझने की ज़रूरत है कि अल्पसंख्यकों को उनकी संख्या से थोड़ा अधिक सम्मान देने से देश में प्यार-सम्मान तथा आपसी विश्वास बढ़ता है, कम नहीं होता और बहुसंख्या की ताकत फिर भी कायम ही रहती है। शुक्रिया।
उस मेहरबां नज़र की इनायत का शुक्रिया,
कुछ बात हक व अटल की आ़िखर किसी ने की।
(अटल = इन्साफ)

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