निर्दलीय उम्मीदवार मैदान में आने से बेहद रोचक हुआ राज्यसभा चुनाव

हरियाणा में राज्यसभा चुनाव काफी रोचक हो गए हैं। हरियाणा की दो राज्यसभा सीटों के लिए 16 मार्च को मतदान होगा और उसी दिन शाम को वोटों की गिनती हो जाएगी। शुरू में यह माना जाता था कि विधानसभा में संख्याबल को देखते हुए शायद बिना मुकाबले ही भाजपा और कांग्रेस के हिस्से में एक-एक सीट आ जाएगी, लेकिन नामांकन पत्र भरने के आखिरी दिन भाजपा की ओर से पूर्व सांसद संजय भाटिया और कांग्रेस की ओर से कर्मवीर बौद्ध को उम्मीदवार घोषित करते हुए इनके नामांकन पत्र भरवा दिए गए थे। नामांकन के अंतिम वक्त भाजपा ने अपनी पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष सतीश नांदल को भी बतौर आजाद उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतार दिया। इससे मामला रोचक हो गया है। विधानसभा में भाजपा के पास 48 विधायक हैं और उसे तीन निर्दलीय विधायकों का भी समर्थन हासिल है। कांग्रेस के पास 37 विधायक हैं और इनेलो के पास 2 विधायक हैं। इससे साफ था कि भाजपा और कांग्रेस के पास एक-एक उम्मीदवार जितवाने के लिए पर्याप्त मात्रा में विधायक हैं। अब भाजपा समर्थित तीसरा उम्मीदवार मैदान में आने से सभी की नजरें इस बात पर लगी हैं कि क्या कांग्रेस विधायकों को तोड़ पाने में भाजपा सफल हो पाएगी? या नहीं क्योंकि सतीश नांदल के पक्ष में कांग्रेस विधायकों को तोड़े बिना भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार की जीत संभव नहीं हो सकती। 
कर्मवीर कांग्रेस प्रत्याशी
कांग्रेस उम्मीदवार कर्मवीर बौद्ध हरियाणा सचिवालय के रिटायर कर्मचारी हैं और अनुसूचित जाति से संबंध रखते हैं। करीब पांच साल पहले वह नौकरी से रिटायर हो गए और कुछ समय पहले ही वह कांग्रेस में शामिल हुए थे। जैसे ही कांग्रेस आलाकमान द्वारा कर्मवीर बौद्ध को राज्यसभा उम्मीदवार बनाए जाने की घोषणा हुई तो कांग्रेस के सभी छोटे और बड़े कार्यकर्त्ता और नेता यह जानने को उत्सुक थे कि आखिर यह कर्मवीर बौद्ध कौन हैं। माना जाता है कि हरियाणा कांग्रेस के किसी भी नेता और गुट ने कर्मवीर को उम्मीदवार बनाए जाने की सिफारिश नहीं की थी। कर्मवीर सीधे तौर पर अनुसूचित जाति कोटे से राहुल गांधी से टिकट लेकर आए हैं। नौकरी के दौरान वह अनुसूचित जाति कर्मचारियों के संगठन में जरूर कुछ सक्रिय रहते थे लेकिन कर्मचारी नेताओं में भी उनका कोई बहुत बड़ा नाम नहीं था। कांग्रेस द्वारा राज्यसभा उम्मीदवार बनाए जाने के बाद उनके बारे जरूर चर्चा होने लगी है। 
हुड्डा के धुर विरोधी हैं नांदल
भाजपा समर्थित सतीश नांदल पहले इनेलो में हुआ करते थे और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा के मुकाबले किलोई विधानसभा क्षेत्र से इनेलो टिकट पर चुनाव लड़ते थे। उसके बाद सतीश नांदल भाजपा में शामिल हो गए और भाजपा की टिकट पर भी किलोई से भूपेंद्र हुड्डा के मुकाबले चुनाव लड़ा। उन्हें भूपेंद्र हुड्डा का धुर-विरोधी माना जाता है और अब तक वह भूपेंद्र हुड्डा के मुकाबले तीन विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं लेकिन अभी तक उन्हें कोई सफलता नहीं मिली। दूसरी तरफ कर्मवीर बौद्ध को चुनाव जितवाने की पूरी जिम्मेदारी भी अब नेता प्रतिपक्ष भूपेंद्र हुड्डा के कंधों पर आ गई है। हरियाणा कांग्रेस के विधायकों में सबसे ज्यादा संख्या भूपेंद्र हुड्डा के प्रति निष्ठा रखने वाले विधायकों की है। भाजपा को दूसरी सीट जीतने के लिए कांग्रेस के कम से कम 7 विधायकों को तोड़ना पड़ेगा और इनेलो के दोनों विधायकों का भी समर्थन हासिल करना पड़ेगा। अगर कांग्रेस के आधा दर्जन से ज्यादा विधायक टूटते हैं और कर्मवीर चुनाव नहीं जीत पाते। निश्चित तौर पर इससे पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा की साख पर धब्बा लगेगा। क्योंकि भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष और भूपेंद्र हुड्डा के धुर-विरोधी सतीश नांदल का चुनाव जीतना भूपेंद्र हुड्डा और उनके सांसद बेटे दीपेंद्र हुड्डा के लिए किसी भी तरह से शुभ नहीं होगा। दूसरा अगर कर्मवीर चुनाव हारते हैं तो अनुसूचित जाति के मतदाताओं में भी गलत संदेश जाएगा और नांदल की जीत से रोहतक की राजनीति भी प्रभावित होगी। 
हुड्डा की प्रतिष्ठा दांव पर
इसी के चलते कर्मवीर की जीत के साथ नेता प्रतिपक्ष भूपेंद्र हुड्डा की प्रतिष्ठा भी दांव पर लग गई है और उन्हें कर्मवीर की जीत सुनिश्चित करने के लिए न सिर्फ पूरी ताकत लगानी पड़ेगी बल्कि यह भी पक्का करना पड़ेगा कि कांग्रेस विधायकों के वोट न टूटें ताकि हुड्डा का कांग्रेस आलाकमान के समक्ष रुतबा बरकरार रह सके। दूसरी तरफ यह भी साफ है कि कर्मवीर के चुनाव जीतने से हुड्डा परिवार की राजनीति पर कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ेगा और हुड्डा परिवार के लिए कर्मवीर कोई राजनीतिक चुनौती भी नहीं हैं। हरियाणा में राज्यसभा चुनाव में पहले भी खेल होता रहा है और अब भी भाजपा इस प्रयास में है कि किसी तरह कांग्रेस विधायकों के वोट भाजपा समर्थित उम्मीदवार के पक्ष में डलवाए जा सकें। पिछली बार राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के पास पर्याप्त मात्रा में विधायक होने के बावजूद भाजपा समर्थित आजाद उम्मीदवार कार्तिकेय शर्मा चुनाव जीत गए थे और कांग्रेस उम्मीदवार अजय माकन चुनाव हार गए थे। उस समय कुछ कांग्रेस विधायकों पर कांग्रेस की बजाय भाजपा समर्थित उम्मीदवार को वोट देने के आरोप लगे थे। इससे पहले भी ऐसा समय आया था जब इनेलो व कांग्रेस के समर्थित उम्मीदवार आरके आनंद पर्याप्त वोट होने के बावजूद पेन की स्याही बदलने के खेल से चुनाव हार गए थे और भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार सुभाष चंद्र चुनाव जीत गए थे। भाजपा को इस बार भी कुछ ऐसी ही उम्मीद है। 
इनेलो पर निगाहें
राज्यसभा चुनाव में इनेलो के दो विधायकों के वोट भी काफी निर्णायक रहने की उम्मीद है। डबवाली से इनेलो के विधायक आदित्य देवीलाल हैं जो देवीलाल के पौत्र हैं। दूसरे विधायक इनेलो प्रमुख अभय चौटाला के बेटे अर्जुन चौटाला रानियां से विधायक हैं। पिछली बार इनेलो विधायक अभय चौटाला ने निर्दलीय उम्मीदवार कार्तिकेय शर्मा को वोट दिया था। जब पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला और उनके बेटे अजय चौटाला को जेबीटी भर्ती मामले में सजा हुई तो उस समय कार्तिकेय शर्मा के भाई मनु शर्मा जेसिका हत्याकांड में तिहाड़ जेल में बंद थे और जेल में उस समय मनु शर्मा ने चौटाला पिता-पुत्र की खूब सेवा की थी। दूसरा कार्तिकेय शर्मा पूरी तरह से निर्दलीय उम्मीदवार थे और वह किसी भी राजनीतिक दल में नहीं थे। 
ऐसे में इनेलो और जजपा द्वारा उनको वोट देना बेहद आसान था। अब राजनीतिक हालात काफी बदल गए हैं। इनेलो के पास तीन विकल्प हैं। इनेलो की राजनीति कांग्रेस और भाजपा के विरोध पर टिकी हुई है। ऐसे में इनेलो द्वारा कर्मवीर के पक्ष में वोट डालने की कोई संभावना नहीं लगती। दूसरा सतीश नांदल इस समय भी भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं और अगर इनेलो विधायक भाजपा उपाध्यक्ष सतीश नांदल के पक्ष में वोट डालने का निर्णय लेते हैं तो निश्चित तौर पर इनेलो की भाजपा विरोधी राजनीति पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। ऐसे में इनेलो को निर्णय लेने में काफी गंभीरता दिखानी पड़ेगी ताकि उनकी आने वाली राजनीति पर इस निर्णय का गलत असर न पड़े। इनेलो क्योंकि कांगे्रस और भाजपा दोनों का ही लगातार विरोध करती आ रही है, ऐसे में एक संभावना इनेलो के गैर हाजिर रहने की भी हो सकती है। कुल मिलाकर राज्यसभा चुनाव को लेकर स्थिति काफी रोचक बन गई है और पूरी तस्वीर 16 मार्च को साफ हो पाएगी। 

मो.-9855465946

#निर्दलीय उम्मीदवार मैदान में आने से बेहद रोचक हुआ राज्यसभा चुनाव