छोटे और सीमांत किसानों तक नया कृषि विज्ञान पहुंचाने की ज़रूरत

गांवों में छोटे और सीमांत किसान गरीबी की हालत में रहे हैं, जो दिन-प्रतिदिन और गरीब एवं कज़र्दार होते जा रहे हैं जबकि बड़े किसान और खुशहाल हो रहे हैं। छोटे और सीमांत किसान अभी नई कृषि तकनीक को पूरी तरह नहीं अपना रहे। उनका उत्पादन दूसरे किसानों से बहुत कम रहता है, क्योंकि वे नई किस्मों के बीज और नई कृषि खोज से विकसित तकनीकों का इस्तेमाल नहीं करते। इस साल अब तक चाहे मौसम कुछ गर्म हुआ है, फिर भी गेहूं की अच्छी फसल होने की उम्मीद है। विशेषज्ञों के अनुसार छोटे किसानों का उत्पादन बड़े किसानों के मुकाबले बहुत कम होने की संभावना है। गांवों में भी किसानों के उत्पादन में बहुत अंतर है। अलग-अलग ब्लॉकों और तहसीलों के किसानों का ही उत्पादन अलग-अलग नही, एक ही गांव के किसानों का उत्पादन भी अलग-अलग है। बड़े और प्रगतिशील किसान 25-26 क्ंिवटल प्रति एकड़ तक उत्पादन ले रहे हैं, जबकि छोटे और सीमांत किसान 16-18 क्ंिवटल प्रति एकड़ पर ही बैठे हैं।
छोटे और सीमांत किसानों तक पीएयू के विशेषज्ञों की पहुंच नहीं। नया कृषि विज्ञान किसानों को कृषि प्रसार सेवा के माध्यम से उपलब्ध होता है। लेकिन कृषि प्रसार सेवा में इतने विशेषज्ञ ही नहीं कि वे दूरवर्ती गांवों में जाकर छोटे किसानों से सम्पर्क करके उन्हें नया कृषि विज्ञान उपलब्ध कर सकें और उनका उत्पादन बढ़ा सकें। मीडिया, टेलीफोन और टेलीविजन के ज़रिए भी किसानों तक कृषि विज्ञान पहुंचता है। लेकिन छोटे किसान नई तकनीक को तभी अपनाते हैं, जब उनका विशेषज्ञों के साथ  सीधा सम्पर्क हो। सब्ज़ क्रांति के समय कम्युनिटी डिवेल्पमेंट ब्लॉकों में तैनात लगभग पूरा स्टाफ कृषि प्रसार सेवा के लिए ज़िम्मेदार होता था। उस समय के मुख्यमंत्री स्वर्गीय प्रताप सिंह कैरों ने कम्युनिटी डिवेल्पमेंट ब्लॉकों को कृषि विकास के यूनिट बना दिया था और इसका इंचार्ज बीडीओ होता था। ग्राम सेवक और ब्लाकों में तैनात प्रसार अधिकारी गांवों में जाकर किसानों के साथ बैठकें करते थे और उन्हें कृषि विज्ञान उपलब्ध करते थे। 
किसानों के लिए ज़रूरी सामग्री का प्रबंध भी करते थे। ऐसा ढांचा बनने से सब्ज़ क्रांति के दौरान रासायनिक खाद, ज़रूरी कीटनाशकों और ज़्यादा उत्पादन देने वाले नई किस्मों के बीजों का इस्तेमाल बढ़ा, जिससे उत्पादन में वृद्धि हुई। फिर धीरे-धीरे यह ढांचा बिखर गया। कम्युनिटी डिवेल्पमेंट ब्लॉकों में ज़्यादा काम पंचायतों से संबंधित होने लगे और कृषि के सभी काम कृषि एवं किसान कल्याण विभाग ने सम्भाल लिए। कम्युनिटी डिवेल्पमेंट ब्लॉकों और पंचायतों का काम-काज पर राजनीतिक रंग चढ़ गया। ब्लॉकों/गांवों में तैनात कृषि एवं किसान कल्याण विभाग का स्टाफ बहुत कम है। 
दूरवर्ती गांवों में विशेषकर छोटे और सीमांत किसानों के साथ उनका कोई खास सम्पर्क नहीं। कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के पास गांव स्तर पर काम करने वाले थोड़े-से कर्मचारी हैं, जो तकनीकी विशेषज्ञ नहीं हैं। ब्लॉक स्तर पर तैनात विशेषज्ञ अपना ज़्यादातर समय कागज़ी कार्रवाई, सामग्री संबंधी कानून और नियमों का पालन करवाने, डीलरों आदि पर नज़र रखने और बैठकों में शामिल होने में लगाते हैं। ज़िले में पीएयू द्वारा स्थापित सिर्फ एक कृषि विज्ञान केन्द्र (केवीके) है, जो किसानों को नेतृत्व देने के लिए है। कई ज़िलों में यह एक ही तरफ काम कर रहा है, जहां से ज़िले के सभी गांवों को नेतृत्व और जानकारी नहीं मिल पाती। पीएयू पंजाब में रबी-खरीफ में 7 किसान मेले लगाती है। किसानों तक संशोधित बीज और तकनीक पहुंचाने की कोशिश करती है, लेकिन इन किसान मेलों में ज़्यादातर छोटे और सीमांत किसान पहुंच नहीं पाते।
सरकार द्वारा किसानों को सब्सिडी आदि देने के लिए जो योजनाएं चलाई गई हैं, उनका अधिक लाभ बड़े तथा मझोले किसानों को पहुंच रहा है। हाल ही में ‘भूमि स्वास्थ्य कार्ड’ के ज़रिए प्रत्येक किसान की ज़मीन की मिट्टी की जांच की गई और नतीजों के आधार पर ज़मीन में कृषि सामग्री की खुराक डालने की सलाह दी गई। छोटे और सीमांत श्रेणी वाले बहुत-से किसानों को ‘भूमि स्वास्थ्य कार्ड’ नहीं मिले। जिन्हें मिले, उनमें से ज़्यादातर ने इस्तेमाल नहीं किया। छोटे और सीमांत किसानों की या तो मिट्टी की जांच नहीं हुई, या जहां जांच हुई, वहां उन्हें विशेषज्ञों की सिफारिशों के बारे में कुछ बताया ही नहीं गया। इन कार्डों का इस्तेमाल किसान बहुत कम कर रहे हैं। 
भूमि स्वास्थ्य कार्ड का फायदा छोटे और सीमांत किसानों तक बिल्कुल नहीं पहुंचा। सरकार द्वारा सब्सिडी पर बड़ी-बड़ी मशीनें दी गईं, लेकिन छोटे और सीमांत किसान ये मशीनें नहीं ले सके। काम न होने के कारण छोटे और सीमांत किसान कृषि करके अपना गुज़ारा करते हैं। भूमिहीन और एक-दो एकड़ वाले किसान ठेके पर ज़मीन लेकर कृषि कर रहे हैं। ज़मीन के ठेके भी बहुत बढ़ गए हैं। उनका कज़र् बढ़ता जा रहा है। सरकार को छोटे और सीमांत किसानों के लिए विशेष योजनाएं चलानी चाहिएं ताकि उनकी आय बढ़ सके। 

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