खाड़ी युद्ध में एक बड़ी चुनौती का सामना कर रहा है अमरीका
ईरान-इज़रायल-अमरीका के युद्ध के संदर्भ में टीवी की स्क्रीन पर नज़र डालेंगे तो बड़ी-बड़ी सुर्खियों में एक ही बात सामने आएगी : अमरीका ने यह कर दिया, इज़रायल ने वह कर दिया। ईरान का यह नेता मारा गया, ईरान का वह नेता मारा गया। ट्रम्प ने यह कहा, नेतन्याहू ने वह कहा। कभी-कभार यह भी सुनने-पढ़ने को मिल जाएगा कि ईरान जवाबी हमले कर रहा है। बस इतना ही। दरअसल, मीडिया पूरी तरह से अमरीका की तरफ झुका हुआ है। न केवल भारत का मीडिया, बल्कि ग्लोबल मीडिया भी। भारत की मोदी सरकार इस मामले में अमरीका की पिट्ठू सरकार बन चुकी है और मीडिया उसी की गोद में बैठा है। एक-दो अपवादों को छोड़ कर टीवी पर जो भी रिटायर्ड फौजी अफसर रक्षा विशेषज्ञ के रूप में पेश किये जा रहे हैं, वे मुसलमान और इस्लाम विरोध की बीमारी से पीड़ित हैं। उनकी बातें सुन कर ऐसा लगता है कि जैसे ईरान से उनकी कोई निजी रंजिश हो। विदेश सेवा का एक अधिकारी तो बड़े नाटकीय ढंग से ईरान के खिलाफ लगातार बोल रहा है। यह कहीं का राजदूत भी रह चुका है। यह वही बंदा है जो टीवी स्टूडियो में घुसते ही ड्रामा करने लगता है। रिटायर्ड फौजी अफसरों को देखते ही एड़ियां बजा कर उन्हें स्टूडियो में ही सेल्यूट मारता है। यह वही बंदा है जिसने रूस और यूक्रेन युद्ध शुरू होने पर मेरी आंखों के सामने टीवी स्टूडियो में फटाफट यह भविष्यवाणी कर दी थी कि ज़ेलेंस्की यूक्रेन छोड़ कर भाग गए हैं और पुतिन को 24-36 घंटे में फतेह मिलने वाली है। उसकी सारी बातें गलत निकलीं, लेकिन इसके बावजूद टीवी वाले छूटते ही उसे बुला लेते हैं, और वह अपने भौंडे साम्प्रदायिक राष्ट्रवाद का प्रदर्शन करने लगता है। मैंने एक बार पूछा कि भाई, इन महोदय का तो सारा आकलन मुंह के बल गिर चुका है तो एंकर ने हंस कर मुझसे कहा कि इन्हें बुलाना पड़ता है। यानी, विदेश नीति पर विवेक काटजू जैसे, पवन वर्मा जैसे विदेश सेवा के वरिष्ठ और विख्यात लोगों को नहीं बुलाएँगे, इसी मोदीपरस्त, अमरीकापरस्त ड्रामेबाज़ को बुलाया जाता रहेगा। जो भी हो, लबोलुआब यह है कि मीडिया से केवल यही आवाज़ें निकलती हुई सुनी जा सकती हैं कि अमरीका जीत रहा है।
इसमें कोई शक नहीं कि अमरीका बहुत शक्तिशाली है लेकिन यही शक्तिशाली अमरीका कई युद्धों में हार चुका है। मुंह छिपा कर भागा है। यह वियतनाम में अपमानजनक पराजय का सामना कर चुका है। यह अफगानिस्तान से मुंह छिपा कर भागा था। यह इराक में सालों तक फंसा रहा, लेकिन आज तक यह कहने की जुर्रत नहीं कर सका कि उसने इराक में जीत हासिल की थी। मेरा कहना है कि इतिहास अपने आपको दोहराने जा रहा है। अमरीका एक बार फिर ईरान युद्ध में बुरी तरह से फंस गया है। इस बार उसे इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी फंसाया है और अमरीका की राजनीति और कारपोरेट जगत को नियंत्रित करने वाली यहूदी लॉबी ने भी फंसाया है। ऊपर से ट्रम्प की अपनी दिक्कतें हैं, जिनसे बचने के लिए उसने जानबूझ कर नेतन्याहू के ट्रैप में फंसने से संकोच नहीं किया।
मेरा यह आकलन कुछ ऐसी आवाज़ों पर आधारित है जो मीडिया द्वारा प्रचारित इस एकतरफापन के बावजूद इस युद्ध का दूसरा पक्ष भी सामने रख रही हैं। ये आवाज़ें तथ्यों के आधार पर बोल रही हैं। इनमें एक है कर्नल डग मेकग्रेगर की जो अमरीकी रक्षा मंत्री के सलाहकार रह चुके हैं। उन्होंने एक के बाद एक कई इंटरव्यू दिये हैं जिनमें सिलसिलेवार बताया गया है कि ईरान की सामरिक रणनीति क्या है, और किस तरह से अमरीका की तमाम ताकत के बावजूद इस युद्ध में उसका हाथ हल्का नहीं बल्कि कई तरह से भारी पड़ रहा है। दूसरे हैं भारत के चिरपरिचित रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल जी.डी. बख्शी। जनरल बख्शी मोटे तौर पर मोदी सरकार के प्रति अपनी हमदर्दी के लिए ही जाने जाते हैं लेकिन इस युद्ध में वह जो कह रहे हैं, वह कुछ और है। वह सिलसिलेवार तरीके से ईरान की रणनीति की व्याख्या करते हुए बताते हैं कि इस युद्ध में आखिरी तौर से अफसोस अगर किसी को होगा तो वह ट्रम्प को ही होगा। तीसरे और हमारे चिरपरिचित रक्षा विशेषज्ञ हैं मेजर जनरल विशम्भर दयाल जो भारत की रक्षा नीति को ऐतिहासिक नज़रिये से देख कर अपना परिप्रेक्ष्य बनाते हैं और कुल मिला कर उनकी आवाज़ एक आलोचनात्मक आवाज़ है और यथार्थ पर आधारित है। आज मैं आपके सामने इन्हीं तीन आवाज़ों को एक के बाद एक पेश कर रहा हूँ। इनसे ईरान युद्ध की असलियत निकल कर सामने आती है।
सबसे पहले कर्नल डगलस मैकग्रेगर की बात करता हूँ। मैकग्रेगर रिटायर्ड हैं। ट्रम्प प्रशासन में ही सेक्रेटरी ऑफ डिफेंस या रक्षा मंत्री के सीनियर एडवाइजर रह चुके हैं। उन्होंने अमरीका-इज़रायल बनाम ईरान युद्ध पर काफी कड़ी व आलोचनात्मक टिप्पणियां की हैं। उन्होंने अपने हाल में दिये गये 4-5 साक्षात्कारों में जो बातें कही हैं, उन्हें इस प्रकार देखा जा सकता है।
1. कर्नल मैकग्रेगर के मुताबिक इस युद्ध में अमरीका की स्थिति काफी खराब है। ईरान ने खाड़ी क्षेत्र में सभी अमरीकी फौजी अड्डों को मिसाइल हमलों से बहुत नुकसान पहुँचाया है। इन फौजी अड्डों की संख्या कम से कम 27 है। ईरान ने अमरीका के गोदी और बंदरगाह इंफ्रास्ट्रक्चर को या तो तबाह कर दिया है या इस्तेमाल के लायक नहीं छोड़ा है। हालत यह है कि अमरीकी नेवी अब भारतीय पोर्ट्स (जैसे चाबहार या अन्य) पर निर्भर है। इसे अमरीका के लिए आदर्श और सुविधाजनक स्थिति नहीं कहा जा सकता है। कर्नल मैकग्रेगर का दावा है कि ईरान की ये सफलताएं शानदार हैं।
2. कर्नल मैकग्रेगर ने यह भी बताया है कि ईरान की जवाबी कार्रवाई इसलिए भी असरदार साबित हुई है कि चीन और रूस उसे सैटेलाइट इंटेलिजेंस दे रहे हैं। इससे ईरान की मिसाइलों और ड्रोन हमलों में सटीकता बढ़ी है—खासकर इज़रायल और अमरीका के अड्डों को ईरान ने सही निशानेबाज़ी के साथ हिट किया है।
3. कर्नल मैकग्रेगर ने ट्रम्प व इज़राइल की गलतियों पर भी अपनी उंगली रखी है। वह मानते हैं कि ट्रम्प को नेतन्याहू व इज़राइली लॉबी ने युद्ध में धकेला है। उन्होंने यहां तक कहा है कि नेतन्याहू को अमरीका की यहूदी लॉबी का समर्थन प्राप्त है। इस लॉबी ने धन के दम पर अमरीकी कांग्रेस और व्हाइट हाउस को तकरीबन खरीद रखा है। यही है वह लॉबी जिसने ट्रम्प को राष्ट्रपति बनाने के लिए जम कर धन खर्च किया था।
4. यह युद्ध बिना उकसावे के है और अमरीका ने इंटरनेशनल लॉ तोड़ा है। ट्रम्प ने गलत पूर्वानुमान लगाया है। खामेनेई के मरने से ईरान घुटने नहीं टेकेगा, बल्कि अमरीका लंबी घिसाई वाली लड़ाई में फंस जाएगा। अमरीका के मिसाइल स्टॉक और लॉजिस्टिक्स सीमित हैं, लंबे युद्ध के लिए तैयार नहीं। पब्लिक में भी लंबे युद्ध की इच्छा नहीं है। यह युद्ध अमरीका और इज़रायल के लिए बुरा अंत साबित होगा। नया मिडिल ईस्ट उभर रहा है, जहां ईरान जीतेगा और इज़रायल बच नहीं पाएगा या बहुत कमजोर हो जाएगा। होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बंद करने से तेल संकट पैदा हो चुका है। ग्लोबल इकोनॉमी झटके खा रही है। भारत के लिए भी इमरजेंसी की स्थिति है। चाबहार इन्वेस्टमेंट और ऑयल इंपोर्ट खतरे में है। रूस-चीन का स्पोर्ट ईरान को मजबूत बनाता है।
5. अमरीका की पोजीशन दुनिया में कमजोर हो रही है। यह युद्ध अमरीका की हालत गड़बड़ा सकता है। कुल मिलाकर, मैकग्रेगर इस युद्ध को ट्रम्प की बड़ी गलती मानते हैं, जो इज़रायल के एजेंडे से प्रभावित है। उन्होंने ईरान की दृढ़ता व जवाबी कार्रवाई को सराहा है, और अमरीका-इज़रायल की रणनीति को यथार्थ से कटा हुआ और विफलता के लिए अभिशप्त करार दिया है। इस लड़ाई की अमरीका को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।
दूसरी आवाज़ है मेजर जनरल जी.डी. बख्शी की। जनरल बख्शी ने भी ईरान की जवाबी कार्रवाई को बहुत शक्तिशाली, व्यापक और प्रभावी बताया है। वह इसे ईरान का बेरहम पलटवार और ज़बरदस्त प्रत्याक्रमण कह रहे हैं। वह यहां तक कहते हैं कि ईरान का यह हमला अमरीका-इज़रायल के शुरुआती हमलों की गलती की सजा है। इन हमलों में अयातुल्लाह खामेनेई और टॉप लीडरशिप को निशाना बनाया गया था। मेजर जनरल जी.डी. बख्शी की बातों को इस प्रकार समझा जा सकता है...
1. ईरानी हुकूमत केंद्रीकृत नहीं बल्कि विकेंद्रित है। इसलिए नेतृत्व की मौत से भी उसमें बिखराव नहीं होगा। इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स अब स्वतंत्र रूप से ऑपरेट कर रहा है, जो और भी खतरनाक है। बख्शी कहते हैं कि आई.आर.जी.सी. के पास इज़रायल को तबाह करने की क्षमता है और यह अब पूरी ताकत से इस्तेमाल हो रही है।
तीसरी आवाज़ मेजर जनरल विशम्भर दयाल की है। जनरल दयाल भारतीय सेना की आर्मर्ड कोर में थे। अब रक्षा विशेषज्ञ के रूप में विभिन्न टीवी चैनलों पर नियमित कमेंट्री करते हैं। उनके विचार मुख्य रूप से भारत की विदेश नीति, अंतर्राष्ट्रीय कानून और क्षेत्रीय प्रभाव पर केंद्रित रहते हैं। उनके प्रमुख विचार इस प्रकार हैं। इस युद्ध की शुरुआत इज़रायल ने की है। अमरीका और इज़रायल द्वारा ईरान में की गई कार्रवाइयों को उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया है। भारत इस युद्ध में ‘फंस गया’ है और भारत सबसे बड़ा नुकसान उठाने वाला है। खासकर चाबहार पोर्ट (जो भारत के लिए महत्वपूर्ण है) जैसे क्षेत्रों में युद्ध शुरू होने से भारत की रणनीतिक प्राथमिकताएं प्रभावित होती हैं। जनरल विशम्भर दयाल की सलाह है कि भारत को तटस्थ और संतुलित रवैया अपनाना चाहिए। उन्होंने याद दिलाया है कि इज़रायल और अमरीका ने गलवान घाटी में चीन के साथ हुई खूनी टक्कर पर भारत के पक्ष में एक भी वक्तव्य नहीं दिया था। ये लोग किसी भी संकट में भारत के साथ कभी नहीं देखे गये जबकि रूस लगातार भारत का दोस्त रहा है।
लेखक अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में प्ऱोफेसर और भारतीय भाषाओं के अभिलेखागारीय अनुसंधान कार्यक्रम के निदेशक हैं।



