स्मार्ट फोन के कारण बच्चों का भविष्य दांव पर

ऑस्ट्रेलिया ने 16 वर्ष तक के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर पाबंदी लगाई तो पूरी दुनिया में इस विषय पर चर्चा शुरू हो गई। ऑस्ट्रेलिया के बाद स्पेन, फ्रांस, ग्रीस, नॉर्वे जैसे देशों ने भी यही कदम उठाया। दक्षिण कोरिया ने इसके इस्तेमाल पर समय-सीमा लगा दी है। बच्चे देर रात इसका इस्तेमाल नहीं कर सकते। इसी तरह अमरीका के कुछ राज्यों ने कुछ पाबंदियां लगाई हैं और कुछ ने ऐसा ही करने के सुझाव दिए हैं। कुछ समाचार भारत से संबंधित हैं, जहां एक पिता ने अपनी बेटियों से मोबाइल फोन ले लिया तो तीनों बेटियों ने ऊंची इमारत से कूद कर आत्महत्या कर ली। यह घटना उत्तर प्रदेश के गाज़ियाबाद की है। हिमाचल के मुख्यमंत्री ने कड़ा फैसला लेते हुए सरकारी और गैर-सरकारी स्कूलों में फोन के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी है। यह फैसला 1 मार्च, 2026 से लागू हो गया है। इसका उद्देश्य पढ़ाई के प्रति विद्यार्थिर्यों की एकाग्रता बढ़ाना बताया गया है। यह पाबंदी स्मार्ट घड़ियों, टैबलेट और हेडफोन पर भी लागू होगी। 
मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि जब बच्चे स्मार्ट फोन पर अलग-अलग तरह के खेल खेलते हैं तो दिमाग से डोपामाइन हॉर्मोन (खुशी पैदा करने वाला) निकलते है। इस वजह से वे लंबे समय तक खेल खेलने में व्यस्त रहते हैं और असल जीवन और खुशी से कट जाते हैं। गाज़ियाबाद की घटना से पहले भोपाल के एक लड़के ने फोन गेम की वजह से आत्महत्या कर ली थी। तमिलनाडु और दिल्ली में भी ऐसी ही घटनाएं हुईं। तेलंगाना के एक 13 साल के लड़के ने ‘पबजी’ गेम की वजह से खुदकुशी की थी, क्योंकि उसके माता-पिता उसे फोन पर गेम खेलने से रोकते थे। हरियाणा, गुजरात और उत्तराखंड से भी ऐसे समाचार आ चुके हैं। दुनिया के सामने दो बड़े सवाल उभरे हैं—ऐसी स्थिति में माता-पिता क्या करें, कैसा व्यवहार करें कि बच्चों को ऐसे कदम उठाने से बचाया जा सके या समय रहते सरकारें ऑस्ट्रेलिया, स्पेन, फ्रांस, ग्रीस और नॉर्वे जैसे कड़े फैसले लें?
माता-पिता को सतर्क रहना होगा। उन्हें बच्चों के बदलते स्वभाव, व्यवहार और स्क्रीन टाइम पर नज़र रखनी होगी। स्मार्ट फोन पर वे क्या देखते हैं, ज़्यादातर समय कैसे व्यतीत हैं, इसे देखना और समझना होगा। अगर उनका स्वभाव चिड़चिड़ा और गुस्सैल होता जा रहा है तो उन्हें कल्पना की दुनिया से निकालकर असल ज़िन्दगी से जोड़ना होगा। डॉक्टर या विशेषज्ञ की मदद लेनी होगी। उन्हें खुले आसमान के नीचे अपने साथियों के साथ खेले जाने वाले खेलों से जोड़ना होगा। उनसे बात करके समय बिताना ज़रूरी है। अचानक पाबंदी या अचानक सख्ती से मामला बिगड़ सकता है। स्मार्ट फोन का विकल्प ज़रूरी है। ऐसा करके माता-पिता बड़ी सीमा तक बच्चों का स्क्रीन टाइम कम कर सकते हैं। हाल ही में छात्रों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा था कि छात्र तकनीक के गुलाम न बनें। मैरी वेनरचुक का कहना है कि सोशल मीडिया की लत नशे से ज़्यादा बुरी है। 
ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक 5 से 16 वर्ष की उम्र के 60 प्रतिशत से ज़्यादा बच्चों को स्मार्ट फोन की लत लग चुकी है। 11-14 वर्ष के 91 प्रतिशत बच्चों के पास फोन और इंटरनेट की सुविधा है। इस आयु वर्ग के बच्चे प्रतिदिन 4 से 6 घंटे स्मार्ट फोन का इस्तेमाल करते हैं। 
भारत में 64 प्रतिशत बच्चों को स्मार्ट फोन की लत लग चुकी है और ये औसतन 4-5 घंटे फोन पर व्यस्त रहते हैं। ज़्यादातर देशों में यह प्रतिशथ भारत से बहुत कम है। विशेषज्ञ मानते हैं कि 13 वर्ष की उम्र से पहले स्मार्ट फोन का इस्तेमाल अधिक नुकसानदायक है। इससे अनेक तरह की मानसिक समस्याएं पैदा होने की सम्भावना बनी रहती है। 

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