अदालतों का बोझ कम करने का प्रयास

राजस्थान सरकार ने जन विश्वास उपबंधों में संशोधन करते हुए 11 अधिनियमों में होने वाली जेल की सज़ा के स्थान पर अब जुर्माने का प्रावधान किया है। यह केन्द्र सरकार द्वारा 300 से अधिक कानूनों में संशोधन की दिशा में ही बढ़ता हुआ कदम माना जा सकता है। सरकार भले ही इसे ‘ईज ऑफ  लिविंग और ईज ऑफ  डूइंग’ बिजनस की दिशा में बढ़ता कदम बता रही हो, पर सही मायने में देखा जाएं तो न्यायालयों में बढ़ते मुकद्दमों के बोझ और छोटे-छोटे सामान्य श्रेणी के मुकद्दमों में भी वर्षों तक न्याय के इंतज़ार की वास्तविकता को समझते हुए उठाया गया व्यावहारिक कदम माना जाना चाहिए। 
अब जाने अनजाने वन क्षेत्र में मवेशी चरते हुए पकड़े जाने, व्यावसायिक प्रतिष्ठान को किसी कारणवश अधिक देरी तक खुला रखने, दस्तावेज़ प्रस्तुत करने में देरी, बिना लाइसेंस के भण्डारण, प्रक्रियात्मक त्रुटी और इसी तरह की अन्य गतिविधियों में जेल प्रावधानों के स्थान पर जुर्माने के प्रावधान से जहां एक और त्वरित कार्रवाई संभव हो सकेगी, खज़ाने में तत्काल राशि प्राप्त हो सकेगी वहीं न्यायालयों में मुकद्दमों के बोझ के साथ ही जेल में ज़मानत या निर्णय होने तक बंद रहने की स्थिति से दो-चार नहीं होना पड़ेगा। इससे एक बात और साफ हो जाती है कि समय और धन की बचत भी होगी। राजस्थान विधानसभा में जो संशोधन प्रावधान किये गये हैं, उनमें राजस्थान वन अधिनियम 1953, राजस्थान टेनेंसी अधिनियम 1955, राजस्थान वेयरहाउस अधिनियम1958, राजस्थान सहायता उद्योग अधिनियम1961, राजस्थान विद्युत शुल्क अधिनियम 1961, राजस्थान साहूकार अधिनियम 1963, राजस्थान गैर-सरकारी शैक्षिक अधिनियम 1989, राजस्थान स्टॉम्प अधिनियम 1998, राजस्थान नगरपालिका अधिनियम 2009 व राजस्थान जल आपूर्ति व सीवरेज अधिनियम 2018 में जेल की सज़ा के स्थान पर अब जुर्माने का प्रावधान किया गया है। अब भले ही जुर्माने की राशि को लेकर आलोचना-प्रत्यालोचना हो सकती है, परन्तु न्यायिक और प्रशासनिक सुधार की दृष्टि से इसे सकारात्म कदम माना जा सकता है। 
न्यायालयों में लंबित मुकद्दमों की बात की जाए तो केन्द्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय के गत वर्ष के आंकडों की ही माने तो देश के उच्च न्यायालयों और ज़िला न्यायालयों में ही 65 लाख से अधिक मुकद्दमे निर्णय के इंतज़ार में दशकों से प्रतीक्षारत है। उल्लेखनीय है कि 3 हज़ार से अधिक मामलें तो 50 साल भी अधिक समय से लंबित चल रहे हैं। दस साल या इससे अधिक समय से निर्णय का इंतज़ार कर रहे मुकद्दमों की ही बात करें तो यह संख्या इतनी अधिक है कि सोचने का मजबूर कर देती है। देश के 25 उच्च न्यायालयाें व राज्यों के जिला अदालतों में लंबित मुकद्दमों की बात की जाएं तो यह सामने आ रहा है कि 54 लाख 58 हज़ार 832 मुकद्दमे 10 से 20 साल की अवधि के हैं और निष्पादन का इंतजार कर रहे हैं। 20 से 30 साल और 30 से 40 साल की अवधि के निर्णय के इंतज़ार के मुकद्दमें भी लाखों में हैं। तस्वीर का एक पहलू यह भी है कि सालों से लोक अदालतें भी लग रही है परन्तु मुकद्दमों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। 
न्यायालयों में बढ़ते मुकद्दमों को लेकर न्यायपालिका और सरकार दोनों ही चिंतित है। सवाल यह भी है कि जिन मामलों को आसानी से प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत ही निपटाया जा सकता है उन्हें न्यायिक प्रक्रिया में लंबे समय तक उलझाये रखना किसी भी तरह से उचित नहीं माना जा सकता। इससे समय और धन दोनों का ही नुकसान होता है। 
सवाल यह भी उठता है कि कानून-कायदों का मतलब अपराध को रोकना होना चाहिए या कानूनी प्रक्रिया में ही उलझा कर लंबित रखते हुए बोझ बनाना होना चाहिए? ऐसी स्थिति में सरकार और वादी दोनों को ही कोई खास लाभ नहीं मिल पाता और न्यायालय का समेय भी व्यर्थ जाता है। ऐसे में जुर्माना लगाना और वसूली सुनिश्चित करना व्यावहारिक समाधान हो सकता है और यह इसी दिशा में बढ़ता कदम माना जाना चाहिए। न्यायिक प्रक्रिया में सुधार की दिशा में इसे अग्रगामी कदम माना जा सकता है। केन्द्र और राजस्थान सरकार की तरह अन्य प्रदेशों की सरकारों को भी इस दिशा में पहल करनी चाहिए।

-मो. 94142-40049

#अदालतों का बोझ कम करने का प्रयास