पेड़ गिरवी रख कर कज़र् लेगी महाराष्ट्र सरकार
महाराष्ट्र सरकार आर्थिक रूप से पूरी तरह दिवालिया हो चुकी है। उसके पास अपने दैनिक खर्च के लिए भी पैसे नहीं हैं। इस वजह से उसे अपने सागवान के पेड़ गिरवी रख कर कज़र् लेना पड़ रहा है। यह कोई मज़ाक की बात नहीं है। महाराष्ट्र सरकार के वरिष्ठ मंत्री गणेश नाईक ने खुद यह जानकारी दी है। उन्होंने कहा है कि सरकार के सामने पैसे का संकट है, इसलिए पेड़ गिरवी रख कर कज़र् लिया जाएगा। असल में महाराष्ट्र में पिछले चुनाव के समय ‘मुफ्त की रेवड़ी’ बांटने वाले जो फैसले हुए, उससे राज्य पर राजस्व का बड़ा बोझ पड़ा है। गणेश नाईक ने यह भी कहा कि ‘माझी लाड़की बहिन’ योजना की वजह से सरकार पर बड़ा वित्तीय दबाव है। इन योजनाओं की वजह से सरकार की विकास की परियोजनाएं ठप्प पड़ी हैं। यहां तक कि रूटीन के काम के लिए पैसे की कमी पड़ रही है। इसीलिए राज्य सरकार ने अपने सागवान के पेड़ गिरवी रखने का फैसला किया है। बताया जा रहा है कि पेड़ों की कीमत 12 हज़ार करोड़ रुपये के करीब आंकी गई है। उन पेड़ों को गिरवी रख कर सरकार 6 हज़ार करोड़ रुपये का कज़र् लेगी और उससे काम चलाएगी। अगर सुप्रीम कोर्ट ने जल्द सुनवाई करके ऐसी योजनाओं पर रोक नहीं लगवाई तो पता नहीं राज्य सरकारों को क्या-क्या गिरवी रखना पड़ेगा।
केजरीवाल को सब कुछ मिलेगा
पिछले कुछ सालों से दिल्ली के जंतर-मंतर पर रैली की अनुमति हासिल करना बहुत मुश्किल हो गया है। लेकिन अरविंद केजरीवाल को बड़ी रैली करने की इजाज़त मिल गई। हालांकि पहले दिल्ली पुलिस ने रैली करने की इजाज़त देने से इन्कार कर दिया था, लेकिन बाद में पता नहीं क्या हुआ कि इजाज़त दे दी गई। दरअसल इस समय केजरीवाल जो भी मांगेंगे वह उन्हें मिलेगा, क्योंकि अगले साल होने वाले सात राज्यों के चुनावों से पहले केजरीवाल को भाजपा विरोधी सबसे बड़ी ताकत के तौर पर स्थापित करना है। साथ ही कांग्रेस और उसके इकोसिस्टम की ओर से बनाए जा रहे इस वृत्तांत (नैरेटिव) को भी ध्वस्त करना है कि राहुल गांधी सबसे साहसी नेता हैं, जो मोदी पर हमले कर रहे हैं और इसलिए भाजपा से लड़ने वाला विपक्ष का चेहरा वे ही हैं। भाजपा चाहेगी कि केजरीवाल का चेहरा भी उभरे ताकि विपक्ष में फूट पड़े और कांग्रेस को अगले साल पंजाब, गोवा व गुजरात में नुकसान हो।
स्टालिन द्वारा भाजपा को झटका
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने भारतीय जनता पार्टी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को बड़ा झटका दिया है। अमित शाह पिछले कुछ समय से यह प्रयास कर रहे थे कि पूर्व मुख्यमंत्री ओ. पनीरसेल्वम को किसी तरह से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) में लाया जाए, लेकिन उनको लेकर दो तरह की समस्या थी। एक समस्या अन्ना डीएमके पर पूरा कब्ज़ा करके बैठे ई. पलानीस्वामी थे, जिन्होंने साफ कर दिया था कि वह पनीरसेल्वम को कबूल नहीं करेंगे। दूसरी ओर पनीरसेल्वम ने भी कहा था कि पलानीस्वामी को नेता घोषित करके चुनाव लड़ा गया तो वह शामिल नहीं होंगे। इस बीच उन्होंने मुख्यमंत्री स्टालिन से अपने तार जोड़ लिए थे। अब पनीरसेल्वम ने डीएमके का दामन थाम लिया है। बताया जा रहा है कि स्टालिन उनसे वादा किया है कि चुनाव जीतने के बाद उन्हें विधानसभा का स्पीकर बनाया जाएगा। पनीरसेल्वम ने पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा के लिए प्रचार किया था, जिससे मध्य व दक्षिण तमिलनाडु में कम से कम पांच सीटों पर भाजपा को फायदा हुआ था और वह दूसरे स्थान रही थी। पनीरसेल्वम थेवर समुदाय से आते हैं और मध्य व दक्षिण तमिलनाडु में बहुत प्रभाव रखते हैं। अब वे डीएमके से जुड़ गए हैं। वैसे भी डीएमके को दक्षिण तमिलनाडु में एक मज़बूत नेता की ज़रूरत थी। पनीरसेल्वम ने वह कमी पूरी कर दी है। ध्यान रहे थेवर कभी भी डीएमके समर्थक नहीं रहे हैं। अगर उनका कुछ भी वोट पनीरसेल्वम टांसफर कराते हैं तो डीएमके को उसका बड़ा लाभ मिलेगा।
अलग सीमांचल राज्य की चर्चा क्यों?
पिछले दिनों केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तीन दिन तक बिहार के सीमांचल की यात्रा पर थे। यह बहुत असामान्य बात है कि केंद्रीय गृह मंत्री किसी इलाके में इतना लम्बा प्रवास करे। अमित शाह नक्सल प्रभावित इलाकों में भी रूके हैं लेकिन सीमांचल का मामला थोड़ा अलग है। पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा और घुसपैठ को लेकर सीमांचल में कई बैठकें की थीं। इस बार भी उनके साथ केंद्र और राज्य के वरिष्ठ अधिकारी भी मौजूद थे। शाह की उस यात्रा और उन बैठकों के बाद ही अलग राज्य की चर्चा तेज हुई। हालांकि अभी तक इसका कोई ठोस प्रस्ताव सामने नहीं आया है, लेकिन यह अनायास नहीं था। बंगाल चुनाव को ध्यान में रख कर देखने पर इसका महत्व समझ में आता है। भाजपा ने घुसपैठ को बंगाल चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा बनाया है। इसीलिए अगर यह चर्चा चलती है कि बिहार के मुस्लिम बहुल इलाकों खास कर किशनगंज, अररिया, कटिहार और पूर्णिया के कुछ हिस्से को मिला कर पश्चिम बंगाल के मुस्लिम बहुल इलाकों मालदा और उत्तरी दिनाजपुर के साथ जोड़ कर अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाएगा तो इसका बड़ा मनोवैज्ञानिक असर बंगाल के मतदाताओं पर होगा। उत्तरी दिनाजपुर और मालदा दोनों किशनगंज और कटिहार से सटे हैं। अगर इन ज़िलों को मिला कर अलग केंद्र शासित प्रदेश बनता है तो वहां बहुसंख्यक आबादी जम्मू-कश्मीर जैसी होगी। वहां उप-राज्यपाल और सीमावर्ती राज्य होने की वजह से सेना और अर्धसैनिक बलों की तैनाती करके नियंत्रण रखा जा सकता है।
तमिलनाडु में भी पैसे बांट कर ही जीतेंगे
राजनीतिक विश्लेषक बेवजह बिहार, झारखंड या उत्तर भारत की गोबरपट्टी के राज्यों की आलोचना करते है कि वहां पैसे बांट कर चुनाव जीता जाता है। लोग गरीब हैं इसलिए सरकारें ‘मुफ्त की रेवड़ी’ बांट कर चुनाव जीत जाती है। असल में चुनाव जीतने का यह फॉर्मूला यूनिवर्सल हो गया है। विकसित राज्य भी इसका ही सहारा ले रहे हैं। महाराष्ट्र के बाद अब सबसे ज्यादा जीडीपी वाले राज्यों में से एक तमिलनाडु में भी यही तरीका आजमाया जा रहा है। वैसे तमिलनाडु में पहले से पैसे बांट कर वोट लिए जाते थे। लेकिन तब पार्टियां लोगों को चोरी छिपे नकद पैसे देती थी और सरकारें वाशिंग मशीन से लेकर प्रेशर कूकर और मंगलसूत्र तक बांटती थीं। इस बार के विधानसभा चुनाव से पहले राज्य की एम.के. स्टालिन सरकार ने सवा करोड़ महिलाओं के खाते में पांच-पांच हज़ार रुपये डाल दिए। इसके बाद मुख्य विपक्षी पार्टी अन्ना डीएमके की ओर से चुनावी वादों की घोषणा हुई तो पार्टी के नेता ई. पलानीस्वामी ने कहा कि सरकार बनी तो हर महिला के खाते में दस हज़ार रुपये भेजे जाएंगे। चुनाव की घोषणा तक और उसके बाद भी वहां और भी बहुत कुछ बांटे जाने की घोषणा सकती है।





