शिक्षा के मामले में भी एक राष्ट्र-नीति की ज़रूरत
आज भारत में एक देश-एक नीति कई क्षेत्रों में कायम है। मगर शिक्षा के मामले में यह आजादी के अमृत महोत्सव मनाए जाने के बाद भी कहीं नज़र नहीं आ रही। पूरे देश में एक राष्ट्र एक ‘कर’ के तहत ‘अप्रत्यक्ष कर’ को सरल बनाया गया तथा एक समान करने के लिए जीएसटी है। इसी तरह सस्ते राशन की व्यवस्था के लिए ‘एक राष्ट्र’ ‘एक राशन कार्ड’ है। देश में बिजली की निर्बाध आपूर्ति के लिए ‘एक राष्ट्र एक ग्रिड’ की व्यवस्था है। जबकि पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के नेतृत्व में इस पर मनन हो चुका है कि ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ कैसे कराए जाएं? इसी प्रकार एक जमाने में एक रुपए में पूरे देश में कहीं से फोन करने की सुविधा भी रही है। लेकिन हर राज्य में शिक्षा के लिए तीन-तीन प्रणालियां चल रहीं हैं। सीधी सी भाषा में कहें तो ‘एक देश एक शिक्षा नीति’ क्यों नहीं है? यह कब आयेगी, यह भी किसी को पता नहीं है? दिल्ली में आम आदमी की सरकार के दौर में सबसे अधिक चर्चित हुए थे सरकारी विद्यालय। कहा जाता है कि इनमें दाखिले के लिए लोग सिफारिश तक करवाते थे क्योंकि इनकी टीआरपी इतनी थी कि पूरे देश में इनकी मिसाल दी जाती थी। कई मौके तो ऐसे भी आए जब दूसरे राज्यों ने इनके जैसा बनने के लिए काम करना आरंभ किया। अब राजस्थान की सरकार भी निजी स्कूलों से मुकाबले के लिए यहां के सरकारी स्कूलों में परिवर्तन करने जा रही है। यह जानते हुए भी कि यहां के सरकारी स्कूलों की स्थिति इतनी खराब है कि कई जगहों पर उन्हें भैंसों के तबेले जैसा कहा जाता है।
फिलहाल बदलाव इस बात को लेकर हो रहा है कि यहां के सरकारी स्कूल भी एक अप्रैल से खुल जाएं ताकि वे प्राइवेट से मुकाबला कर सकें। कितनी हास्यास्पद बात है, एक राज्य में तीन-तीन शिक्षा प्रणालियां चल रही हैं और पूरे देश में एक शिक्षा नीति भी नहीं है लेकिन राजस्थान सरकार ने प्राइवेट स्कूलों से मुकाबले के लिए तलवार निकाल ली है। राजस्थान में बदलाव पर बात बाद में पहले यह जान लीजिए कि देश की शिक्षा नीति के हाल क्या हैं? प्राइवेट स्कूलों की बराबरी कैसे होगी, इस बात पर सोचने की फुर्सत उन नीति-नियंताओं को नहीं है जो दाखिले, मुफ्त की किताबें, बैग, भोजन, जूते-चप्पल तथा दूसरी फ्री सुविधाओं के दम पर नामांकन बढ़ाने को लालायित हैं। बोली-भाषा के इतने झगड़े हैं कि एक राज्य से दूसरे राज्य में जाने में भी आम जनता डरती है। इससे बड़ी शर्मशार करने वाली बात क्या होगी कि एक समय इस पर बहस चली थी कि सरकारी नौकरियों में राज्य के लोगों को ही प्राथमिकता दी जाए।
ऐसी स्थिति में एक शिक्षा नीति कैसे आएगी? देश में अभी तीन तरह के शिक्षा बोर्ड हैं। एक केन्द्रीय बोर्ड अर्थात सीबीएसई। दूसरा आईसीएसई और तीसरा राज्य शिक्षा बोर्ड। राज्य शिक्षा बोर्डों में राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश जैसे बोर्ड भी हैं, जो हमेशा चर्चा में रहते हैं। पूरे देश में यह मुहावरा भी चलता है कि यूपी-बिहार से पास होगा! खैर, एक शिक्षा नीति सरकार कब लाएगी? इस पर संसद-राज्यसभा तथा स्थानीय राज्य विधानसभा सौंध भी कभी बहस नहीं करते। भाषा विवाद का हाल यह है कि जैसे ही महाराष्ट्र या केरल में हिंदी की बात की जाती है तो उत्तर के लोगों के साथ मारपीट तथा भगाने जैसी घटनाएं होने लगती हैं। शिक्षा विशेषज्ञ बताते हैं कि केन्द्र सरकार की ट्रांसफर नीति भी इसमें अपना रोल निभाती है। केन्द्रीय विद्यालयों में उन बच्चों को तो दाखिला मिलता है, जिनके माता-पिता केन्द्र की नौकरी करते हैं पर उन्हें प्राथमिकता नहीं मिलती, जो दूसरे बोर्ड से, दूसरे शहर से पास होकर आते हैं।
आखिर एक राष्ट्र एक शिक्षा प्रणाली की नीति सरकार क्यों नहीं ला पा रही या क्यों नहीं आ रही? इस पर दो नजरियों से देखना होगा। एक यह कि देश के कई राज्यों की भाषाएं अलग-अलग हैं। यहां का कल्चर भी अलग है और यहां पर रहने वाले लोगों की ज़रूरत तथा कार्यप्रणाली सभी अलग-अलग हैं। ऐसी स्थिति में एक ही भाषा या एक ही कल्चर से कैसे काम चलेगा? तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल जैसे राज्य नई शिक्षा नीति-2020 के तहत राज्य मातृभाषा तथा तीन भाषा सूत्र जैसे प्रावधानों का विरोध करते हैं। सामाजिकता विविधता में केरल-उड़ीसा-बिहार की ज़रूरतें पूरी होना संभव नहीं हैं और सबसे बड़ी समस्या यह है कि दोनों केन्द्रीय और स्टेट बोर्डों के पाठ्यक्रम तथा मूल्यांकन प्रणालियां इतनी अलग हैं कि उनमें समानता के लिए लंबी एकता करनी होगी। राजस्थान बोर्ड के जानकार बताते हैं हर बोर्ड अपने सिलेबस पर काम करता है। सीबीएसई तो जब तब बदलाव करता है, पर स्टेट बोर्डों में बदलाव कम ही होता है। जो महत्वपूर्ण बात है, वह यह कि सीबीएसई पूरे भारत में एक तरह का ही पाठ्यक्रम रखता है जबकि हर स्टेट का पाठ्यक्रम क्षेत्रीय भाषाओं और संस्कृति को महत्व देते हैं। संभवत: भारत में विभिन्नता का जीवन ही एक शिक्षा प्रणाली लाने में बाधक है।
देश के सरकारी विद्यालयों में कम से कम एक लाख में बिजली नहीं है। पचास हजार से अधिक में पीने का पानी नहीं है। करीब 58 प्रतिशत में कम्प्यूटर नहीं हैं, 40 प्रतिशत में खेल मैदान नहीं हैं, लेकिन सरकारें हैं कि देश के 4.50 लाख से अधिक प्राइवेट स्कूलों से बराबरी का सपना देख रही हैं। यह कम मजेदार बात नहीं है कि देश में दस लाख से अधिक सरकारी स्कूल हैं लेकिन हर माता-पिता का सपना होता है कि उनका बच्चा प्राइवेट स्कूल में पढ़े। आखिर ऐसा हो भी क्यों नहीं, क्योंकि अब प्राइवेट स्कूल पढ़ाई के लिए कम, एयरकंडीशनर क्लास रूम, बसें और लग्जरी व्यवस्था के लिए अधिक चर्चित रहते हैं। हां, अगर एक शिक्षा नीति और एक व्यवस्था हो तो शायद प्राइवेट बनाम सरकारी का रोना खत्म हो सकेगा अन्यथा सरकारें हर वर्ष योजनाएं बनाती रहेंगी। वैसे घोषणा करने में जाता ही क्या है, सरकारें तो यही कर रही हैं।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



