अर्थ-हीनता में अर्थों की तलाश
ज़माना बदल गया है भाई साहिब, और आप अपनी खिड़की में से गुलमोहरों के झांकने का इंतज़ार करते रहे। आपने आजकल क्या लावारिस कुत्तों के काटने के डर से सड़कों या बाग-बगीचों में पैदल टहलना बंद कर दिया है? कुछ हद तक सही भी है। स्मार्ट शहरों की स्थापना के नाम पर अच्छे भले शहरों की सड़कों को तोड़ दिया जाता है, और इस टूट-फूट का उपहार चलने वालों को देकर स्मार्ट शहरों की रैंकिंग हो रही है, कि कौन-सा शहर अधिक टूटा है, जिसे आप अधबना कह कर छुटकारा पा लेते हैं।
लावारिस कुत्तों का हमारी ज़िंदगी में बड़ा हस्तक्षेप हो गया है। उनकी संख्या सीमित करने की कोशिश की तो महानगरों से लेकर मुफसिल कस्बों तक में पशु-प्रेमियों और जीवदया को समर्पित लोगों की बाढ़ आ गई, जिन्होंने लावारिस कुत्तों को समेटने या बंद करने की घोषणा के विरोध में न्याय परिसरों में याचिकाओं की इतनी बाढ़ लगा दी कि आजकल लगता है कि न्याय पालिका के स्तम्भ का ध्यान लावारिस, अर्थहीन और बेचारी ज़िंदगी जीते हुए लोगों की पीड़ा के निराकरण की बजाय इन लावारिस जन्तुओं की ओर अधिक हो गया है। कुत्तों की छोड़िये, यहां तो पहाड़ों की घुमावदार सड़कों पर लावारिस पशु दनदनाते हैं, और उनसे सुरक्षा करने की बजाय प्रशासन सड़कों पर चेतावनी की तख्तियां लगाने में जुटा है, ‘गाड़ी सावधानी से चलाएं, यहां अचानक प्रकट होने वाले लावारिस पशुओं की भरमार है, जो दिन-ब-दिन अधिक से अधिक कटखने होते जा रहे हैं।’
लेकिन यहां पहाड़ों की सड़कों पर ही क्यों, जीवन की घुमावदार सड़कों पर भी यही सिद्धांत लागू हो गया है, कि ‘सवारी अपने सामान की खुद ज़िम्मेदार है।’ अर्थात अगर छोटे चोरों से लेकर बड़े चोरों तक ने अपनी निधड़क लूट-खसूट के साथ आपके सब सिद्धांत और आदर्शों को चुरा कर नितांत सबके स्वार्थपरता से सफलता का सूत्र भेंट कर रहे हैं। जो न समझे वह अनाड़ी हैं। दर्भुग्य यही है कि इसे न समझ सकने वालों की बहुसंख्या जीवन की अंधेरी कोठरियों तक सिमट गई है, और इसकी समझ ऊंचे प्राचीरों के रौशनदान फानूसों में सिमट गई।
जनाब, यह समझ क्या है, जिसने जीवन के पुराने अर्थों को अर्थहीन कर दिया है, और नये अर्थों को स्थापित कर दिया है? देश में संस्कृति संरक्षण के नाम पर नई संस्कृतियों की स्थापना ज़ोर-शोर से शुरू हो गई है, और पुराने आदर्श सांस्कृतिक मूल्य बदलते जीवन में अपनी मौत आप मर गये हैं।
आजकल संस्कृतियां उतरती हैं हवाओं से की काव्य पंक्ति इस प्रकार सत्य सिद्ध हुई है, कि आज बदले हुए माहौल में जो नई संस्कृति सर्व-स्वीकार्य हुई, वह है शार्टकट संस्कृति। ‘इसका पहला सिद्धांत है कि अपनी हथेलियों को इतना उपजाऊ बना लो, कि यहां पर सरसों केवल उगती ही नहीं, उसकी खेती होती नज़र आये। संस्कृतियां ही नहीं, उनकी उप-संस्कृतियां उग रही हैं।’ शार्टकट संस्कृति की सहयोगी के नाम पर उभर आई है, सम्पर्क संस्कृति। पहले इस संस्कृति को जीवन में कोई भी काम करवाने के लिए दलालों और एजेटों की अनिवार्यता के नाम से जाना जाता था। आजकल नाम बदलने का ज़माना है न इसलिए इसे सम्पर्क संस्कृति का नाम दे दिया गया है। जीवन का कोई भी काम इनकी सीढ़ी के बिना नहीं होता। लेकिन यहां भी सोने की सीढ़ी लगती है। सोना क्योंकि आजकल बहुत महंगा हो गया है, इसलिए अब इसे दाम छदाम कह कर रुपयों का गालीचा कह दिया जाता है। इसे भेंट कर दो, इन दलालों की सहायता से सफलता रानी रुमकती चलती है।
पहले कहते थे ज्यों-ज्यों नौकरशाही और लालफीताशाही को लगाम लगाने की बात होती है, त्यों-त्यों फाइलों के चलने के लिए उनके नीचे चांदी के पहिये लगाने पड़ते हैं। अब चांदी के दाम भी बढ़ गये इसलिए क्रिप्टो करंसी का ज़माना आ गया, अर्थात पहिया लगा भी दो, लेकिन किसी को नज़र भी नहीं आये। ‘यहां सब चलता है’ के इस युग में कुछ भी अकथनीय या अकल्पनीय नहीं रह गया। उपलब्धि की गरिमा ही इसी में है कि वह अनाधिकारी का वरण करे, और बरसों से ईमानदारी के साथ इनके लिए खटते हुए लोग जीते जी आत्महत्या की भेंट हो जायें। वैसे यह आत्महत्या भी मानसिक विकृति के शीर्षक तले करनी पड़ती है, क्योंकि देश में सरकार ने किसी को भी भूख से आत्महत्या न करने दने की गारंटी बांट दी है। इसकी सफलता का अपना रिकार्ड बरसों से दुनिया में बांट रही है, कि अस्सी करोड़ लोगों को सस्ता राशन देने की प्रतिबद्धता अनन्त काल तक के लिए है। इस देश की विकास दर दुनिया में सर्वश्रेष्ठ होने की घोषणा के साथ-साथ सस्ता राशन बांटने का गरीबों के उपहार का रिकार्ड हर पांच साल में नई ज़िन्दगी पाता नज़र आ रहा है। आप इस अर्थहीनता में अर्थ की तलाश करते हैं, कि वह विकास आखिर गया कहां?
बहुत तलाश करने के बाद यह विकास आपको महा-धनियों की बहुमंज़िली इमारतों की छत पर पालथी मारे बैठा नज़र आता है, और बेकारों की भीड़ अर्थ और गरिमापूर्ण काम की तलाश में मुफ्तखोरी की अर्चना करती दिखायी देती है। यहां बिना काम आपके बैंक खातों में पैसे आ जाने के चुनाव एजेंडों की प्रतियोगिता लगी है। इनसे चमत्कृत होकर वोटरों की भीड़ उन बूथों पर लगी है, जहां मुफ्त की रेवड़ियां बांटने की घोषणाएं होती हैं। सांस्कृतिक पुरुष बताते हैं, हमने कर्म की जगह उदारता से रेवड़ियां बांटने को स्थापित कर दिया है। अब कल्याण ही कल्याण है।



