नेपाल की अंगड़ाई
पिछले वर्ष युवाओं ने कड़ा आन्दोलन करके के.पी. शर्मा ओली जो कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल के नेता थे, की सरकार को त्याग-पत्र देने के लिए विवश कर दिया था। उस समय ओली सरकार में नेपाल कांग्रेस भी सहयोगी थी। यह सरकार युवाओं के रोष के समक्ष टिक न सकी। नेपाल में दर्जन भर पार्टियां सक्रिय रही हैं। इनमें श्रम संस्कृति पार्टी, प्रोग्रैसिव डैमोक्रेटिव पार्टी और के.पी. शर्मा की कम्युनिस्ट पार्टी आदि राजनीतिक पार्टियां लोगों में अपना प्रभाव रखती थीं। नेपाल सैकड़ों वर्ष से राजशाही के प्रशासन में रहा था, परन्तु कुछ दशक पहले वहां उठी कम्युनिस्ट पार्टियों ने 20 वर्ष तक राजशाही के विरुद्ध हिंस आन्दोलन चलाया, जिसने राजशाही को जड़ से उखाड़ दिया था। उसके बाद हुए कई चुनावों में किसी भी पार्टी को बहुमत न मिल सका और मिली-जुली सरकारें बनती रहीं। ये लोगों को बड़ी सीमा तक सन्तुष्ट न कर सकीं। लम्बी कशमकश के बाद वर्ष 2015 में देश में नया संविधान बना, जिसके तहत भी अनेक बार चुनाव हुए।
कम्युनिस्ट नेताओं में पुष्प कमल दहल एक उभरती शख्सियत रहे, जो ओली की तरह कई बार प्रधानमंत्री बने, परन्तु यह सरकार भी लोगों को संतुष्ट न कर सकी। देश आर्थिक संकटों में फंसा रहा, जिस कारण ज्यादातर युवाओं को विदेशों में रोटी-रोज़ी के लिए जाना पड़ा। आज भी लाखों ही नेपाली भारत सहित अन्य देशों में रोटी-रोज़ी के लिए बसे हुए हैं। नेपाल की आर्थिकता आज भी मूलभूत रूप से कृषि आधारित ही है। भारत हमेशा से ही नेपाल का एक अच्छा पड़ोसी बना रहा है। बड़ा देश होने के कारण इसने नेपाल के मूलभूत ढांचे के निर्माण में बड़ा योगदान डाला है। चाहे विगत समय में इसके बड़े पड़ोसी चीन ने भी नेपाल में नए प्रोजैक्ट लगाए हैं और कई अन्य तरह से भी इसकी सहायता की है। इस कारण नेपाल की कई सरकारों का झुकाव चीन की ओर भी बढ़ा है। पिछले लगभग 70 वर्ष से यह सिलसिला चलता आ रहा है। कम्युनिस्ट सरकारों के गठन के बाद विशेष रूप से के.पी. शर्मा ओली के कई बार प्रधानमंत्री बनने के कारण इनका चीन की ओर अधिक झुकाव बना रहा, परन्तु यह बात निश्चित है कि भारत के सहयोग के बिना नेपाल आधा-अधूरा ही रहा है। भारत के साथ इसके संबंध बेहद नरम और सुखद बने रहे हैं। इसके बावजूद आज भी नेपाल में उद्योग प्रफुल्लित नहीं हो सका। चाहे लाखों की संख्या में पर्यटक यहां आते रहते हैं, जिनमें भारतीय अधिक होते हैं।
परन्तु वर्ष 2025 में जैन-ज़ी के आन्दोलन ने एक तरह से उक्त सभी ही स्थापित पार्टियों को नकार दिया था, जिसका परिणाम अब सामने आया है। युवा नेता बालेन्दर शाह की नई राष्ट्रीय स्वतंत्रता पार्टी ने चुनावों में भारी जीत प्राप्त की है। बालेन्दर शाह सिर्फ 35 वर्ष के युवक हैं, जो एक प्रसिद्ध रैपर भी रहे हैं और इसके साथ ही वह देश की राजधानी काठमांडू के मेयर भी चुने गए थे। वह इंजीनियर हैं, जिन्होंने भारत में भी पढ़ाई की थी। नेपाल के मतदाता लगभग पौने 2 करोड़ हैं। इसकी प्रतिनिधि सभा के कुल 275 सदस्य होते हैं। इनमें 165 सीधे चुनाव द्वारा और 110 सदस्य संसद में पार्टियों की हिस्सेदारी के हिसाब (प्रोपोरशनल प्रतिनिधित्व की विधि) से चुने जाते हैं। राजाशाही खत्म होने के बाद दशकों तक यहां राजनीतिक अस्थिरता बनी रही। अनेक बार सरकारें बनीं और टूटीं परन्तु अब तक कोई भी सरकार स्थिर नहीं बन सकी, जिससे यह उम्मीद की जाती कि वह देश की आर्थिकता को सहारा देने में सामर्थ्य हो सकेगी। इस बार यह ज़िम्मेदारी बालेन्दर शाह के नेतृत्व में नई सत्तारूढ़ हुई पार्टी पर पड़ी है, जिसे नेपाली मतदाताओं ने भारी समर्थन दिया है और पारम्परिक पार्टियों को एक तरह से हाशिये पर धकेल दिया है।
नि:संदेह नई सरकार के समक्ष बेहद चुनौतियां हैं। लोगों को उम्मीद है कि यह सरकार गहनता और गम्भीर ढंग से दरपेश चुनौतियों से निपटने में समर्थ हो सकेगी। भारत सरकार ने नई सरकार के गठन पर न सिर्फ उसे शुभकामनाएं ही भेजी हैं, अपितु इसके साथ ही पहले की भांति इस सरकार को पूरी तरह से सहयोग देने का विश्वास भी दिया है, जिसे आधार बना कर वह आगे बढ़ सकती है। ऐसा तभी सम्भव हो सकता है, यदि नेपाल अपने दोनों बड़े पड़ोसियों भारत और चीन के साथ पूरा-पूरा संतुलन बना कर चलने में सफल हो सके। यह नीति देश को आगे बढ़ाने में बहुत सीमा तक सहायक हो सकती है।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

