बच्चें को प्रत्येक पक्ष से कमज़ोर कर रहा फास्ट फूड
21वीं सदी की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में इंसान इतना व्यस्त है कि उसके पास अपनी सेहत और खान-पान पर ध्यान देने के लिए एक पल भी नहीं है। यही कारण है कि फास्ट फूड (ऐसा भोजन जो जल्द तैयार हो जाता है और जिसे चलते-फिरते भी खाया जा सकता है) का चलन तेज़ी से बढ़ा है। आज हर शहर और गांव में बर्गर, पिज्जा, मोमोज, नूडल्स और कोल्ड ड्रिंक जैसी चीजें आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं, जो हमारे पारम्परिक और पौष्टिक आहार की जगह ले रही हैं। फास्ट फूड का आधार मैदा है। आटा बनाने की प्रक्रिया में गेहूं के सभी पोषक तत्व और फाइबर नष्ट हो जाते हैं। यह आटा शरीर के अंदर जाकर आंतों में फंस जाता है, जिससे ‘लीकी गट सिंड्रोम’ जैसी समस्याएं हो जाती हैं और विषाक्त पदार्थ सीधे खून में पहुंच जाते हैं। फास्ट फूड में सबसे खराब प्रकार की वसा यानी ट्रांस फैट का उपयोग होता है। एक ही तेल में बार-बार चीजें तलने से तेल ज़हरीला हो जाता है, जिससे हृदय की धमनियां बंद हो जाती हैं। उच्च तापमान पर तले हुए खाद्य पदार्थ (जैसे फ्रैंच फ्राइज़) ‘एक्रिलामाइड’ नामक रसायन पैदा होता है, जो कैंसर का कारण बन सकता है। फास्ट फूड में सामान्य से 5 से 10 गुना ज्यादा नमक होता है। यह अतिरिक्त नमक शरीर में जल प्रतिधारण का कारण बनता है, जिससे रक्तचाप बढ़ जाता है। लंबे समय तक ऐसा खाना खाने से हृदय घात का खतरा 80 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। कोल्ड ड्रिंक और विभिन्न सॉस में मौजूद ‘फ्रुक्टोज कॉर्न सिरप’ के कारण लीवर में सूजन और लीवर सिरोसिस जैसी जीवन-घातक स्थिति पैदा होती है। कोल्ड ड्रिंक में मौजूद ‘फॉॅस्फोरिक एसिड’ शरीर से कैल्शियम को खत्म कर देता है। इससे बच्चों की हड्डियां कमज़ोर हो जाती हैं और दांत खराब हो जाते हैं। खाने का स्वाद बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अजीनोमोटो और कृत्रिम रंग मस्तिष्क की कोशिकाओं को नुकसान पहुंचाते हैं।
फास्ट फूड का सबसे पहला और सबसे स्पष्ट दुष्प्रभाव मोटापा है। एक फास्ट फूड भोजन में निहित 1200-1500 कैलोरी को जलाने के लिए 4-5 घंटे के निरंतर व्यायाम की आवश्यकता होती है, जिसकी कमी के कारण यह अतिरिक्त ऊर्जा वसा के रूप में जमा हो जाती है। यह चक्र केवल बाहरी दिखावे तक ही सीमित नहीं है, बल्कि रक्त शर्करा का स्तर बढ़ने से अग्न्याशय पर बहुत अधिक दबाव पड़ता है। परिणामस्वरूप, शरीर इंसुलिन का सही ढंग से उपयोग करने में असमर्थ हो जाता है, जो आज बच्चों में बढ़ रहे मधुमेह का मुख्य कारण है। इसके अलावाए फास्ट फूड खराब कोलेस्ट्रॉल को बढ़ा कर धमनियों को सख्त कर देता है, जिससे हृदय को रक्त पम्प करने में अधिक मेहनत करनी पड़ती है और दिल का दौरा पड़ने का खतरा बढ़ जाता है। शून्य फाइबर पाचन तंत्र को प्रभावित करता है जिससे कब्ज़ से लेकर पेट के कैंसर तक की बीमारियों का खतरा पैदा हो जाता है।
हैरानी की बात यह है कि इसका असर मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ता हैय जंक फूड खाने वालों में अवसाद का खतरा 51 प्रतिशत तक बढ़ जाता है और यह मस्तिष्क के सीखने और याददाश्त वाले हिस्सों को भी खराब करता है। जंक फूड का असर सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह बच्चों के मानसिक विकास पर भी गंभीर असर डाल रहा है। शोध के अनुसार इस तरह के आहार से बच्चों में ‘अटेंशन डेफिसिट हाइपर-एक्टिविटी डिसऑर्डर’ के लक्षण पैदा होते हैं, जिसके कारण बच्चों में चिड़चिड़ापन, जल्दी गुस्सा होना और पढ़ाई में एकाग्रता की कमी जैसी समस्याएं आम होती जा रही हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक पहलू यह है कि फास्ट फूड में ‘ज़ेनो-एस्ट्रोजेन’और अतिरिक्त वसा शरीर के प्राकृतिक हार्मोन संतुलन को बाधित करते हैं। फास्ट फूड एक रंगीन और स्वादिष्ट जाल है, जो देखने में तो आकर्षक लगता है, लेकिन इसके आंतरिक परिणाम भयानक होते हैं।
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