अविश्वास प्रस्ताव की राजनीति तथा लोकतांत्रिक मूल्य
भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण संस्था संसद है, जहां न केवल कानून बनते हैं बल्कि राष्ट्र की दिशा और दशा पर गंभीर विमर्श भी होता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था का मूल आधार यही है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों अपनी-अपनी भूमिका को लोकतांत्रिक तरीके से ज़िम्मेदारी, संयम और मर्यादा के साथ निभाएं, यह नितांत अपेक्षित है। किंतु हाल के दिनों में जिस तरह से लोकसभा में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के खिलाफ विपक्ष द्वारा लाया गया अविश्वास प्रस्ताव चर्चा में आया, उसने एक बार फिर यह प्रश्न उत्पन्न कर दिया कि क्या विपक्ष वास्तव में संसदीय मर्यादा और लोकतांत्रिक ज़िम्मेदारियों को लेकर गंभीर है या वह केवल स्वार्थ की राजनीतिक करने के लिए ऐसे कदम उठा रहा है। लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाना एक गंभीर संसदीय कदम माना जाता है। यह केवल राजनीतिक विरोध का साधन नहीं होता, बल्कि इसके पीछे ठोस तर्क, गंभीर आरोप और व्यापक समर्थन होना अपेक्षित होता है। किंतु जिस प्रकार विपक्ष ने यह प्रस्ताव लाया और बाद में उसकी गंभीरता का अभाव दिखाया, उसने इस पूरी प्रक्रिया को प्रश्नों के घेरे में खड़ा कर दिया। जब यह प्रस्ताव ध्वनि मत से खारिज हुआ तो विपक्ष ने मतदान की मांग तक नहीं की। यदि विपक्ष को अपने प्रस्ताव पर पूरा विश्वास होता और उसे लगता कि वह सदन का समर्थन प्राप्त कर सकता है, तो वह निश्चित रूप से मत विभाजन की मांग करता। लेकिन ऐसा न होना इस तथ्य को ही पुष्ट करता है कि विपक्ष स्वयं भी जानता था कि यह प्रस्ताव पारित होने की स्थिति में नहीं है।
इससे भी अधिक आश्चर्यजनक स्थिति तब देखने को मिली जब प्रस्ताव पर चर्चा का अवसर आया तो विपक्ष ने स्वयं उस पर चर्चा करने के बजाय पश्चिम एशिया के संकट पर बहस की मांग शुरू कर दी। यह विषय निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, किंतु यदि विपक्ष ने स्वयं लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया था तो उसे पहले उसी पर गंभीर चर्चा करनी चाहिए थी। सरकार की ओर से भी यह स्पष्ट किया गया कि वह अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर चर्चा से पीछे नहीं है, लेकिन संसद की कार्यवाही को नियमों और प्राथमिकताओं के अनुसार चलाना आवश्यक है। इस पूरे घटनाक्रम ने यह संकेत दिया कि विपक्ष विशेष रूप से कांग्रेस अपने ही प्रस्ताव को लेकर गंभीर नहीं थी। इस अवसर पर ही नहीं, अनेक अवसरों पर उसने गैर-ज़िम्मेदारी एवं बचकानेपन का एहसास कराया है। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वह सरकार की नीतियों की समीक्षा करता है, उसकी गलतियों को उजागर करता है और वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत करता है। किंतु जब विपक्ष केवल राजनीतिक आरोपों और शोर-शराबे तक सीमित रह जाए तो लोकतांत्रिक विमर्श कमज़ोर पड़ने लगता है। यहां सत्ता-पक्ष के लिये भी यह ध्यान देने वाली बात है कि आखिर विपक्ष को ऐसा क्यों लग रहा है कि उसकी बातों को अनसुना किया जाता है? पक्ष एवं विपक्ष दोनों को ही विश्वास, समन्वय एवं सौहार्द बनाये रखते हुए ही आगे बढ़ना होगा।
नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का व्यवहार भी कई बार संसदीय मर्यादाओं के संदर्भ में चर्चा का विषय बना है। यह सच है कि विपक्ष के नेता के रूप में उन्हें सरकार की आलोचना करने और अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि संसदीय नियमों और परंपराओं को दरकिनार कर दिया जाए। संसद की कार्यवाही स्पष्ट नियमों और प्रक्रिया के तहत चलती है और इन नियमों का पालन करना हर सांसद की ज़िम्मेदारी है। बीते कुछ समय से राहुल गांधी संसद के भीतर और बाहर यह आरोप लगाते रहे हैं कि अमरीका के साथ व्यापार समझौते के मामले में प्रधानमंत्री ने समर्पण कर दिया है। इस तरह के आरोपों को उन्होंने कई मंचों पर दोहराया है, किंतु इन दावों के समर्थन में ठोस तथ्य प्रस्तुत नहीं किए गए। इसी प्रकार उन्होंने चुनाव आयोग पर भी यह आरोप लगाया कि वह मतदाता सूचियों के विशेष पुनरीक्षण के माध्यम से सत्तारूढ़ दल को लाभ पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। ऐसे आरोप लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगाने वाले होते हैं और यदि इन्हें प्रमाणों के बिना बार-बार दोहराया जाए तो यह लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए भी उचित नहीं माना जा सकता।
इसी संदर्भ में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में विस्तार से यह बताया कि लोकसभा अध्यक्ष पर बोलने का अवसर न देने का आरोप लगाने वाले राहुल गांधी ने स्वयं कई महत्वपूर्ण विधेयकों पर चर्चा में भाग नहीं लिया। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि संसद के विभिन्न सत्रों के दौरान उनकी उपस्थिति अपेक्षाकृत कम रही है और कई बार महत्वपूर्ण बहसों के दौरान वे विदेश यात्राओं पर रहे। इन तथ्यों को सामने रखते हुए यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि यदि संसद में सक्रिय भागीदारी ही कम होगी तो संसदीय विमर्श को प्रभावी कैसे बनाया जा सकेगा। जहां तक लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का प्रश्न है, उनका कार्यकाल कई दृष्टियों से उल्लेखनीय रहा है। उन्होंने सदन की कार्यवाही को संतुलित, संयमित और नियमबद्ध ढंग से संचालित करने का प्रयास किया है। उनके नेतृत्व में संसद की कार्यवाही को अधिक उत्पादक बनाने की दिशा में कई प्रयास किए गए। उन्होंने सांसदों को समयबद्ध तरीके से बोलने का अवसर देने, युवा सांसदों को अधिक सक्रिय करने और संसदीय समितियों की भूमिका को मज़बूत बनाने पर विशेष ध्यान दिया।
लोकसभा अध्यक्ष के खिलाफ लाया गया यह अविश्वास प्रस्ताव भी इसी प्रवृत्ति का एक उदाहरण प्रतीत होता है। जब विपक्ष स्वयं अपने प्रस्ताव को गंभीरता से आगे नहीं बढ़ाता, तो यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति उसकी प्रतिबद्धता पर प्रश्न खड़े करता है। लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है, बल्कि वह आवश्यक भी है, लेकिन असहमति को ज़िम्मेदारी और तर्कसंगतता के साथ व्यक्त किया जाना चाहिए। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की यह ज़िम्मेदारी है कि वे संसद को टकराव का मंच बनाने के बजाय संवाद का मंच बनाएं। यदि संसद में गंभीर बहसें होंगी, तथ्यात्मक तर्क प्रस्तुत किए जाएंगे और नीतियों पर सार्थक चर्चा होगी, तभी लोकतंत्र मज़बूत होगा। आज आवश्यकता इस बात की है कि संसद की गरिमा और लोकतांत्रिक मूल्यों को सर्वोपरि रखा जाए।
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