उपभोक्ता के अधिकारों की सुरक्षा प्रत्येक सरकार की ज़िम्मेदारी
विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस पर विशेष
आधुनिक वैश्विक अर्थव्यवस्था में उपभोक्ता केवल बाज़ार का हिस्सा नहीं बल्कि उसके केंद्र में स्थित वह शक्ति है, जिसके भरोसे व्यापार, उद्योग और सेवा क्षेत्र की पूरी व्यवस्था चलती है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज में उपभोक्ताओं के अधिकारों की सुरक्षा और उन्हें सुरक्षित, गुणवत्तापूर्ण तथा विश्वसनीय उत्पाद उपलब्ध कराना सरकारों और संस्थाओं की प्राथमिक ज़िम्मेदारी मानी जाती है। इसी उद्देश्य से 15 मार्च को ‘विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस’ मनाया जाता है, जो उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा और जागरूकता का वैश्विक अभियान है। इस वर्ष इस दिवस की थीम ‘सुरक्षित उत्पाद, आश्वस्त उपभोक्ता’ इस बात पर ज़ोर देती है कि बाज़ार में उपलब्ध हर वस्तु और सेवा सुरक्षित, भरोसेमंद और गुणवत्ता-मानकों के अनुरूप होनी चाहिए ताकि उपभोक्ता आत्मविश्वास के साथ खरीदारी कर सकें।
आज का उपभोक्ता केवल किसी दुकान से वस्तु खरीदने वाला व्यक्ति नहीं है बल्कि वह डिजिटल बाजार, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म, मोबाइल ऐप, ऑनलाइन भुगतान प्रणालियों और वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं से जुड़ा एक सक्रिय आर्थिक नागरिक बन चुका है। ऐसे में उपभोक्ता संरक्षण की चुनौतियां भी पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल हो गई हैं। नकली उत्पादों, भ्रामक विज्ञापनों, ऑनलाइन धोखाधड़ी, डेटा दुरुपयोग, घटिया गुणवत्ता वाली वस्तुओं और अनुचित व्यापार प्रथाओं ने उपभोक्ताओं के सामने नए खतरे खड़े किए हैं। इसलिए उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा के लिए मजबूत कानून, प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र और तकनीकी नवाचार की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। 15 मार्च, 1962 को अमरीकी राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी ने अमरीकी कांग्रेस में उपभोक्ता अधिकारों पर एक ऐतिहासिक भाषण दिया था, जिसमें उन्होंने पहली बार औपचारिक रूप से उपभोक्ताओं के चार मूलभूत अधिकार (सुरक्षा का अधिकार, जानकारी का अधिकार, विकल्प का अधिकार और सुने जाने का अधिकार) प्रतिपादित किए थे। उसी ऐतिहासिक भाषण की स्मृति में 1983 से 15 मार्च को विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।
भारत में भी उपभोक्ता संरक्षण की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जाती रही है। स्वतंत्रता के बाद तेजी से बढ़ते औद्योगिकीकरण और बाज़ार विस्तार के साथ-साथ उपभोक्ताओं के शोषण की घटनाएं भी सामने आने लगी। इस समस्या से निपटने के लिए वर्ष 1986 में ‘उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम’ लागू किया गया, जिसने पहली बार उपभोक्ताओं को कानूनी सुरक्षा प्रदान की थी। इसके बाद वर्ष 2019 में नया ‘उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम’ लागू किया गया, जिसने उपभोक्ता अधिकारों को और अधिक व्यापक तथा प्रभावी बनाया।
इस नए कानून के तहत उपभोक्ता संरक्षण व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण सुधार किए गए। इनमें सबसे उल्लेखनीय कदम ‘केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण’ (सीसीपीए) की स्थापना है, जिसे भ्रामक विज्ञापनों, अनुचित व्यापार प्रथाओं और उपभोक्ता अधिकारों के उल्लंघन के मामलों की जांच तथा कार्रवाई का अधिकार दिया गया है।
वर्तमान समय में उपभोक्ता संरक्षण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू डिज़िटल बाज़ार और ई-कॉमर्स से जुड़ा है। ऑनलाइन खरीदारी के बढ़ते चलन ने उपभोक्ताओं के लिए सुविधाएं तो बढ़ाई हैं, लेकिन साथ ही कई नई समस्याएं भी पैदा की हैं। कई बार उपभोक्ताओं को घटिया या नकली उत्पाद मिल जाते हैं, डिलीवरी में अनावश्यक देरी होती है या रिफंड और रिटर्न की प्रक्रिया जटिल हो जाती है। इन चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार ने ई-कॉमर्स को भी उपभोक्ता कानून के दायरे में शामिल किया है।
-मो. 94167-40584



