किसानों के लिए महत्वपूर्ण हैं किसान शिविर और मेले

कृषि के पक्ष से मार्च का महीना और इस दौरान लगने वाले किसान शिविर और मेले बहुत महत्वपूर्ण हैं। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय द्वारा नागकलां जहांगीर (अमृतसर), रौणी (पटियाला) और बल्लोवाल सौंखड़ी (शहीद भगत सिंह नगर) में किसान मेले लगाए जा चुके हैं। आज इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीच्यूट (आईएआरआई) तथा पंजाब यंग फार्मर्स एसोसिएशन की ओर से रखड़ा (पटियाला) में किसान शिविर (मिन्नी मेला) लगाया जा रहा है। यहां आईएआरआई द्वारा विकसित बासमती और धान के पूसा बासमती-1509, पूसा बासमती-1401, पूसा बासमती-1885 तथा कम समय में पकने वाली और ज़्यादा उत्पादन देने वाली धान की पूसा-2090 और पूसा-1824 किस्मों के संशोधित बीज किसानों को दिए जाएंगे। इस मिन्नी मेले की अध्यक्षता डॉ. सी. एच. श्रीनिवासा राव निदेशक एवं उपकुलपति आईसीएआर (इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीच्यूट नई दिल्ली) करेंगे। उनके साथ किसानों से सम्पर्क करने के लिए संयुक्त निदेशक (अनुसंधान) डा. विश्वनाथन सी तथा अन्य विशेषज्ञ भी आ रहे हैं। वे आईएआरआई द्वारा विकसित तकनीक के बारे में किसानों से प्रतिक्रिया लेंगे ताकि पूसा द्वारा की गई खोज पंजाब के किसानों को लाभ पहुंचा सके और उनकी ज़रूरत संबंधी आईएआरआई के वैज्ञानिक जानकारी ले सकें।
पीएयू द्वारा फरीदकोट में भी आज किसान मेला लगाया जा रहा है। लुधियाना पीएयू परिसर में मुख्य मेला 20-21 मार्च को, बठिंडा में 24 मार्च को और गुरदासपुर में अंतिम मेला 27 मार्च को लगया जाएगा। ये किसान मेले और शिविर किसानों को खरीफ  की मुख्य फसल धान के संशोधित बीज उपलब्ध करने के अलावा खरीफ की अन्य फसलों संबंधी जानकारी भी देते हैं। किसानों की राय पर पिछली अनुसंधान विधियों का मूल्यांकन भी होता है, जिससे वैज्ञानिकों को उनकी सफलता और किसानों की ज़रूरतों के बारे में जानकारी मिलती है। नई कृषि तकनीकों एवं अनुसंधान विधियों का प्रदर्शन भी इन मेलों तथा शिविरों में किया जाता है। ये किसान मेले और शिविर कृषि विशेषज्ञों, वैज्ञानिकों और किसानों का संयोजन होते हैं। इन मेलों और शिविरों में किसान एक-दूसरे के साथ विचार-विमर्श करते हैं। इससे किसानों को अपनी समस्याओं का समाधान और वैज्ञानिकों को अनुसंधान के लिए प्रतिक्रिया मिलती है। इन मेलों में वैज्ञानिकों द्वारा किसानों के सवालों के जवाब भी दिए जाते हैं। 
आम किसान इन मेलों में अच्छी गुणवत्ता वाले बीज खरीदते हैं। धान खरीफ की मुख्य फसल है। किसान इसकी विभिन्न किस्मों के बीज इन मेलों से खरीदते हैं। इन मेलों से खरीदे गए बीजों की उगने की शक्ति ज़्यादा होती है और ये आम तौर पर रोग-मुक्त होते हैं। ये उत्पादन में वृद्धि करते हैं। 
32 लाख हेक्टेयर रकबे के लिए किसान खास तौर पर धान और बासमती के बीज पाने के लिए उत्सुक हैं। अन्य फसलों के मुकाबले अधिक मुनाफा देने के कारण किसान धान को नहीं छोड़ रहे। सरकार द्वारा हर साल धान का रकबा कम करने की कोशिश की जाती है, लेकिन यह कम होने के बजाय बढ़ता जा रहा है। पिछले सालों में कुछ रकबा बासमती की काश्त के अधीन ज़रूर आया है, जिससे पानी की कुछ बचत हुई है, क्योंकि पूसा बासमती-1509 जैसी बासमती किस्में कई बार बारिश के पानी से पक जाती हैं। फिर धान की सरकारी खरीद और एमएसपी के कारण इसके मंडीकरण में भी ज़्यादा मुश्किल नहीं आती।
गांवों में, खासकर छोटे और सीमांत किसानों तक नई अनुसंधान पर आधारित तकनीक पहुंचाने के लिए विशेषज्ञ स्टाफ की कमी है। किसान मेले और शिविर ही इस कमी को पूरा करते हैं। वैज्ञानिकों और अनुसंधान संस्थानो ने इन किसान मेलों और शिविरों को किसानों तक नई तकनीक और बीज पहुंचाने का एक आधार बनाया है। प्रबंधकों को चाहिए कि वे इन मेलों और शिविरों को राजनीति और व्यापार का केन्द्र न बनने दें। दूरवर्ती गांवों से आने वाले किसान वैज्ञानिकों के साथ सम्पर्क चाहते हैं, राजनीतिक भाषण और व्यापार करने वाली दुकानों नहीं। किसानों को इन मेलों के ज़रिए धान और बासमती की किस्मों के चयन संबंधी वैज्ञानिकों की सिफारिशें माननी चाहिएं तथा प्रमाणित संस्थाओं के विक्रेताओं और कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा विकसित किस्मों के बीज ही खरीदने चाहिएं। 
इन किसान मेलों में वैज्ञानिक पानी की बचत के दृष्टिगत किसानों तक धान तथा बासमती संबंधी योग्य किस्मों और तकनीक को पहुंचाकर उन्हें अधिक से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के योग्य बनाएं, ताकि उनकी आय में वृद्धि हो सके। 


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