सत्तारूढ़ दलों के लिए अग्नि-परीक्षा होंगे आगामी विधानसभा चुनाव

एक ऐसे समय पर जब समूचा विपक्ष एकजुट होकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध महाभियोग लाने की तैयारी कर रहा है, ठीक उसी समय देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने बीती 15 मार्च 2026 को देश की राजधानी नई दिल्ली में पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल, असम और केंद्र शासित प्रदेश पुड्डुचेरी के विधानसभा चुनावों की घोषणा की। इनमें से पश्चिम बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को वोटिंग होगी, तमिलनाडू में एक ही बार 23 अप्रैल को, केरल और असम में भी एक ही बार 9 अप्रैल को और इन्हीं के साथ केंद्र शासित प्रदेश पुड्डुचेरी में भी 9 अप्रैल को ही वोटिंग होगी। सभी प्रदेशों में मतगणना आगामी 4 मई को होगी। पश्चिम बंगाल में नामांकन के लिए 2 और 9 अप्रैल तथा नामांकन वापसी के लिए 13 अप्रैल की तारीख निश्चित है, जबकि तमिलनाडु में नामांकन 30 मार्च से 6 अप्रैल के बीच तथा नामांकन वापसी के लिए 9 अप्रैल तथा केरल, असम व केंद्रशासित प्रदेश पुड्डुचेरी के लिए नामांकन 16 से 23 मार्च व नामांकन वापसी के लिए 26 मार्च की तारीख तय है।
इन सभी राज्यों में ये अब तक के सबसे तेज रफ्तार चुनाव हैं। साल 2021 में 34 दिनों में, साल 2016 में 43 दिनों में, साल 2011 में 36 दिनों और साल 2006 में 35 दिनों में वोटिंग हुई थी। इस बार वोटिंग के लिए कुल 21 दिन हैं। पिछले 20 सालों में इससे तेज चुनाव प्रक्रिया कभी सम्पन्न नहीं हुई। ये विधानसभा चुनाव इसलिए भी खास हैं, क्योंकि तमिलनाडू को छोड़कर सभी चार राज्यों में जो सरकारें हैं, वे एक से ज्यादा बार लगातार सत्ता पर काबिज सरकारें हैं। पश्चिम बंगाल में ममता सरकार लगातार तीन बार सत्ता में रहने के बाद अगर जीतेंगी, तो चौथी बार सत्ता में प्रवेश करेंगी जबकि केरल में मौजूदा वाम गठबंधन सरकार अगर जीती तो तीसरी बार सरकार बनाने के लिए उतरेगी। असम में एनडीए लगातार तीसरी और पुड्डुचेरी में दूसरी बार सरकार बनाने की कोशिश करेगी। अकेला तमिलनाडु ही ऐसा राज्य है, जहां मौजूदा डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कषगम) दूसरी बार सत्ता में आने का सपना देख रही है। इन पांच राज्यों के अलावा इसी समय छह राज्यों यानी गोवा, गुजरात, कनार्टक, महाराष्ट्र और त्रिपुरा की 8 विधानसभा सीटों पर दो चरणों में उपचुनाव भी होंगे। 
सवाल यह है कि जब विधानसभा चुनाव बिल्कुल सर पर हैं और हम सब यह भी जानते हैं कि देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर आनन-फानन में महाभियोग नहीं चलाया जा सकता, तब फिर तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व में समूचा विपक्ष मिलकर मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध महाभियोग प्रस्ताव पारित करने की प्रक्रिया को तेजी से पूरा करते क्यों दिखना चाहता है? दरअसल विपक्ष को पता है कि उसके पास तकनीकी रूप से वह संख्या बल नहीं है, जिसकी बदौलत महाभियोग संभव हो सके। बावजूद इसके अगर विपक्ष इस काम को करते हुए मतदाताओं के सामने तन्मयता से दिखना चाहता है, तो इसकी वजह यह है कि विपक्ष चाहता है कि मतदाताओं को यह संदेश दिया जा सके। एसआईआर की कवायद वास्तव में उनके साथ किया जा रहा वोटिंग घोटाला है। विपक्ष यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि उसे सत्ता से बेदखल करने के लिए केंद्र सरकार के इशारे पर राष्ट्रीय चुनाव आयोग एसआईआर के माध्यम से इसे अंजाम दे रहा है। विपक्ष ऐसा इसलिए कह पाने का मौका पा रहा है, क्योंकि एसआईआर के बाद सभी राज्यों में मतदाताओं की संख्या में काफी कमी आयी है। 
एसआईआर (स्पेशल इंटेसिव रिविजन) यानी मतदाता सूची की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया है। जिन राज्यों में चुनाव होने जा रहे हैं, वहां मतदाताओं की संख्या में काफी कमी आयी है। जैसे 2021 में जब विधानसभा चुनाव हुए थे, पश्चिम बंगाल में मतदाताओं की संख्या 7.34 करोड़ थी मगर एसआईआर के बाद पश्चिम बंगाल में अब कुल रजिस्टर्ड मतदाता 6.44 करोड़ रह गये हैं। इनमें 5.2 लाख मतदाता ऐसे हैं जो साल 2021 में नहीं थे। कहने का मतलब यह कि एसआईआर के बाद पश्चिम बंगाल में तकरीबन 1 करोड़ मतदाता घट गये हैं। ममता बनर्जी जिनके नेतृत्व में समूचा विपक्ष मिलकर मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध महाभियोग लाने की कोशिश कर रहा है, वह विशेष रूप से पश्चिम बंगाल और देश के सभी बाकी प्रदेशाें के जहां चुनाव हो रहे हैं, मतदाताओं को यह संदेश देने की कोशिश कर रही हैं कि भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार उन विधानसभा चुनावों में एसआईआर का सहारा लेकर विपक्षी पार्टियाें की सरकारों को उखाड़ फेंकने की कोशिश कर रही है। पश्चिम बंगाल की ही तरह तमिलनाडु में भी एसआईआर के जरिये प्रदेश सरकार को बदलने की कोशिश की बात हो रही है। तमिलनाडु में भी 2021 में जब चुनाव हुए थे, तो कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 6.28 करोड़ थी, जबकि एसआईआर के बाद 60 लाख रजिस्टर्ड मतदाता कम हो गये हैं। अब कुल मतदाता 5.67 करोड़ बचे हैं जबकि इसमें भी 12.51 लाख ऐसे मतदाता हैं जो 2021 में नहीं थे। इस तरह देखा जाए तो तमिलनाडु में भी बड़ी संख्या में मतदाताओं की कमी हुई है। डीएमके सरकार का आरोप है कि यह उसके पारंपरिक समर्थक मतदाताओं का वोटिंग लिस्ट से नाम काट करके उसके विरुद्ध उसको हराने की कोशिश कर रही है। 
ऐसे ही आरोप केरल में भी लगाये जाने की कोशिश हो रही है, जबकि केरल में कुल मतदाता 5 लाख ही घटे हैं। असम में क्योंकि एसआईआर नहीं हुआ, इसलिए वहां यह बात नहीं है। 9.44 लाख मतदाताओं वाले केंद्रशासित प्रदेश पुड्डुचेरी में भी एसआईआर के बाद से 60 हजार मतदाताओं की संख्या घटी है। यह बात तब और मायने रखती है, जबकि कुल मतदाताओं में से 23 हजार मतदाता पहली बार चुनाव में हिस्सा लेंगे, लेकिन 2021 में जहां कुल मतदाताओं की संख्या 10.04 लाख थी, वहीं पिछले पांच सालों में 23 हजार नये मतदाताओं के आने के बाद भी इस बार पुड्डुचेरी में कुल 9.44 लाख रजिस्टर्ड मतदाता ही बचे हैं, जो वोट डाल सकेंगे। कुल मिलाकर जिन राज्यों में विपक्षी पार्टियां सत्तारूढ़ हैं, वह इस तरह का संदेश देने की कोशिश कर रही हैं कि एसआईआर के जरिये केंद्र सरकार इन्हें सत्ता से बेदखल करना चाहती है। इस तरह देखा जाए तो जिन पांच राज्यों में 17.4 करोड़ मतदाता आने वाले दिनों में 824 विधानसभा सीटों में चुनाव करेंगे, उनकी पसंद-नापसंद से पहले ही यह हवा बनाने की कोशिश हो रही है कि ऐसे रिजल्ट आ सकते हैं और उसका कारण ‘ये’ हो सकता है, ‘वो’ हो सकता है। 
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर

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