ईरान युद्ध में फंसता नज़र आ रहा है अमरीका

खाड़ी में युद्ध डोनाल्ड ट्रम्प ने शुरू किया था, लेकिन अब उनके सामने शर्तें ईरान रख रहा है। ऐसी शर्तें जिनकी 28 फरबरी को जब तेहरान पर पहला हमला हुआ था तो किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। ये शर्तें ईरान के नये सर्वोच्च नेता अयातुल्ला मुजतबा खामेनेई ने रखी हैं। इन्हें मानने के लिए ईरान के सर्वोच्च नेता ने ट्रम्प को 30 से 60 दिन का समय दिया है। जैसे ही खामेनेई ने अपना वक्तव्य खत्म किया, चीन और रूस खुल कर उसके समर्थन में उतर आए। इस घटनाक्रम और खामेनेई की शर्तें सुन कर इज़रायल और अमरीका के खेमे में हड़कम्प मच गया है। यह बात मैं उस भावना के तहत नहीं कह रहा हूँ जो आम तौर पर अमरीकी साम्राज्यवाद का विरोध करने वालों में पाई जाती है। यह एक हकीकत है जिसके कारण मध्य-पूर्व में और प्रकारांतर से सारी दुनिया में अमरीका के प्रभुत्व को एक ऐसी चुनौती मिल गई है जो पहले कभी नहीं मिली थी। ट्रम्प के एक तरफ कुआं है, और दूसरी तरफ खाई। अगर वह खामनेई की शर्तों पर बातचीत शुरू करते हैं तो दुनिया के मंच पर उनकी रंगबाज़ी में इतना बड़ा डेंट लगेगा जितना तब भी नहीं लगा था जब अमरीका वियतनाम, इराक और अफगानिस्तान में बुरी तरह से हारा था। अगर ट्रम्प ने युद्ध रोक कर बातचीत नहीं शुरू की, तो वह अपने देश और सारी दुनिया को एक ऐसी लड़ाई में फंसा देंगे जिसके बारे में साबित हो चुका है कि उसे जीतना उनके लिए नामुमकिन है। अगर आप किसी लड़ाई को नहीं जीत सकते, तो इसका एक ही मतलब है कि आपका हारना तय है। 
पिछले चालीस साल से यानी 1979 में ईरान की इस्लामिक क्रांति के बाद मध्यपूर्व में तुरुप के सारे पत्ते अमरीका के हाथ में ही रहे हैं लेकिन बिना ठीक से योजना बनाये और ज़मीनी हकीकतों का ध्यान रखे बिना उसके युद्ध में उतरने के कारण ऐसी स्थिति बनी है जिसके बारे में पहले सोचा भी नहीं जा सकता था। सात अमरीकी सैनिकों के शव वाशिंगटन पहुंच चुके हैं। तेल की कीमतें 121 डालर प्रति बैरल हो चुकी हैं। अमरीकी युद्ध मंत्रालय के दस्तावेज़ स्पष्ट कर रहे हैं कि इस युद्ध को नहीं जीता जा सकता। यही कारण है कि मुजतबा खामेनेई अमरीका से युद्ध रोक कर वार्ता करने का अनुरोध नहीं कर रहे हैं, बल्कि वह अपने अल्टीमेटम के ज़रिये ट्रम्प से हथियार डालने के लिए कहते नज़र आ रहे हैं। 
मुजतबा ने अपने शहीद हो चुके पिता अयातुल्ला अली खामेनेई की जगह लेने के बाद अपना पहला संदेश जारी किया। 12 मिनट तक चला यह बयान लिखित रूप में जारी हुआ व टीवी पर पढ़ा गया। मुजतबा खुद कैमरे पर नहीं दिखे। इसका एक-एक लफ़्ज़ दरअसल ईरानी जनता के बजाये अमरीका को संबोधित था। बयान के दो हिस्से थे। पहले हिस्से में, जो छह मिनट तक चला, मुजतबा ने सिलसिलेवार बताया कि अमरीका ने ईरान के साथ क्या-क्या ज़्यादतियां की हैं। उनका कहना था कि ये अमरीका के अपराध हैं। मसलन, उन्होंने कहा कि उनके पिता की हत्या की गई, ईरानी वैज्ञानिकों की हत्या की गई, दसियों साल से अमरीका ने ईरान पर प्रतिबंध लगाए हुए हैं, वह इज़रायल को लगातार समर्थन दे रहा है, अरबों के इलाकों पर अमरीकी सेनाओं ने कब्ज़ा कर रखा है। छह मिनट बात मुजतबा ने गुज़रे वक्त पर बोलने के बजाये भविष्य के बारे में बोलना शुरू किया। उन्होंने तीन मांगें रखीं। इन तीनों मांगों का पूरा मसविदा अमरीका के विदेश विभाग को स्विटज़रलैंड के ज़रिये भेजा जा चुका है। 
कई समाचार माध्यमों ने बताया है कि मुजतबा ने ईरान की तरफ से अमरीका को प्रस्ताव दिया है कि वह मध्य-पूर्व से अपनी फौजें वापिस बुला ले, लेकिन यह एक अधूरी खबर है। असली बात यह है कि मुजतबा खामेनेई ने अमरीका को अल्टीमेटम दिया है कि उसे मध्य-पूर्व के सभी देशों से (जिनमें इराक, सीरिया, कुवैत, बहरीन, कतर, यूनाइटेड अरब अमीरात और सऊदी अरब शामिल हैं) अपनी फौजें और अड्डे तीन दिन के भीतर-भीतर हटा लेने होंगे। ईरान ने इस शर्त के पालन के लिए किसी वार्ता की बात मानने से भी इन्कार कर दिया है। उसका कहना है कि बातचीत वगैरह कुछ नहीं होगी। अमरीका को मिडिल-ईस्ट के इन देशों में अपनी फौजी उपस्थिति खत्म करनी होगी। खामेनेई के शब्द साफ कह रहे थे कि इस क्षेत्र में सभी अमरीकी सैन्य अड्डों को तुरंत बंद किया जाए। उन्होंने खाड़ी देशों से भी अपील की कि वे अमरीकी बेस बंद करें, अन्यथा ईरान उन पर हमले जारी रखेगा। उन्होंने कहा कि अमरीका की ‘सुरक्षा और शांति’ की बातें झूठ साबित हुई हैं और बेस बंद न होने पर उन्हें निशाना बनाये रखना जारी रखा जाएगा। यह है मुजतबा की ट्रम्प को दिये गये अल्टीमेटम की पहली मांग। 
अल्टीमेटम की दूसरी मांग है कि अमरीका को ईरान के ऊपर 1979 के बाद से लगाए गये सभी प्रतिबंधों को तुरंत हटाना होगा। बैंकिंग पर लगी सभी पाबंदियों और तेल बेचने पर लगी सभी पाबंदियों को भी हटाना होगा। अमरीका ने ईरान को किसी भी तरह के टेक्नालोजी ट्रांसफर से भी प्रतिबंधित कर रखा है। खामेनेई ने कहा है कि यह पाबंदी भी हटनी चाहिए। इसके लिए ट्रम्प को 60 दिन का अल्टीमेटम दिया है यानी पहली माँग के लिए 30 दिन का और दूसरी मांग के लिए 60 दिन का अल्टीमेटम। खामेनेई की तीसरी मांग है युद्ध और पाबंदियों से हुए आर्थिक नुकसान का मुआवज़ा। उनका कहना था कि इसके लिए अमरीका को 800 अरब डालर का भुगतान ईरान को करना होगा। खामेनेई का कहना है कि पिछले चालीस साल में तरह-तरह की पाबंदियों और युद्धों के कारण ईरान को इतना नुकसान हुआ है। उन्होंने यह भी कहा कि इसमें से 500 अरब डालर पहले दस साल के भीतर-भीतर दिये जाएं। 
खामेनेई का यह ज़बरदस्त अल्टीमेटम यहीं खत्म नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि अगर उनकी तीनों मांगें नहीं मानी गईं तो ईरान तीन कदम उठायेगा। पहला, वह तीस दिन की डेडलाइन खत्म होते ही होर्मुज़ जलडमरूमध्य को सभी तरह के व्यापारिक जहाज़ों से लिए बंद कर देगा। दूसरा, वह रूस और चीन के साथ अपनी फौजी पार्टनरशिप शुरू कर देगा। खामेनेई ने इसे प्रतिरक्षात्मक पार्टनरशिप करार दिया है। इसमें ईरान की धरती पर विदेशी फौजी अड्डे बनाने की इजाज़त देना भी शामिल है। तीसरा, ईरान अंतर्राष्ट्रीय कानून के तहत न्यूकलियर डिटरेंस की क्षमता विकसित करेगा। इसका मतलब यह हुआ कि ईरान अपने ऊपर किये जा सकने वाले एटमी हमले के अंदेशे को देखते हुए उसकी संभावनाएं खत्म करने की ताकत हासिल करेगा। खामेनेई ने यह नहीं कहा कि वह एटम बम बनाएंगे, पर यह ज़रूर कहा कि वह एटम बम तैनात करेंगे। इसका सीधा मतलब है कि ईरान के पास भी एटम बम पहले से है, या रूस या चीन ने उसे ऐसा बम देने का वायदा कर दिया है। 
खास बात यह है कि जैसे ही खामेनेई ने अपना संदेश खत्म किया, वैसे ही डेढ़ घंटे बाद चीन ने आधिकारिक रूप से वक्तव्य जारी करके कहा कि वह ईरान द्वारा अपनी सुरक्षा को लेकर व्यक्त की गई चिंताओं का समर्थन करता है, और किसी भी विदेशी हमले के खिलाफ अपना बचाव करने के उसके अधिकार के साथ खड़ा है। चीनी बयान के चालीस मिनट बात रूस ने भी एक वक्तव्य जारी किया जो ठीक चीन जैसा ही था। दोनों देशों ने साफ कर दिया है कि वे ईरान के साथ खड़े हैं। खामेनेई ने स्पष्ट रूप से कहा कि ईरान अमरीकी हमले में मारे गए लोगों (शहीदों) के खून का बदला लेगा। अगर दुश्मन (अमरीका/इज़रायल) उसे 800 अरब डालर का मुआवजा नहीं देते, तो ईरान उनकी सम्पत्तियां ज़ब्त करेगा, या उतनी ही मात्रा में उनकी सम्पत्तियाँ नष्ट करने का सिलसिला चलाएगा। 
विशेषज्ञों का मानना है कि मुजतबा के पिता की राजनीति की शैली अलग तरह की थी, और मुजतबा की अलग तरह की है। उनके पिता विभिन्न गुटों से बातचीत और समझौते के ज़रिये एक दूरगामी रणनीति के तहत राजनीति करते थे लेकिन मुजतबा मानते हैं कि उनके पास समय नहीं है। उन्हें तुरंत नतीजे निकाल कर दिखाने हैं। मुजतबा जैसे ही सर्वोच्च पद पर बैठे, उनके और आईआरजीसी यानी रेवोल्यूशनरी गार्ड्स के बीच एक लम्बी बैठक हुई। इसी में तय हुआ कि अब समय आ गया है कि पूरे खाड़ी क्षेत्र के ऊपर अमरीकी शिकंजा खत्म किया जाए। इसके लिए ज़रूरी है कि ईरान को वे आर्थिक संसाधन मिलें जिन्हें अमरीका ने रोक रखा है, और जिनके ज़रिये वह अपनी फौजी ताकत बढ़ा सकता है। जैसे ही अमरीका इन शर्तों पर वार्ता के लिए तैयार हुआ, वैसे ही ईरान को वह अंतर्राष्ट्रीय रुतबा प्राप्त हो जाएगा जिसके आधार पर वह मध्यपूर्व की बड़ी ताकत के तौर पर उभर सकेगा। इसके नतीजे के तौर पर अंतर्राष्ट्रीय प्रभाव वाशिंगटन के हाथ से निकल कर तेहरान के हाथ में आ जाएगा। 
मुजतबा खामेनेई और ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स के बीच बहुत गहरा और मजबूत संबंध है। यह संबंध उनके राजनीतिक उदय, सत्ता संभालने और वर्तमान स्थिति में ईरान की नीतियों को प्रभावित करने में केंद्रीय भूमिका निभा रहा है। समझा जाता है कि उनके पिता अली खामेनेई की हत्या के बाद मुजतबा को सुप्रीम लीडर चुनने में रेवोल्यूशनरी गार्ड्स ने निर्णायक दबाव डाला। उसने असेम्बली के सदस्यों पर दबाव डाल कर उनसे मुजतबा के पक्ष में वोट करवाया। रेवोल्यूशनरी गार्ड्स ने जल्दी ही मुजतबा के प्रति वफादारी की शपथ ली और उन्हें पूर्ण आज्ञाकारिता का भरोसा दिया। मुजतबा ने स्वयं 80 के दशक में ईरान-इराक युद्ध के दौरान रेवोल्यूशनरी गार्ड्स में काम किया था। वह हबीब बटालियन में शामिल थे। उनके रेवोल्यूशनरी गार्ड्स के कई कमांडरों (विशेषकर युवा और रेडिकल) के साथ गहरे व्यक्तिगत संबंध हैं। उन्होंने रेवोल्यूशनरी गार्ड्स के खुफिया प्रमुख रह चुके हुसैन तैय्यब के साथ मिलकर काम किया और सुरक्षा, खुफिया तथा क्षेत्रीय प्रॉक्सी नेटवर्क पर अपना असर कायम किया। वह रेवोल्यूशनरी गार्ड्स के माध्यम से अपने पिता के ऑफिस में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। रेवोल्यूशनरी गार्ड्स ईरान की सबसे ताकतवर संस्था है। मुजतबा के सुप्रीम लीडर बनने के बाद विश्लेषक मानते हैं कि रेवोल्यूशनरी गार्ड्स का प्रभाव और बढ़ेगा। ये सभी खबरें अमरीका और उसके सहयोगी देशों (इज़रायल और युरोपीय देश) के लिए बेहद चिंताजनक हैं।

लेखक अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में प्ऱोफेसर और भारतीय भाषाओं के अभिलेखागारीय अनुसंधान कार्यक्रम के निदेशक हैं।

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