मृत्यु का जयघोष

‘क्या तुम युद्ध पर व्यंग्य लिख सकते हो?’ यह पूछना बिल्कुल ऐसा ही है, जैसे तुम कहो कि क्या तुम किसी लाश को हंसा सकते हो? भई, लाश तो लाश होती है, उसके लिए अब हंसना क्या और रोना क्या? तो क्या इसका अर्थ यह है कि जब आपके घर के सिर पर बम फटे या छोटी-छोटी बच्चियों के स्कूल पर किसी अधिनायक की लालसा कहर बन कर बरसे और बहुत-सी बच्चियां खिलखिलाने की जगह मौत के हवाले कर दी जायें, तो उस पर व्यंग्य नहीं लिखा जा सकता। आंसू तो खैर बहाये ही नहीं जा सकते। जंगलों को आबाद होते देखा है, पगडंडियों को चौड़ी सड़कों में तबदील होते देखा है, आदमी के चल-चल कर बिवाइयां फटे पांवों पर वातानुकूलित गाड़ियों की कृपा होते देखी है।
लेकिन पल भर में ही सब कुछ बदल जाता है। बहुमंज़िली इमारतें भरभरा कर गिर गईं। सिर पर बम नहीं जो गिरा, वह मिसाइल थी। वह गिरीं और गिरती ही चली गईं। पलभर में ही सब कुछ धूल-धूसरित हो गया। अपनी ताकत से चुंधियाये हुए चन्द लोग आदमी को, उसके वजूद को, उसके उम्र भर के सपनों को खण्डहर बनाने पर उतारू हो गये। एक अधिनायक हज़ारों कोस दूर से अपनी ताकत में मदमत्त, अट्टहास कर रहा है, देशों को दुनिया के नक्शे से मिटाने पर तुला है, तो तुम उसकी महानता का नकाब खींच कर तार-तार कर देने की जगह उसके डर से कांपते हुए या तो उसे झुक कर कोर्निस बजा रहे हो, या उसकी शान में कसीदे पढ़ रहे हो, तो क्या इसमें से तुम्हें किसी व्यंग्य की विभीषिका नज़र नहीं आती।
नहीं, अपनी आंखें बन्द कर लो। मौत सामने खड़ी है, और तुम्हें व्यंग्य सूझ रहे हैं। मान लो न कि वह शांति का मसीहा है। दुनिया में पहले स्वयं ही युद्ध छेड़ कर, फिर उन्हें रुकवा कर शांति का नोबेल पुरस्कार मांग रहा है। तुमने नहीं दिया, तो फिर बम का उपहार लो। गोलियां खाओ। तुम मानते क्यों नहीं कि वह सर्वोपरि है। उसने हथियारों की फैक्टरियां खोल कर कितने लोगों को रोज़गार दिया। अब इन हथियारों का इस्तेमाल भी तो होना चाहिए। नहीं तो इतने लोग बेकार हो जाएंगे। उनकी भूख वह सहन नहीं कर सकता। उसने ‘पीस बोर्ड’ बनाया है। अब युद्ध होगा, तो फिर शांति स्थापित करने के लिए पीस बोर्ड का इस्तेमाल होगा।
इसलिए युद्ध होना चाहिए। अपने देश में उसके देश की थल सेना के साथ नहीं, बल्कि यहां से हज़ारों किलोमीटर दूर रेगिस्तान में दिन-रात मेहनत करते लोगों पर बम गिराओ। उनमें मौत की, तबाही की, अंधेरे की सौगात बांटो, ताकि तुम्हारे अरबपति खरबपति बन सकें। समवेत स्वर में कह सकें कि तुम कितने महान हो। मौत के बाद ज़िन्दगी आती है। युद्ध के बाद शांति पैदा होती है। अब हम पहले दर्द पैदा करेंगे, फिर उसकी दुआ बनेंगे। अपनी दवा बेच कर उनकी शांति स्थापना करेंगे। पहले युद्ध का पैगाम दिया, अब शांति स्थापना करेंगे। अपनी ही शर्तों पर।
क्या हैं आपकी शर्तें?
यही कि जो तुम्हारा देश चलाये, वह हमारा कठपुतला हो। हम उसे एड़ी से कुचलें तो वह कहे, मरहवा। क्या मौत से तबाही का संगीत पैदा किया जा सकता है? हम दुनिया को व्यापार करने देंगे तो अपनी शर्तों पर। वे तेल के कुओं से लेकर गैस तक बेचेंगे तो हमारे हुक्म पर। केवल रेगिस्तान में ही नहीं, उन सभी देशों में जिन्हें तुम आजकल तीसरी दुनिया कहते हो। बेशक वह हमारे परम मित्र हैं, लेकिन तब तक जब तक वह हमारी धुन पर नाचेंगे। जिस दिन उनके कदमों ने अपनी लय पकड़ने की कोशिश की, तो हम उन सब कदमों की आहट खत्म करने के लिए इन कदमों का नामोनिशान ही मिटा देंगे।
जी नहीं, हम इस समय दुनिया में हो रहे ईरान युद्ध की बात नहीं कर रहे, बल्कि उन सभी युद्धों की बात कर रहे हैं, जो इससे पहले हुए, या इसके बाद होंगे।
शांति के एक मसीहा की बात नहीं कर रहे, मौत का ताण्डव नाचते हुए उन सभी महीसाओं की बात कर रहे हैं, जो गले में खोपड़ियों की माला पहन कर शांति-शांति चिल्लाते हैं।
कौन कहता है, हिटलर खत्म हो गया? हर युग का एक-एक अपना हिटलर होता है। कभी वह नादिरशाह होता है, तो कभी वह अहमदशाह अब्दाली। पहले उसके हाथों में आग, ब्रह्मस्त्र होते थे। आज परमाणु बम गिरा देने की धमकियां हैं। इन धमकियों से डरो। इनसे दो व्यंग्य तलाशने की कोशिश न करो। देखो, यहां ज़िंदगी की भीख मांगते लोगों की कतारें लगी हैं। ये मुफ्त राशन मांग रही हैं, या गैस के सिलेण्डर। दे दो इन्हें ये सब, लेकिन इस शर्त पर कि कहें, गैस और तेल की यहां कोई कमी नहीं। सब कुछ प्रचुर मात्रा में मौजूद है। अपना देश बहुत तरक्की कर गया है। दुनिया की तीसरी बड़ी शक्ति है, और हम इसकी महानता का मात्र एक जयघोष हैं।

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